बुखार ग्रस्त 


सिस्टर वालिया से इतना ही कह पायी—हां भई, बारह सिंगा की टांगें तो भागती ही रही थी, परन्तु वे सुन्दर सींग, जिन पर उसे नाज़ था झाड़ियों में उलझ कर
रह गये थे।
कैंटीन में सुजाता ने पूछा—पेशेंट को तीसरा अटैक था क्या?
—कहा, मुझे तो लगता है कि वह इमरजेंसी में आने तक ही... उसने फुसफुसाते हुए कहा।
—ओह...! उसकी ‘ओह’ में बिना बताये जज होने की बात भी थी।
—तुम्हारे पास कुछ पैसे होंगे पर्स में?
—लोन पास नहीं हुआ? सुजाता ने उसकी अर्जी पर गारंटी के लिए हस्ताक्षर किए थे।
—अभी नहीं।
—कितने चाहिए?
—तीन चार सौ।
—यह पांच सौ का नोट रखो।
उसने सोचा, लक्की को कुछ पैसे देकर मिस्टर वर्मा के पीने के ब्रांड का एक हाफ मंगवा ले। छुट्टी के दिन शाम को भोजन से पहले वह ज़रूर पीते हैं। उनका प्रिय
जुमला है—संडे की शाम नमकीन होनी चाहिए। दारू के दो पैग के साथ नमकी। भोजन में चावल नमकीन। बिस्तर में पत्नी नमकीन।
लकी को बुलाते-बुलाते रुक गई। बीमे की किश्त भरने के पैसे दिये थे। बत्तीस रुपये बचे थे। एक पैसा भी वापिस नहीं किया। पहले कहा-पगार मिलने पर दूंगा।
फिर कहा-आप कोई डा. जैन थोड़े ही हो। पैसे-पैसे का हिसाब लेंगी। समझ लेना शनि ग्रह टल गया।
चाय के दो घूट ही भरे थे कि लकी आ गया-बसुधा मैडम, कहां-कहां नहीं ढूंढा आपको। डा. जैन बुला रहे हैं।
—लगता है एडवांस पास हो गया।
—अच्छे की उम्मीद ही करनी चाहिए।
—मैडम, आज आप घर जाने वाली होंगी।
—जी-नो सर।
—सच कहूं तो मुझे आपकी सकारात्मक सोच पसंद है।
—धन्यवाद, सर।
—आज शाम चैम्बर में एक मीटिंग है। कोई बड़ा समारोह नहीं। सिर्फ चंद लोग। आप सुरुचिसरपन्न महिला है। मैं चाहता हूं व्यवस्था आप पर रहे। आप रेगुलर
रेस्ट के अलावा एक छुट्टी और कर लेना। ठीक है न...।
—यस सर।
—ज़रूरत की चीजें अखिलेश को बता दें। बाज़ार का काम लकी कर देगा। उसने सोचा कि मौका अच्छा है। कहा—सर मेरी लोन की अर्जी।
—अगले हफ्ते देख लेंगे। चिंता न करो। अंग्रेज़ी में कहकर वह मोबाइल में मस्त हो गए।
वसुधा ने सोचा-चील के घोंसले में मास। एक छुट्टी मिल रही है, वही सही। पिंकी की छुट्टी करवा लेगी। एक दिन उसके साथ ज्यादा गुजर जायेगा। डा. जैन के
प्रशंसा सूचक वाक्य में इठलाना चाहा—डॉ जैन सीधा क्यों नहीं कहते कि उसकी सुन्दर उपस्थिति मात्र से काफी कुछ हो जाता है।
मीटिंग की व्यवस्था देखते हुए वह मुस्कराते ज़रूर रही, परन्तु मीटिंग का उद्देश्य जान कर लगा कि जैसे आंतड़ियां नुच गई हों। मीटिंग में शहर का सिविल
अस्पताल खरीदने की दलाल व्यवस्था का खाका तैयार होना था। पेट की अजीब हालत हो रही थी। पहले लगा कि ठीक से खाना नहीं खाने से ऐसा हो रहा है। फिर
लगा कि कोई कांच की नुकीली किर्च धंस रही है। कहांइलाज के लिए जायेंगे गरीब लोग? 
मां का इलाज महंगा था। वह दर्द उठने पर रात-रात भर चुन्नी का पल्लू मुंह से दबाती रहती ताकि पिता जी को पता न चले।