मेरा तथा मेरे पूर्वजों का आनंदपुर साहिब

मेरा पैतृक गांव सूनी है। तहसील गढ़शंकर तथा ज़िला होशियारपुर, परन्तु मैं इस गांव में सिर्फ 6 वर्ष की रहा हूं। माहिलपुर के स्कूल व कालेज में पढ़ते समय। उससे पहले खन्ना मंडी के निकट अपने ननिहाल तथा उसके बाद दिल्ली तथा अब 40 वर्षों से चंडीगढ़ हूं। दिल्ली जाने से पहले औड़ का दशहरा तथा नवांशहर की कृष्ण लीला के अतिरिक्त यदि कोई जोड़ मेला मुझे पसंद था तो छोटे साहिबज़ादों वाला फतेहगढ़ साहिब या बड़े साहिबज़ादों वाली चमकौर की गढ़ी, परन्तु जो मज़ा आनंदपुर साहिब का था, उसका कोई जवाब नहीं था। दूरी बीस कोस से अधिक थी, परन्तु ऊंट की सवारी तथा इधर-उधर बिखरे पौधे मन लगाए रखते थे। यह क्षेत्र पर्वतों के पास होने इन गांवों के निवासी ऊंठ रखते थे और उन पर मैदानों से सामान ऊंचे स्थानों पर ले जाते थे और वहां का सामान मैदानों में ले आते थे। कालेज की पढ़ाई के बाद रोज़ी-रोटी के लिए दिल्ली जाना भी स्वाभाविक था। वहां मेरी माता के मायके तथा बुआ के बेटे टैक्सियों के मालिक तथा चालक थे। सड़कें तंग थीं, परन्तु कमाई गढ़शंकर से अधिक। मैं उस मामा के पास गया था, जो टैक्सी यूनियन के सैक्रेटरी थे। उनके काम का केन्द्र रेलवे स्टेशन था। चांदनी चौक में गुरुद्वारा शीशगंज के निकट कूचा चौधरी में।
अत: मैं आनंदपुर साहिब से चांदनी चौक पहुंच गया। कूचा चौधरी से रेलवे स्टेशन को जाते हुए शीशगंज बाएं हाथ था। यहां ऊंटों की जगह बिजली से चलने वाली गाड़ी होती थी जिसे ट्रैम कहते थे। इसमें कोई टिकट नहीं लगती थी। जहां तक मुझे याद है, बूढ़े तथा मेरे जैसे बेकार लोग आम ही चढ़ते-उतरते थे। दरिया गंज, जामा मस्जिद, लाल किला, पुल बंगश तथा पहाड़ गंज, जहां मज़र्ी जाओ।
आज मेरी आयु न ही ऊंट की सवारी करके आनंदपुर साहिब जाने की आज्ञा देती है और न ही ट्रैम में सवार होकर चांदनी चौक जाने की। ट्रैम तो वैसे ही बंद हो चुकी है। अब तो इलैक्ट्रानिक तथा प्रिंट मीडिया ही बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आनंदपुर साहिब की पवित्र भूमि पर उपस्थित होने की बजाय कुरुक्षेत्र से ही श्री गुरु तेग बहादुर जी की महिमा गाकर लौट गए थे। वह क्या जाने कि कई सप्ताह से आनंदपुर साहिब सफेद रौशनी से रौशन हो रहा है। यहां 100 वर्ष पुराना नगारा गूंज रहा है और श्रीनगर से भी एक नगर कीर्तन पहुंच रहा है। देश-प्रदेश में हाज़िरी लगाने वाले प्रधानमंत्री का इस पवित्र अस्थान पर नतमस्तक हुए बिना लौट जाना लापरवाही को और उभार रहा है।
