पंचायती राज की मज़बूती
अंतत: पंजाब में पंचायत समितियों और ज़िला परिषदों के चुनावों की घोषणा कर दी गई है। इससे पहले ये चुनाव वर्ष 2018 में हुए थे और वर्ष 2023 में इनकी अवधि समाप्त हो गई थी। मौजूदा सरकार ने यह भी कहा था कि ये चुनाव वर्ष 2023 में नवम्बर और दिसम्बर माह में करवाए जाएंगे परन्तु इनके लिए अनेक रुकावटें सामने आईं। कई केस अदालत में चलने लगे, जिस कारण बार-बार इन्हें टाला जाता रहा परन्तु अब इस घोषणा से एक बार फिर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में एकाएक बड़ी गतिविधि देखने को मिली है। यहां तक कि भाजपा जैसी पार्टी ने भी एकाएक यह बयान देने शुरू कर दिए हैं कि वह इन चुनावों को पूरी दृढ़ता से लड़ेगी। इसके लिए उसने पंजाब के अपने वरिष्ठ पदाधिकारियों को काम भी सौंपने शुरू कर दिए हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की भावना निचले स्तर तक पहुंचाने के उद्देश्य से 33 वर्ष पहले वर्ष 1992 में संविधान में 73वां संशोधन करके पंचायती राज प्रबन्ध को प्रत्येक पक्ष से चुस्त-दुरुस्त करने के लिए इसका विधि विधान बनाया गया था।
ये चुनाव प्रत्येक 5 वर्ष बाद होने निर्धारित किए गए थे। इन दोनों संस्थाओं का काम पंचायतों के कामकाज़ को प्रत्येक पक्ष से आगे बढ़ाना है। विशेष रूप से अपने-अपने क्षेत्रों में छोटे-बड़े सिंचाई के काम देखने, युवाओं को औद्योगिक और रोज़गारोन्मुखी पढ़ाई में सहायता करना, गांवों के उद्योग को उत्साहित करना, साफ-सफाई और स्वास्थ्य आदि का ध्यान रखना आदि इन संस्थाओं के कामों में शामिल हैं। पंचायतों द्वारा खर्च किए गए फंडों का विवरण जानना भी इनके क्षेत्र में है। इसके साथ ही कानून के अनुसार इन संस्थाओं के लिए फंड उपलब्ध करवाने के स्रोत भी बनाए जाने का प्रबन्ध किया गया है। पंचायती राज का संकल्प ग्रामीण क्षेत्रों को सुचारू ढंग से विकास के मार्ग पर लाने का यत्न करना है। चाहे यह कानून बने तीन दशकों से भी अधिक का समय हो गया है परन्तु क्रियात्मक रूप में यह अपने निर्धारित लक्ष्यों से बहुत पीछे प्रतीत होता है। ये क्रियान्वयन एक तरह से राजनीतिक माहौल में ही बदले दिखाई देते हैं और ज्यादातर ये ग्रामीण समाज में दरार डालने और आपसी दुश्मनियां पैदा करने का कारण बनते हैं। तत्कालीन सरकारें भी इस समूचे प्रबन्ध में अपने ढंग-तरीके से बदलाव करने का यत्न करती रही हैं, क्योंकि इन संस्थाओं के लिए फंड उपलब्ध करवाना प्रदेश सरकार की ज़िम्मेदारी होती है या उसके द्वारा ही इन फंडों का विभाजन किया जाता है।
हम समझते हैं कि निचले स्तर के अच्छे संकल्प से शुरू की गई इस गतिविधि को सभी राजनीतिक पार्टियों और अन्य पक्षों द्वारा इसके संकल्प की भावना के अनुसार ही लेना चाहिए, ताकि इसकी गतिविधियां विकासोन्मुखी हो सकें और अच्छे समाज का निर्माण करने में भी सहायक हों। इन चुनावों की समूची प्रक्रिया इनकी घोषणा के साथ ही शुरू हो गई है और अलग-अलग चरणों से गुज़रते हुए इसके परिणाम 17 दिसम्बर को सामने आएंगे। वर्ष 2027 में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में की जा रही यह बड़ी कवायद एक तरह से सरकार सहित अन्य राजनीतिक पार्टियों की भी विधानसभा चुनावों से पहले एक परीक्षा ही होगी, क्योंकि इस प्रक्रिया में एक करोड़, 36 लाख से भी अधिक मतदाता भाग ले रहे हैं। एक और बड़ी बात यह कि इन चुनावों के लिए 50 प्रतिशत महिला उम्मीदवार लाज़मी बनाए गए हैं। जिससे महिला वर्ग के भीतर भी बड़ा विश्वास पैदा होने की उम्मीद होगी, चाहे पहले महिलाओं को पंचायती संस्थानों में प्रतिनिधिता देने की प्रक्रिया को सही ढंग से आगे नहीं बढ़ाया जा सका।
हम समझते हैं कि महिला वर्ग को इस प्रक्रिया में अपना पूर्ण योगदान डालना चाहिए और चुनावों के बाद इन संस्थाओं की गतिविधियों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेना चाहिए। यह बात महिला वर्ग की आज़ादी की साक्षी बन सकती है। हम कामना करते हैं कि ये चुनाव निर्विघ्न और तनाव रहित हों, ताकि यह प्रक्रिया हमारे समाज को एक नया संबल देने में समर्थ हो सके।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

