अभी भी कैटों के सहारे चल रही है पंजाब पुलिस


जालन्धर, 15 अप्रैल (मेजर सिंह): पंजाब में दशक से ज्यादा समय तक आतंकवाद लहर को काबू करने हेतु पुलिस की खुली छोड़ी लगामों का ही परिणाम था कि आतंकवादियों की सूचना देने, उनको मारने या मरवाने वाले मुखबिरों उर्फ कैटों को पुलिस ने हर तरह के गुनाह एवं जुर्म करने की खुली छूटी दे रखी थी। खन्ना पुलिस द्वारा 29 मार्च को जालन्धर के गांव प्रतापपुरा में छापा मारकर 16 करोड़ रुपए से ज्यादा की नकदी बरामद करने और फिर इसमें से 6.65 करोड़ खुर्द-बुर्द करने के मामले में भी खन्ना पुलिस के एक चहेते के लिए विशेष ‘मुखबिर’ के आसपास शक की सुई घूम रही है। बब्बू बंदूक नाम का यह कैट खन्ना पुलिस में खौफ का नाम बनकर घूमता बताया जाता है। बहादरगढ़ एवं राजपुरा के अन्तर्गत आते गांव समसपुर का ‘बब्बू बंदूक’ कुछ वर्ष पहले थाना स्तर पर छोटे अपराधियों या नशे बेचने वालों के खिलाफ मुखबरी करता था परन्तु गैंगस्टरों के खिलाफ पंजाब पुलिस द्वारा छेड़े अभियान में वह इतना आगे बढ़ गया कि राजपुरा के एक इंस्पैक्टर के माध्यम से विक्की गोंडर जैसे गैंगस्टरों के आसपास जाल बुनने वाली पुलिस टीम का चहेता बन गया और पठानकोट से बठिंडा एवं अन्य अनेक स्थानों पर वह सरकारी हथियार तथा गाड़ियों को लेकर घूमता रहा। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि खन्ना पुलिस ने बब्बू बंदूक के साथ एक महिला सिपाही भी तैनात की हुई थी। अधिकारियों का कहना है कि यह मुखबिर बनाम कैट अक्सर ही खन्ना के एस.एस.पी. की गाड़ी, कार्यालय एवं घर में आम ही नज़र आता रहता है और डी.एस.पी. तथा एस.पी. रैंक के अधिकारियों तक को भी आदेश देने का हौसला रखता रहा है। यह भी बताया जाता है कि निचले कर्मचारियों पर वह आदेश भी चलाता था। बब्बू बंदूक बारे खन्ना पुलिस में आम यही प्रभाव था कि उसको पुलिस में भर्ती कर लिया है परन्तु एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस बात का खंडन किया है। यह भी पता चला है कि पादरी के आवास पर छापा मारने हेतु पंजाब के डी.जी.पी. ने जो चार पुलिस कर्मचारियों को विशेष रूप से खन्ना पुलिस के साथ नियुक्त किया था, वह बब्बू बंदूक के चहेते थे। पता चला है कि नई बनी जांच टीम बब्बू बंदूक की इस मामले में भूमिका को भी जांचेगी। पादरी के पैसे खुर्द-बुर्द करने में उक्त ‘मुखबिर’ के रूतबे पर भूमिका का पर्दाफाश होने से पंजाब की पुलिस अफसरशाही में बड़ी हलचल मच गई है।
आई.जी. का नहीं चला आदेश : पता चला है कि पादरी की राशि खुर्द-बुर्द करने के मामले की जांच कर रहे आई.जी. प्रवीण कुमार सिन्हा ने शक की बिना पर छापे में शामिल रहे ए.एस.आई. जोगिन्द्र सिंह एवं राजप्रीत सिंह को निगरानी में रखने एवं खिसकने न देने का निर्देश किया था, परन्तु बताया जाता है कि खन्ना पुलिस ने दोनों थानेदारों पर कोई निगरानी नहीं रखी। यह दोनों थानेदार 27 मार्च को डी.जी.पी. के आदेश से खन्ना में तैनात हुए थे और पादरी के घर छापा मारने की घटना से 10-11 दिन तक ड्यूटी पर उपस्थित रहे हैं। यह भी पता चला है कि श्री सिन्हा की जांच में यह शामिल हुए थे। अब शक की सुई इन दोनों थानेदारों को भगाने में बब्बू बंदूक के आसपास घूम रही बताई जाती है। पुलिस अफसरशाही में इस बात को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं कि पैसे प्रतापपुरा गांव से पुलिस ने उठाए हैं और इस बारे पुख्ता सबूत सामने आ चुके हैं परन्तु पैसे पकड़े दोराहा के पास से कई घंटे बाद दिखाए गए हैं। दूसरा इस बात के भी पुख्ता सबूत सामने आ रहे हैं कि पादरी के आवास से 9 करोड़ रुपए से ज्यादा राशि अलग गाड़ी में रखी गई जो समराला एवं खन्ना पहुंचे और आवास की पहली मंजिल से उठाई 6 करोड़ रुपए से ज्यादा राशि बाद में एक अन्य कार में रखी घई और यह पार्टी मोगा होकर खन्ना पहुंची है। इस पार्टी में शामिल कर्मचारियों के मोबाइल फोन इस बात पर्दाफाश कर सकते हैं। इस मामले में दो थानेदारों के विरुद्ध पर्चा दर्ज होने से यह बात तो साबित हो गई कि दोराहा नाके से राशि बरामद करने वाली बात गलत थी और इस बारे दावा ज़िले के पुलिस प्रमुख ध्रुव दाहीया ने स्वयं किया था। इस मामले को पास से देख रहे लोग सारे मामले को संदिग्ध निगाहों से देख रहे हैं और पंजाब पुलिस की भूमिका एक बार फिर दाव पर लगी दिखाई दे रही है।