राज्य में 30 लाख हैक्टेयर में धान हेतु किसान उत्साहित


जालन्धर, 9 जून (मेजर सिंह): पंजाब के पर्यावरण प्रेमी, सूझवान खेती विज्ञानी एवं विशेषज्ञ, चिंतक, अफसरशाही एवं किसानों का काफी हिस्सा धान की फसल के कारण धरती के निचले पानी की बर्बादी और पंजाब के पानी एवं जलवायु में आ रहे बड़े परिवर्तनों के कारण होने वाले नुक्सान को समझने भले ही लग गया है, परन्तु सरकार की नीति एवं नीत स्पष्ट न होने पर कोई उपयुक्त विकल्प उपलब्ध न होने के कारण पंजाब के किसान न चाहते हुए भी भविष्य की बर्बादी की ओर कदम बढ़ाते अगले सप्ताह राज्य की 75 लाख एकड़ जमीन में धान की लिफ्टिंग हेतु उत्साहित हुए बैठे हैं। कुछ वर्ष पहले पंजाब सरकार ने अग्रिम धान बीजने के साथ पानी एवं वातावरण की बर्बादी को कुछ नकेल डालने हेतु 20 जून से पहले धान की बिजाई पर पाबंदी लगा दी थी। इस फैसले के अच्छे प्रभाव भी सामने आने लगे थे। पहले वर्षों में धड़ाधड़ मोटरें चलाकर मई के अंत में ही धान की बिजाई शुरू हो जाती थी और फिर भीषण गर्मी के दिनों में पानी के भरे खेतों में पैदा होती उमस एवं दुर्गन्ध पंजाब के वातावरण का ऐसा नाश मारती थी कि अनेक तरह की बीमारियां भी फैलती थीं परन्तु 20 जून से धान लगाना शुरू होने से उमस एवं दुर्गन्ध से कुछ राहत मिलनी शुरू हुई थी। कुछ किसान संगठनों की मांग पर मुख्यमंत्री ने चुनाव प्रचार दौरान धान की बिजाई की तारीख 20 जून को बजाये 13 जून कर दी है। सरकार की ढील का परिणाम है कि पंजाब के अनेक क्षेत्रों में यह बिजाई भी शुरू हो चुकी है। धान का सारा बोझ धरती के निचले पानी पर : सरकारी आंकड़ों अनुसार पंजाब में इस समय 27 प्रतिशत जमीन की सिंजाई नहरी पानी से होती है और शेष 73 प्रतिशत सिंचाई ट्यूबवैल अर्थात धरती के निचले पानी पर निर्भर है। विगत लगभग पांच दशकों दौरान पंजाब की धरती के निचला पानी इतने घटिया तरीके से निकाला गया कि मानवता को जीवन देने वाला यह अनमोल शो सूखने के किनारे पर आ खड़ा है। 30-40 वर्ष पहले 5-7 फुट की तह पर पड़ा पानी अभ 3-4 सौ फुट गहरा चला गया है और पंजाब में हर वर्ष 10 फुट के करीब पानी ओर गहरा हो रहा है। किसानों को पानी निकालने हेतु हर 3-4 वर्ष बाद बोर नए करने पड़ते हैं और मोटरों के हार्स पावर बढ़ाने पड़ रहे हैं। नहरी पानी ने समय से मिलना है और नहरी पानी है भी कम परन्तु धान की फसल हेतु पानी की लगातार ज़रूरत पड़ती है। इसलिए धान की फसल पूरी तरह धरती के निचले पानी पर ही निर्भर करती है।सरकारी प्रयास अधूरे : पंजाब तंदरुस्त मिशन के चेयरमैन और खेती विभाग के सचिव स. काहन सिंह पन्नु धान की मार से पंजाब को बचाने हेतु बेहद चिंतित एवं जागरूक हैं। 20 जून के पश्चात धान की बिजाई का फैसला उनकी कई वर्ष की मेहनत का परिणाम था। उन्होंने बताया कि इस बार आधी मक्की एवं कपास की फसल तले रका बढ़ाने के प्रयास किए हैं। धान की फसल की सीधी बिजाई करवा रहे हैं जिसके तहत पानी का प्रयोग कम करके आधा रह जाता है। पंजाब में किसी समय 7 लाख एकड़ में नरमा कपास बीजा जाता था। कपास को स्प्रे की मार ने ऐसा मारा कि किसान धान की ओर चल पड़ा और विगत वर्ष कपास के संरक्षण में रकबा अढ़ाई लाख एकड़ तक सिमटकर रह गया। स. पन्नू ने बताया कि इस बार डेढ़ लाख एकड़ ओर रकबे में नरमा बीजा गया है और अब कुल रकबा चार लाख एकड़ से बढ़ गया है। इसी तरह दोआबा एवं कुछ माझा क्षेत्र में मक्की की बिजाई को उत्साहित किया जा रहा है। दोआबे में विभाग द्वारा पानी बचाने हेतु मक्की के लिए तुपका सिंचाई का अनुभव किया जा रहा है, यदि यह अनुभव कामयाब रहा तो अगले वर्ष से ओर बड़े स्तर पर तुपका सिंचाई शुरू की जाएगी। यह प्रयास बड़े अच्छे हैं परन्तु हालत जितनी गंभीर हो चुकी है उसका सामना करने के लिए ज्यादा प्रयासों एवं मेहनती लोगों की ज़रूरत है पंजाब में पानी बचाने हेतु लहर बनानी चाहिए।