प्रेम व भाईचारे का त्यौहार है लोहड़ी



भारतीय संस्कृति में रचे बसे तीज-त्यौहार जहां आपसी प्रेम व भाईचारे को बढ़ावा देते हैं, वहीं इनसे मिलने वाली प्रेरणा से हर वर्ग व सम्प्रदाय के बीच रिश्ते भी अटूट बनते हैं। प्रति वर्ष मकर संक्रान्ति से पहले दिन समूचे उत्तर भारत में विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, दिल्ली व जम्मू-कश्मीर में ‘लोहड़ी’ का त्यौहार अत्यंत हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है।
इस त्यौहार को हिन्दू व सिख भाई पूरे उल्लास के साथ मनाते हैं। त्यौहार आने से कुछ दिन पूर्व बच्चों के विशेष झुण्ड शाम होते ही प्रचलित लोहड़ी गीत के साथ घर-घर में लोहड़ी मांगने जाते हैं। लोहड़ी गीत गाने वाले बच्चों को कुछ रुपए व मक्का की फुल्लियां, रेवड़ी इत्यादि दी जाती हैं। जिस परम्परागत गीत को गाया जाता है, उससे जुड़ी एक पौराणिक गाथा भी है लेकिन छोटे बच्चे गीत को कुछ यूं गाते हैं:
हुल्ले नी माये हुल्ले।
दो बेरी पत्तर झुल्ले।।
खजूरां सुट्टिया मेवा,
इस कुड़ी दा करो मंगेवा।।
लोहड़ी का त्यौहार विशेष रूप से मुगल काल में घटी एक घटना से जुड़ा है जो ‘दुल्ला भट्टी’ की याद में मनाया जाता है। इतिहास बताता है कि अकबर के जमाने में एक विख्यात डाकू दुल्ला भट्टी हुआ जो अत्यंत नेकदिल इन्सान था। वह सदैव गरीबों की भलाई करता था। अमीरों को हमेशा लूटता व जरूरतमंद गरीबों की मदद करता था। अकबर ने इस डाकू को पकड़ने के बड़े प्रयास किए लेकिन वह गरीबों का हमजोली था, इसलिए सदैव बच निकलता था। लोग उसे अपने घर में छिपा लिया करते थे, उसे पूजते थे।
एक बार एक गरीब ब्राह्मण की लड़की जिसका नाम सुंदरी था, उसके पास अपनी बेटी को दहेज देने के लिए कुछ भी नहीं था। उस समय की प्रथा के अनुसार उसे बेटी की शादी से पूर्व नवाब को विवाह-कर भी चुकाना था। जब लड़की की शादी का वक्त आया तो गरीब ब्राह्मण ने दुल्ला भट्टी से फरियाद की। दुल्ला भट्टी हालांकि मुस्लिम था लेकिन वह दिल में कभी भेदभाव नहीं रखता था। वह ब्राह्मण के घर आया और लड़की का भाई बन गया। उसने घर के लोगों को वचन दिया कि वह सुंदरी की शादी में पूरी मदद करेगा। यह वचन पाकर ब्राह्मण की जान में जान आई और वह निश्ंिचत हो गया।
यह खबर जब अकबर बादशाह तक पहुंची कि सुंदरी की शादी में दुल्ला भट्टी आयेगा तो बादशाह ने शादी के दिन सब तरफ चौकसी बढ़ा दी व सैनिक तैनात कर दिए। इधर ब्राह्मण को चिंता होने लगी किंतु शादी के दिन वायदे के अनुसार अपनी बहन की शादी में दुल्ला भट्टी आया। कहा जाता है कि अपने साथ शादी का ढेरों साजो सामान, चुन्नियां, कपड़े व जेवरात भी लाया। यहां तक कि वह साथ में सौ मन शक्कर भी गाड़ी पर लदवा कर लाया।
शादी पूरे रस्मो-रिवाज़ के साथ संपन्न हुई और जब सुंदरी की विदाई का समय आया तो उसे डोली में बैठाकर बारातियों को देने के लिए साथ में लायी शक्कर  अपनी शाल में भर-भर कर दी। विदाई के बाद अकबर के सिपाहियों ने दुल्ला भट्टी को चारों ओर से घेर लिया। दोनों ओर जमकर लड़ाई हुई परंतु दुल्ला भट्टी बच कर फिर जंगल में चला गया।
तब से यह घटना प्रेम व भाईचारे का प्रतीक बन गयी। दुल्ले ने अपनी बहन की शादी के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं की। तब से लेकर आज तक इस प्रसंग के परिप्रेक्ष्य में लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है व दुल्ला भट्टी की याद में यह गीत भी बड़े जोर-शोर व आदर के साथ गाया जाता है-
सुंदर-मुंदरिये, हो!
तेरा कौन बचारा, हो!
दुल्ला भट्टी वाला, हो!
दुल्ले धी ब्याही, हो!
सेर शक्कर पाई, हो!
कुड़ी दे बोझे पाई, हो!
कुड़ी दा लाल पटाका, हो!
कुड़ी दा सालू पाटा, हो,
सालू कौन समेटे, हो!
चाचे वारी दिती, हो!
इस गीत को सभी एक साथ गाते हैं व बाद में ‘हो’ को जोर से उच्चारित करते हैं। लोहड़ी के दिन रात के वक्त आग जलाई जाती है व सभी लोग उसके इर्द-गिर्द जमा होते हैं व खुशियों के गीत गाकर रेवड़ियां, मक्के के फुल्ले, खजूर व अन्य प्रसाद वितरित करते हैं। पंजाबियों में जिस लड़के व लड़की की शादी हो या शादी की पहली वर्षगांठ हो, उस दिन और भी खुशी से मनाते हैं। घर में नवजात बच्चा होने पर भी परम्परागत तरीके से यह त्यौहार मनाते हैं। हालांकि लोहड़ी का यह पर्व पूरे देश में मनाया जाने लगा है लेकिन फिर भी लोहड़ी का असली मजा व धूम तो पंजाब, जम्मू-कश्मीर व हिमाचल में ही देखने को मिलती है। (युवराज)