कहानी-मां

चलो मां जी, खाना लगा दिया है। शोभा ने बाहर बैठी सासूजी को आवाज लगाते हुए कहा। अरे मैं थोड़ी देर से खाऊंगी बहू, अभी भूख नहीं है।
क्या हुआ आपकी भूख को? 6 बज रहे हैं। खाना खा लो तो चौका सिमटे। बहू ने झुंझलाते हुए कहा।
अरे राकेश भी तो आने वाला है, तभी सब साथ में खा लेंगे-
समझ रही हूँ मैं, यही बात तो अखरती है। खा पी के निपटो तो दूसराें को भी काम की समझ पड़े। अपनी ही जिद चलाती हो, दूसराें का ध्यान नहीं रखती। शोभा ने मांजी की लगी थाली वापस रखते हुए स्वेटर की सलाइयां उठा ली लेकिन उसका बडबडाना जारी था।
बुडापा आ गया है, लेकिन बेटे का मोह नहीं छूटा। उनके खाने को लेकर चिंता करती रहेंगी, मेरे बिखेरे का कुछ नहीं सोचेंगी, खाना अब आराम से-
सलाईया चलाते हुए शोभा टीवी के सामने जा बैठी। बहू के डायलॉग पूरे हुए तो मांजी को सुकून आया। भूख तो लग रही थी लेकिन बेटे की चिंता हो रही थी।
साड़े छह बल्कि सात बज रहे थे। कितना काम रहता है ऑफिस में, एसी कैसी नौकरी? कुछ आक्रोश और कुछ आशा थी कि बस अब आता ही होगा राकेश।
तभी सामने से आता दिखा राकेश। माँ को बाहर बैठे देख समझ गया की आज माँ के और शोभा के डायलॉग सुनना है।
आंगन में पहुंचते ही मांजी शुरू हो गई ‘कितनी बजी है राकेश, हमारी कोई चिंता है या नहीं ऑफिस साड़े पांच बजे का है और तू सात बजे आ रहा है।’ 
माँ ऑफिस का काम खत्म करना पड़ता है। राकेश ने मुस्कराते हुए कहा और हम लोग नाश्ता कर लेते हैं दोपहर में। 
नाश्ते से क्या होता है खाना खाने की जगह है, चलो जल्दी खाना खाएं मेरा तो भूख के मारे बुरा हाल है।
पर माँ तुम तो खाना खा लिया करो।
क्यों मैं क्यों खालूं जल्दी? और तू टाइम से क्यों नहीं खाए? माँजी ने प्रति प्रश्न किया।
राकेश मुस्करा कर रह गया। वह जानता था की इस बहस से कोई लाभ नहीं है और ना ही इसकी कोई तार्किकता है। बस माँ को ये चिंता रहती है कि बेटा भूखा होगा। माँ जी आंगन से उठकर उत्साह से अन्दर की ओर लपकी ‘बहू खाना लगा राकेश आ गया है।’ 
हाँ-हाँ मुझे मालूम है आपका लाडला आ गया है, अब रुको मेरा सीरियल पूरा हो जाने दो, फिर लगाती हूँ।
अरे बहू मेरे को तो भूख लगी है जोरों से।
तो मैंने थोड़ी देर पहले कहा था खाना खाने के लिए, तब क्यों नहीं खाया? राकेश ने सब समझते हुए बीच में दखल दिया, अरे शोभा भई मेरे को भी भूख लग रही है जमके, खाना लगाओ जल्दी। मैं सब समझती हूँ माँ बेटे की चाल को। कुछ कुछ अलसाती बडबडाती शोभा उठी और दोनों की थाली लगाईं, दोनों ने खाना शुरू किया।
शोभा तुम भी खा लो। हां बस मैं भी खा ही रही हूँ, पप्पू जरा ट्यूशन से आ जाये वो अकेला नहीं खाता है।
पप्पू की पढ़ाई कैसी चल रही है? राकेश ने शोभा से अपने सात वर्ष के बेटे के बारे में पूछा।
बढिया सर मिले हैं अबकी बार। खूब मन लगाकर पढ़ रहा है, लो वो आ गया।
पप्पू ने आते ही बस्ता पटका और चिल्लाया मम्मी जोर की भूख लगी है।
आजा मेरा बेटा खाना तैयार है, कहते हुए शोभा ने पप्पू को लाड लडाया और अपने साथ खाना खिलाने बिठा लिया।
खाने से निवृत होकर मांजी अगले कमरे में अपने बिस्तर पर पहुंच गई थी। थोड़ी देर राकेश भी माँ के पास बैठा बतियाता रहा। दिन भर क्या हुआ, कुछ अगली कुछ पिछली, कुछ निरर्थक बातें करता रहा। जब लगा कि मां पर नींद का प्रभाव शुरू हो गया है तो उठ कर बेडरूम में आ गया।
शोभा पप्पू को सुला रही थी। शोभा के फ्री होने के इंतजार में राकेश टीवी पर नजरें जमाये कुछ सोचता रहा तभी शोभा की आवाज गूंजी ‘मिल गई फुर्सत मां के पास से श्रवण कुमार को?’
