सुरक्षा खतरा सही  है या ध्यान भटकाने की रणनीति ?


पूरे चुनाव अभियान के दौरान एक बात लगातार गूंजती रही है कि सुरक्षा खतरा का हौव्वा वस्तुत: सत्तारूढ़ घटक जानबूझकर लोगों का ध्यान जरुरी मुद्दों से भटकाने के लिए खड़ा कर रहा है। जब से मजहबी चरित्र वाला वैश्विक आतंकवाद प्रचंड रूप में सामने आया है, हमारे देश में लगातार बहस चलती रही है कि यह खतरा वाकई है या सरकार लोगों का ध्यान भटकाने के लिए भय पैदा करती है। जैसे ही आप देश की सुरक्षा की बात करेंगे एक वर्ग द्वारा आपको त्वरित प्रतिक्रिया मिलेगी कि भाजपा अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए राष्ट्रवाद और सुरक्षा की बात कर रही है। यह विषय का कितना सरलीकरण है, इसका अंदाजा उन लोगों को अवश्य है जिन्हें विश्वव्यापी आतंकवाद के खतरनाक आयामों से लेकर पड़ोस के अन्य मंसूबों का पता है। दुनिया के किसी भी देश के लिए सुरक्षा प्राथमिकता होती है। अन्य विषय उसके बाद ही आते हैं। इस समय के विकट हालात में जिस देश और समाज ने सुरक्षा प्रबंध के प्रति लापरवाही की, उसे भयावह परिणाम भुगतने पड़े। पड़ोसी श्रीलंका इसका ज्वलंत उदाहरण है। श्रीलंका में 21 अप्रैल को हुए शृंखलाबद्ध आठ धमाके वहां के सुरक्षा महकमे की लापरवाही की ही तो परिणति थी। स्थिति देखिए कि उन हमलों के बाद तमाम सुरक्षा कार्रवाइयों के बीच भी लगातार विस्फोट हो रहे हैं, विस्फोटक बरामद हो रहे हैं और देश भर से आतंकवादी पकड़े जा रहे हैं। आतंकवादियों ने सुरक्षा लापरवाही का लाभ उठाते हुए पूरे देश में अपना तंत्र फैला लिया था।  इन पंक्तियों के लिखे जाने तक आईएसआईएस ने श्रीलंका में फि र हमलों की धमकी दी है। इस धमकी से परे आपातकाल के बीच कई हजार फौज और पुलिस के जवानों के ऑपरेशन के दौरान बीच-बीच में हो रहे विस्फोट इसकी पुष्टि कर रहे हैं कि पूरे देश में विनाश का बारूद बिछ गया था। तत्काल सबसे अंतिम घटना राजधानी कोलंबो से करीब 360 किलोमीटर दूर स्थित कलमुनई शहर की है जहां आतंकवादियों के होने की सूचना के आधार पर सेना एवं पुलिस के जवान एक घर पर छापा मारने पहुंचे ही थे कि अंदर से गोलियां चलने लगी। इसमें कई लोग मारे गए और जब आतंकवादियों के पास लड़ने का सामान खत्म हो गया तो उन लोगों ने विस्फोटकों से खुद को उड़ा लिया। आतंकवादियों की संख्या तीन बताई जाती है। एक दूसरी घटना सैंदामरुडु में हुई जहां तलाशी अभियान के दौरान आतंकवादी गोली चलाने लगा। 15 लोग इसमें मारे गए। घटनास्थल पर एक आत्मघाती धमाका हुआ और टी-56 असॉल्ट राइफ ल के साथ आतंकवादी का शव बरामद किया गया। दोनों स्थानों से भारी मात्रा में विस्फोटक, डेटोनेटर, आत्मघाती किट्स, सेना की वर्दी और आईएसआईएस के झंडे बरामद किए हैं। सुरक्षा बलों को इसका आभास भी नहीं था कि इस तरह के खूनी प्रतिरोध का दुस्साहस किया जा सकता है। ऐसी और न जाने कितनी घटनाएं सामने आएंगी। सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों तथा 80 से ज्यादा संदिग्धों की गिरफ्तारी के बावजूद कभी हवाई अड्डे के बाहर विस्फोटक मिलता है तो कहीं वाहन में विस्फोट हो जा रहा है, कहीं बस स्टैंड में विस्फोटकों का जखीरा मिल रहा है तो कहीं न्यायालय परिसर में ही