बाबू होने का मतलब
अगर आप सफेद हाथी हैं और आप महामक्खी चूस आदमी हैं। और आपके आसपास नौकरों की कोई लंबी फौज भी नहीं है लेकिन आपके ‘अगर खाने के दांत और’ और दिखाने के दांत ओर हैं। तब आपको भी छोटा मोटा बाबू माना जा सकता है।
वजन मतलब अर्थ होना। मोटी जेब का होना। जिसकी माली हालत बहुत अच्छी हो। जिसके पास अकूत संपत्ति हो। जिसके घर के आगे-पीछे नौकरों की फौज हो। जिनके घर के आगे दसियों गाड़ियां हमेशा खड़ी रहतीं हों। जो लाव-लश्कर लेकर चलता हो। जिसके छींकने भर से सारे शहर को जुकाम हो जाए। जो जगे तो दिन हो। जो थके तो थकान हो जाए लोगों को। अगर आपको आपके आसपास ऐसे लोग दिख जाएं। तो समझ लीजियेगा वो कोई ना कोई बाबू ज़रूर है।
बिना अर्थ के आप बाबू नहीं हो सकते। आपको सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हो सकती। आपके पास अगर अर्थ है। तभी आप बाबू हो सकते हैं। बिना अंटी में नोट हुए आप बाबू नहीं हो सकते। मैनें बहुत से हिस्ट्रीशीटर, गंड़े बदमाशों को जो पहले दो कौड़ी के आदमी थे। आज अंटी में रूपयों के कारण बाबू बने फिर रहें हैं। जिनका शहर में एक मुकाम है।
मैं वैसे लोगों को भी जानता हूं। जो शहर में अवैध तरीके से गर्भपात करते हैं। जो पेशे से डॉक्टर हैं। वो भी बाबू हैं। वो समाज सेवी हैं! वो उदघाटनों, मरनी-शादी-ब्याह में अतिथि हैं। वो शहर के जलसों के मुख्यातिथि हैं। वो सभा को संबोधित करतें हैं। ऐसे लोग जिनमें चलनी से ज्यादा छेद हैं। फिर भी बाबू हैं। यहीं नहीं रूकिए अभी। ये प्रगतिवादी हैं। ये समाजवादी हैं, ये गांधीवादी हैं, ये लोहियावादी हैं, ये दक्षिणपंथी हैं। तमाम तरह कि खूबियां इनमें हैं। और कमाल की बात ये है कि चमचे की तरह के कुछ लोग हमारे समाज में हैं जो इनकी वाहवाही करते हैं। इनकी तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं। वो ऐसे टुच्चे, उठाईगिर लोगों को समाज के सोपान की सीढ़ी बताते हैं।
वो इन लोगों की तरह ही पूरे देश या समाज को बनने के लिए या प्रेरित होने के लिए कहते हैं। जिनका कि इतिहास रक्तरंजित है। हमारे समाज के लिए ऐसे लोग एक मिसाल हैं। जिनके उदाहरण देते लोग नहीं थकते।
जिनके हवाला के कारोबार हैं। जो बार चलाते हैं। जो शहर में उल्टे-सीधे काम करके तीन का तेरह करना जानते हैं। वो बाबू हैं। दिलचस्प ये है कि उनकी सेवा में जो लोग लगे हुए हैं। और इन सामाजिक लोगों का ही दिया वो खाते हैं। ऐसे पत्रकार उनकी महफिलों-पार्टियों में जाकर खूब-छककर खाते हैं। तीन-चार लोगों की तिकड़ियां-चौकड़ियां हैं जो शहर के सबसे घटिया लोग हैं लेकिन अखबार चलाने वाले कॉलम लिखने वाले कॉलमनिस्ट इनको बाबू बताते हैं। तो चलिए उनके अनुसार उनको हम बाबू मान लेते हैं।
जिनको पुलिस जब-तब पकड़कर थाने ले जाती थी। वो भी आजकल बाबू बने बैठे हैं। जब से वो बाबू बन गए हैं। पुलिस कोट-कचहरी बड़े सलीके और तमीज से उन उठाईगिरों से पेश आती है। बाबू होते ही चापलूसी बतियाने वाले लोगों की जुबान में एक मिठास और तरावट आप चापलूसों की भाषा में महसूस कर सकते हैं। एक नफासत एक तमीज या एक अदब भी इन चापलूस लोगों में इन बाबूओं के प्रति दिखाई देती है।
बाबू शब्द शहद की तरह मीठा लगता है। पहाड़ की तरह भारी।
बाबूओं का आगाज तो बेहतर देखा ही है। इतिहास भी बेहतरीन देखा है। मरने के बाद भी या इतिहास बन जाने के बाद भी लोगों में चापलूसी करने वालों में नमक के रस्म की अदायगी भी देखी है। चापलूस जिस बाबू का नमक खाता है वो अंत तक उसको बाबू ही कहता है। रिश्वत या नमक की तरावट से उसका गला हमेशा भींगा ही रहता है।
बहुत से ऐसे लोग भी देखे जो ईमानदारी के पुतले थे। जो सचमुच के बाबू थे। जो तीन को तेरह नहीं करते थे लेकिन वक्त और हालात ने उनको धूल में मिला दिया। या वो धूल में मिला दिए गए।
-मेघदूत मार्केट फुसरो
बोकारो झारखंड, पिन-829144

