अंधविश्वास की जंज़ीरें 


हमारे आस-पास की दुनिया में इतनी धारणाएं प्रचलित हैं जब भी कभी भूले-भटके हमारा उनके साथ सामना होता है तो हम विश्वास नहीं कर पाते। छोटी-छोटी घटनाओं, बातों, रस्मों में लोगों द्वारा इतनी शिद्दत से वहम जोड़े जाते हैं जिन्हें असलीयत में अलग कर पाना नामुमकिन हो जाता है। छींक आना असल में मानव शरीर में पैदा हुई छोटी-सी हलचल है अक्सर लोग ‘किसी द्वारा याद करना, मनहूसियत का संकेत’ आदि से जोड़े जाते हैं। बिल्ली द्वारा काटा गया रास्ता भी लोगों को फूटी आंख नहीं भाता। इसे लोग अपशगुन मानते हैं और वहीं रुककर भगवान को याद करने लगते हैं। आज के आधुनिक दौर में जब हर कोई कीर्तिमान स्थापित कर रहा है वहीं ऐसे अंधविश्वास हमारे कदमों में जंजीरें बनकर हमारे ख्यालातों को आगे बढ़ने से रोकते हैं। आज वक्त है हर जंज़ीर को तोड़कर खुद को हर तरह से  नए वक्त में ढालने की। नई सोच को अपनाने की ताकि हम सचमुच बदलते दौर के साथ चल सकें व उसमें ढल सकें।

—ट्ंिवकलदीप कौर सैणी