लड़ना भी एक कला है


अन्य कलाओं की तरह लड़ना भी एक कला है। कलाकार केवल वह नहीं जो चित्र बनाता है। एक जेबकतरा भी कलाकार ही है। जो जितनी हाथ-सफाई से जेब काट सके, वह उतना ही महान जेब कतरा होगा। इस लिहाज से हमारे सरकारी बाबू भी कुछ-कुछ इसी कैटेगरी में जाते हैं। जो ‘अन्डर दि टेबुल’ अपना काम बखूबी निकाल सके, वह ही सच्चा सेवक है। वैसे सच्चा सेवक कहलाने का लाइसैंस हमारे पूजनीय नेताओं के पास है। देश-सेवा के नाम पर मेवा कूटने की कलाकारी उन्हें विरासत में ही मिल जाती है। हमारे फिल्मी कलाकार भी ‘हम किसी से कम नहीं’ की अदा में अपनी अदाकारी का जलवा दिखलाते हैं। आज कलाकारों की कमी नहीं है। आपकी पारखी नज़र होनी चाहिए। लड़ना भी कला है, तभी तो हमारे नेतागण चुनाव सलीके से लड़ते हैं। कभी चोर को चौकीदार और कभी चौकीदार को चोर की संज्ञा से नवाज़ा जाता है। यह दूसरी  बात है कि आम जनता को वे सम्मोहित कर पाते हैं और वह बेचारी चोर और चौकीदार की कथित लड़ाई में पुन: ठगी जाती है। नेताओं के रंग बदलने की  कलाकारी गिरगिट को भी मात देने लगती है। कभी माया तो ठगनी कहा जाता था, लेकिन अब कुर्सी ‘महाठगनी’ बन गई है। दलों को लड़वाती है, दोस्ती को  दुश्मनी और दुश्मनी को दोस्ती में बदलवा देती है। आया राम, गया राम के खेल में भी कलाकारी छिपी रहती है। जिधर तर माल दिखता है, चुनाव दीवाने उधर ही खिसक जाते हैं। देश और आस्थाओं को सिर पर बिठाने के स्थान पर अपने पैरों से रौंदने से भी नहीं शरमाते। देश-भक्ति के नाम पर देश को चूना लगाने वाले  महान कलाकारों के आगे सभी नत-मस्तक हो जाते हैं। हमारे मान्य सांसद एवं विधानसभा सदस्य भी यदा-कदा अपनी कलाकारी का प्रदर्शन सैशन के दौरान करते रहते हैं। जब वे मल-युद्ध करते हुए हाथों का कमाल दिखाते हैं तो देखने वालों को अपने होंठों तले उंगली दबानी पड़ती है। सदन में लगे स्टील माइक, कुर्सी टेबल, पेपरवेट, जूते चप्पल आदि घायल अवस्था में पड़े उनकी पहलवानी का शिकार बन जाते हैं। देश की गम्भीर समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने का यह एक नायाब तरीका है। अपने माथे का दोष दूसरे के माथे पर मढ़ना भी एक कला ही है। चुनाव युद्ध के समय तो दोषारोपण का खेल अपने चरम पर रहता है। एक-दूसरे के बाप-दादाओं तक का कथित कच्चा चिट्ठा भी खोल दिया जाता है। जनता को इन कलाकारों का खेल बेचारगी में देखना पड़ता है और तालियां पीटनी पड़ती हैं। पति-पत्नी में तकरार और कभी-कभी मार-पीट का ड्रामा चलता ही रहता है। निपुण दम्पत्ति अपनी कला का प्रदर्शन तब भी करता है जब उनके यहां कोई अनचाहा मेहमान टपक पड़ता है। उनके वाक-युद्ध की मार न सह पाने वाला अतिथि तुरन्त नौ-दो ग्यारह होने में ही अपनी भलाई समझता है। हां, कभी-कभी सेर को सवा-सेर भी मिल जाता है और दम्पति को कहना पड़ता है कि ‘अतिथि तुम कब जाओगे।’ वैसे कुछ मानना है कि आपसी तकरार और ‘तू-तू, मैं-मैं’ का खेल पति-पत्नी में आपसी प्यार को बढ़ाता है। इन्सान गलती का पुतला कहलाता है, लेकिन अपनी गलती का ठीकरा अक्सर दूसरे के सिर पर फोड़ने की कला में प्रवीण ही प्राय: जीत पाता है। त्रिया-हठ तो जग-जाहिर है, इसके आगे इन्सान तो क्या, भगवान को भी झुकना पड़ता है। कभी-कभी शिकारी खुद अपने जाल में फंस जाता है। वैसे यह रंग-बाजियों और कला-बाजियों का दौर है। ऐसे में यह पता नहीं चलता कि सामने वाला हमारी तरफ गले मिलने के लिए बढ़ रहा है या गले पड़ने की फिराक में हैं। और भी लड़ने की कलाकारी देखनी हो तो दारूबाजों की महफिल में जाइए।

मो. 94171-08632