हंसता हुआ राकेश शोभा के चेहरे को अपने दोनों हाथो में लेकर प्यार से बोला-‘हां अब सारी रात तुम्हारी है बोलो क्या आदेश है?’
हटो भी बातें बहुत बनाना आती है तुम्हे, मेरा सीरियल रोज छुट जाता है या तो तुम ऑफिस से टाइम पर घर आया करो या माँजी को समझाओ कि खाना टाइम से खा लिया करे, ताकि मेरा चौके का काम समय पर निपटे।
पर क्या फर्क पड़ता है शोभा ये तो बहुत छोटी सी बात है।
हां छोटी सी बात है पर अब बुढापा आ गया है टाइम से खाना खा लेना चाहिए ताकि दूसराें को भी फुर्सत मिले।
पर वो मेरी चिंता करती है ना शोभा।
रहने दो ऐसे ढोंग धतूरे, मैं पसंद नहीं करती, अब इस उम्र में क्या इतना मोह। शोभा ने बहुत हलके से राकेश को प्रति उत्तर दिया।
ठीक है भई जैसी तुम्हारी सोच। पर मैं किसी दिन तुम्हें इसका सटीक जवाब दूंगा बाद का वाक्य राकेश ने कुछ धीरे बुदबुदाते हुए बोला।
क्या बडबडा रहे हो मन ही मन में।
कुछ नहीं तुम्हारा नाम ही ले रहा हूँ बस राकेश ने परिहास किया।
हटोझूठे कहीं के। पति पत्नी की चुहलबाजी चलती रही।
तीन सदस्यों का छोटा सा परिवार था, जो पप्पू के आने के बाद महक उठा था। राकेश अपनी मां का बहुत लाडला था मां उसके लिए बहुत चिंतित रहती थी। बचपन में उसे भूख लगती तो मां का हाथ पकड़ कर सीधे दूध के लोटे तक ले जाता था और मां निहाल हो जाती थी।
राकेश जानता था मां का उसके लिए शाम को इंतजार करना या खाने की चिंता करना सामान्य दृष्टि से देखा जाये तो केवल बुजुर्गों का एक शगल मात्र ही लगेगा लेकिन इसके पीछे मातृत्व की दबी हुई कोई तीव्र भावना या बेटे को समय पर खाना खिलाने की उत्कंठा और उससे प्राप्त होने वाली आत्म तुष्टि की इच्छा ही तो काम कर रही होगी। हालांकि ये सब गहरे अहसास की बातें थी जो किसी मां को ही समझ में आ सकती थी। राकेश ऐसे किसी मौके की तलाश में था जब शोभा को इस छोटी सी बात का तीव्र अहसास करा सके।
राकेश का 7 वर्षीय बेटा सेंट पाल स्कूल के दूसरे दर्जे में पड़ता था। आज ही स्कूल के छह माही टेस्ट पूरे हुए थे। अगले रविवार स्कूल वालों ने बच्चो के लिए शहर से 50 किलोमीटर दूर एक पिकनिक स्पॉट का टूर अरेंज किया था। शोभा की तो जरा भी इच्छा नहीं थी लेकिन पप्पू की जिद और राकेश के समझाने पर उसने सारी तैयारी कर दी थी।
खाने का टिफिन पानी की बोतल कपड़े और इन सबसे ज्यादा उस छोटे से बच्चे को शनिवार दिन भर निर्देशों का डोज देती रही, यहां मत जाना पानी से दूर रहना मस्ती मत करना ऐसी कई सीख देते हुए दोनों पति पत्नी पप्पू को रविवार सुबह स्कूल ग्राउंड पर छोड़ने आये। (क्रमश:)

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