विस्फोट हो रहा है। श्रीलंका इस भयावह स्थिति से बच सकता था। भारत की ओर से उसे खुफिया इनपुट दिए गए। अमरीका ने चेताया लेकिन वहां के अधिकारी यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि आतंकवाद उनके यहां इस रुप में आ सकता है जैसा भारत और अमरीका बता रहे हैं। यहां तक कि चर्च पर धमाके की सटीक सूचना भारत ने हमले के दिन एवं उसके कुछ दिनों पूर्व भी दी थी। पुलिस प्रमुख ने उसे गंभीरता से लिया ही नहीं। वस्तुत: 2009 में लिट्टे के अंत के साथ श्रीलंका आंतरिक सुरक्षा को लेकर धीरे-धीरे निश्चिंत हो गया था। इसका लाभ उठाकर आईएसआईएस से प्रेरित आतंकवादियों ने व्यापक जाल फैला लिया। घटना वहां होती है और बयान आईएस जारी कर देता है। वह उन आतंकवादियों के नाम भी बता देता है जो संघर्ष में या आत्मघाती हमले में मारे गए। जिस नेशनल तौहिद जमात और उसके नेता जाहरान हशीम को आतंकवाद का मुख्य सूत्रधार माना गया है, उसके बारे में पुलिस को कई बार शिकायतें मिलीं, परन्तु गंभीरता से उसकी छानबीन करने तक की जहमत नहीं उठाई गई। यह देश की हालत हो गई थी। भय यह पैदा हो रहा है कि भारत जिस तरह की मानसिकता में जी रहा है कहीं एक दिन हमारे यहां भी वैसी स्थिति पैदा न हो जाए। आखिर श्रीलंका हमले के सूत्र भारत से भी तो जुड़े हैं। हमले का नेता जाहरान हशीम गुपचुप तरीके से भारत आता था और उसके भाषण के वीडियो यहां पहुंचते थे। हाशिम 2017 में कम से कम दो बार भारत आया था और कुछ महीनों तक यहीं रहा। एनआईए की जांच के दौरान बहुत सारे तथ्य सामने आए और छ: लोग गिरफ्तार किए गए। सात लोगों के खिलाफ न्यायालय में आरोप-पत्र भी दायर हो चुका है। एनआईए की जांच में साफ  हो गया कि ये सभी आईएस की हिंसक चरमपंथी विचारधारा से प्रभावित थे और इसे सोशल मीडिया पर प्रचारित कर रहे थे। एक आरोपी लगातार हाशिम के संपर्क में था, क्योंकि वह आईएस में शामिल होना चाहता था। हाशिम के वीडियो, आरोपियों से जुड़े अकांउट्स तथा इनसे पूछताछ के बाद जो कुछ सामने आया वह सब डरावना था। वीडियो में हाशिम युवाओं से श्रीलंका, तमिलनाडु और केरल में इस्लामिक शासन स्थापित करने की बात कहता था। इसी में से श्रीलंका में चर्चों तथा भारतीय उच्चायोग पर हमले की योजना की जानकारी सामने आई। यह विचार करने वाली बात है कि जिन आरोपियों की गिरफ्तारी से श्रीलंका में हमला किए जाने की जानकारी मिली उनसे भारत में हमले की कोई सूचना नहीं मिली होगी ऐसा हो सकता है क्या? जांच एजेंसियां अनेक बार सम्पूर्ण मामले के सामने आने के बीच आए तथ्यों को सार्वजनिक नहीं करती। अगर ये भारत में पकड़े गए तो खतरा किसी दूसरे देश के लिए नहीं हो सकता। आप एक वर्ष के अंदर ही आईएस की विचारधारा से प्रभावित संभावित आतंकवादियों या मॉड्यूलों के पकड़े जाने या सामने आने की घटनाओं पर सरसरी नजर दौड़ा लीजिए तो आपको खतरे का अहसास हो जाएगा। जम्मू कश्मीर को तो छोड़ दीजिए जहां इस वर्ष ही अब तक 100 से ज्यादा आतंकवादी मारे जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र सहित अनेक जगहों से ये सामने आ रहे हैं। श्रीलंका हमले के बाद केरल से कुछ लोग गिरफ्तार गए हैं। कहने का तात्पर्य यह कि खतरा काल्पनिक नहीं वास्तविक है।