कश्मीर संबंधी पाकिस्तान की हड़बड़ाहट


पिछले महीने 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर में धारा 370 खत्म करने के ऐलान से जो तूफान उठा था, वह स्वाभाविक था। इसलिए कि भारत सरकार की ओर से ऐसा कदम उठाने की उम्मीद नहीं की जाती थी। गत 70 वर्षों से पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के इस क्षेत्र को हथियाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाये रखी है। विभाजन के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की कमज़ोरी के कारण पाकिस्तान ने हमला करके जम्मू-कश्मीर का काफी हिस्सा हथिया लिया था, जो आज भी उसके पास है। उसी समय यहां के महाराजा हरी सिंह द्वारा भारत के साथ इस राज्य को भारत में मिलाने संबंधी किये गये समझौते के बाद भी पाकिस्तान ने अपने द्वारा हथियाये क्षेत्र से अपना अधिकार नहीं छोड़ा था। जबकि भारत इसको हमेशा अपना अंग समझता आया है। इस मामले पर पाकिस्तान ने तीन युद्ध ही नहीं लड़े, अपितु हर समय इस मामले को लेकर भारत की अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आलोचना भी की है। अपनी पेश न जाती देख वहां की तत्कालीन सरकारों ने आतंकवादियों के बड़े समूह तैयार करके भारत भेजने जारी रखे, जिन्होंने गत 30 वर्षों से यहां खून-खराबा जारी रखा हुआ है। यहीं बस नहीं, पाकिस्तान के प्रशिक्षित इन आतंकवादियों ने मुम्बई में भी बड़े हमले किये। देश की संसद पर हमला किया। भारतीय विमानों का अपहरण किया और हर समय देश को चुनौती दी। पाकिस्तान ने समय-समय पर परमाणु बम की धमकियां भी दी। जब देश को दीवार से लगा दिया गया तो उस समय भारत सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष अधिकार हटा कर इसको भारत के साथ जोड़ने के ऐलान ने पाकिस्तान को बड़ा धक्का लगाया। उस समय से पाकिस्तान बुरी तरह बौखला कर हाथ-पांव मार रहा है। उसने अपने साथी देश चीन को भी सहायता के लिए पुकारा। चीन ने उसकी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सहायता करने का प्रयास भी किया, परन्तु सुरक्षा परिषद् इस मामले पर पाकिस्तान के साथ खड़ी नहीं हुई, क्योंकि अधिकतर देशों को यह एहसास है कि पाकिस्तान आतंकवादियों का केन्द्र बन चुका है, जो दुनिया भर के लिए बड़ा ़खतरा है। इससे पहले चीन के विदेश मंत्री भी पाकिस्तान आये। उन्होंने पाकिस्तान के साथ खड़े होने का समर्थन दिया, परन्तु इसके साथ ही यह भी कहा कि दोनों देशों को आपस में बातचीत करनी चाहिए। दुनिया के लगभग सभी देशों ने भारत के इस पक्ष का समर्थन किया है कि दोनों देश मिल-बैठ कर अपने मामले हल करें। जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दोनों में मध्यस्थता करने की पेशकश की, तो भारत ने उसको स्वीकार नहीं किया था। अब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् के पास पहुंच करके कश्मीर के लोगों के अधिकारों-हितों की दुहाई दी है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने स्विटज़रलैंड के जिनेवा शहर में इस परिषद् के 42वें अधिवेशन में बोलते हुए यह कहा कि भारत के कब्ज़े वाले कश्मीर में मानवाधिकारों का हृनन किया जा रहा है। अधिवेशन में इसके जवाब में भारत की वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ विजय ठाकुर सिंह ने कहा कि पाकिस्तान आज आतंकवादियों का केन्द्र बन चुका है, जिससे दुनिया भर को खतरा है और यह भी इस देश को मानवाधिकारों की बात करने का इसलिए अधिकार नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान में आज सेना द्वारा बलोचिस्तान तथा सिंध के लोगों पर बड़े जुल्म किये जा रहे हैं। उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है और उनके आन्दोलनों को भी कुचल कर रख दिया गया है। इसके साथ भारत ने अपने इस पक्ष को पुन: दोहराया है कि जम्मू-कश्मीर देश का अटूट हिस्सा है और यहां कोई भी बदलाव करना उसका आंतरिक मामला है। नि:संदेह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान इस मामले पर बुरी तरह पिछड़ गया है और अकेला रह गया प्रतीत होता है।  जहां तक मानवाधिकारों का संबंध है इसकी मानवाधिकार परिषद् की उच्चायुक्त ने भारत को कश्मीर में लगाये प्रतिबंध हटाने की अपील की है और वहां नज़रबंद किये गये नेताओं तथा अन्य लोगों को रिहा करने के लिए कहा है। भारत ने इसके जवाब में पाबंदियां हटाने के बाद हिंसा बढ़ने की सम्भावना प्रगट की है। इस मामले संबंधी भारत सरकार की चिंता अवश्य सामने आती है। यदि पाबंदियां हटाने के बाद कश्मीरी लोग कोई बड़ा आन्दोलन करते हैं जिससे हिंसा भड़क सकती है, तो कश्मीर के हालात को सम्भाल सकना भारत सरकार के लिए मुश्किल बात होगी। इस समय कश्मीर के हालात भारत सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन कर उभरे हैं। इस संबंध में अब तक अनेक ही बड़े प्रशासनिक कदम उठाये जा चुके हैं, जिसका असर आगामी समय में देखा जा सकेगा, परन्तु यह सुनिश्चित है कि कश्मीर के लोगों को ऐसी स्थिति में लम्बे समय तक नहीं रखा जा सकेगा। ऐसी स्थिति का मुकाबला बड़ी समझबूझ और दृढ़ता से ही किया जा सकेगा।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द