पश्चाताप


बात 1926 की है। गांधी जी उन दिनों साबरमती आश्रम में रहा करते थे। दीनबंधु सी.एफ. एण्ड्रूज भी उन दिनों वही  थे। दीनबन्धु दया के सागर थे, दूसरों का दुख देख वे द्रवित हो जाते थे। एक दिन मालाबार की ओर से कांग्रेस कमेटी का मंत्री गांधी जी के पास आया। उसने सार्वजनिक कोष का बहुत-सा धन लोकसेवा में खर्च किया था। लेकिन हिसाब-किताब में वह कच्चा था। सारा जमा-खर्च वह ठीक से पेश न कर पाया। हज़ार रुपए की बात थी। स्थानीय कार्यकारिणी का निर्णय था, ‘जमा-खर्च पेश करो या फिर पैसे भरो।’ उसने कहा, ‘इतने पैसे कहां से दूं?’ सदस्य ने कहा, ‘हम क्या बताएं? सार्वजनिक काम का हिसाब-किताब ठीक से रखना चाहिए था।’ उसने कहा, ‘बापू के पास जाता हूं। वे कह दें, तब तो मानोगे?’ सदस्य ने कहा, ‘हां मान लेंगे।’ वह मंत्री गांधी जी के पास पहुंचा। उनको सारी बातें बताकर बोला, ‘बापू! मैं स्कूल की नौकरी छोड़कर सार्वजनिक सेवा के लिए अपने आपको समर्पित कर चुका हूं। मैंने एक भी पैसा अपने काम में नहीं लगाया है।’ गांधी जी ने कहा, ‘तुम जो कह रहे हो, वह सच हो सकता है। लेकिन तुम्हें पैसे भरने चाहिए। सार्वजनिक काम में व्यवस्थिता बहुत ज़रूरी है।’ मंत्री बोला, ‘मुझसे भूल हो गई। इसका मेरे मन में पश्चाताप है। गलती तो हो गई, लेकिन अब क्या हो?’ गांधी जी बोले, ‘पैसा भरना ही एकमात्र उपाय है।’ वह युवक रोने लगा। पास ही दीनबन्धु खड़े थे। वे दुखी होकर बोले, ‘बापू! यह आदमी पश्चाताप कर रहा है। आप उससे इतनी कठोरता से क्यों बोलते हैं।’ गांधी ने कहा, ‘पश्चाताप केवल मन में होने से क्या लाभ? दोष का परिमार्जन हो, तो ही कहा जा सकेगा कि वास्तविक पश्चाताप हुआ। यह कुछ नहीं। इस युवक को अपनी भूल सुधारनी चाहिए। जनसेवक है यह।’ गांधी जी प्रेम-सागर थे। लेकिन समय आने पर वे कर्त्तव्य-निष्ठुर हो जाते थे। कभी-कभी तो कठोरता के साथ किए गए इन्कार में ही अपार करुणा होती है।

—मनीषा देवी