इसलिए भी कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब के 350वीं शहीदी शताब्दी को समर्पित शीश मार्ग नगर कीर्तन की आरंभता गुरुद्वारा शीशगंज साहिब, दिल्ली से हुई। यह नगर कीर्तन उन अस्थानों से होते हुए आनंदपुर साहिब पहुंचा, जहां पर भाई जैता जी गुरु जी का शीश लेकर ठहरे थे। नगर कीर्तन का पहली रात का विश्राम गुरुद्वारा साहिब पातशाही नौवीं डरांवड़ी में था। 26 नवम्बर को यह नगर कीर्तन गुरुद्वारा शीशगंज साहिब, अंबाला के लिए रवाना हुआ। इसके बाद 27 नवम्बर को अंबाला से आरंभ होकर गुरुद्वारा श्री नाढा साहिब (ज़ीरकपुर) पहुंचा। 28 नवम्बर को ज़ीरकपुर से रवाना होकर गुरुद्वारा बिबाणगढ़ साहिब (कीरतपुर साहिब) तथा 29 नवम्बर को यह नगर कीर्तन गुरुद्वारा बिबाणगढ़ साहिब से पैदल चल कर गुरुद्वारा शीश गंज साहिब, श्री आनंदपुर साहिब में सम्पूर्ण होना था। इसमें पांच तख्त साहिबान के जत्थेदार, निहंग सिंह दलों के प्रमुख, दमदमी टकसाल, अलग-अलग सिख साम्प्रदायों के प्रमुख तथा पंथक शख्सियतों ने शिरकत करनी थी और की। अन्य भी दर्जनों स्थान हैं, जहां उपस्थित होकर गुरु साहिब को श्रद्धा के फूल भेंट किए जा सकते थे, क्यों नहीं किए गए, प्रधानमंत्री जाने या उनका स्टाफ। 
मेरे पिता जिनका 1998 में निधन हुआ था, की आत्मा ही जानती होगी कि श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी शताब्दी को समर्पित नगर कीर्तन तथा अन्य  समागमों का संबंध पंजाब के गुरदासपुर, फरीदकोट, अमृतसर तथा तलवंडी साबो तक ही सीमित नहीं था। इनके पद चिन्हों पर चल कर पता चलता है कि यह श्रीनगर से दिल्ली दक्षिण के अतिरिक्त सात समुद्र पार भी आयोजित किए गए हैं, जिनका केन्द्र आनंदपुर साहिब रहा।   
गांव तथा इलैक्ट्रानिक मीडिया से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति यह भी जानता है कि इन समागमों का मुख्य केन्द्र आनंदपुर साहिब रहा। यहां 23 नवम्बर को श्री अखंड पाठ साहिब का आरंभ हुआ और इसके साथ ही सर्वधर्म सम्मेलन तथा गुरु साहिब से संबंधित प्रदर्शनी का उद्घाटन भी आकर्षण का केन्द्र बने। इनके अतिरिक्त विरासत-ए-खालसा, भाई जैता जी मैमोरियल तथा पांच प्यारे पार्क के गाइड टूर ने संगत को 350 वर्षों के इतिहास से जोड़ा। अगले दिन 24 नवम्बर को कीरतपुर साहिब से शीश भेंट कीर्तन, हैरिटेज वाक, ढाडी एवं कवीशरी दरबार, गतका तथा ड्रोन शो ही नहीं, गुरु साहिब के जीवन तथा शिक्षाओं संबंधी नाटक तथा कविताओं ने श्रोताओं का मन मोह लिया। अखंड पाठ साहिब के भोग की सम्पूर्णता वाले दिन 25 नवम्बर को राज्य स्तरीय रक्तदान शिविर तथा साढ़े तीन लाख पौधे लगाने की मुहिम ने ध्यान आकर्षित किया, परन्तु इन गौरवशाली समागमों का समापन सरबत की एकत्रता से हुआ, जहां श्री गुरु तेग बहादुर विश्वविद्यालय की घोषणा ने क्षेत्रवासियों को बाग-बाग कर दिया। इसलिए कि यह विद्यालय गुरु साहिब के जीवन तथा फलसफे को रौशन करके भावी पीढ़ियों का मार्ग दर्शक बना रहेगा। मुझे इस बात की खुशी है कि अब वहां जाने के लिए वाहनों का कोई अंत नहीं।

#मेरा तथा मेरे पूर्वजों का आनंदपुर साहिब