लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना देश-द्रोह नहीं 

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक शक्ति केवल चुनावों, संसदों और संवैधानिक संस्थाओं से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहां सत्ता से प्रश्न पूछने की कितनी स्वतंत्रता है। यदि सरकार की नीतियों की आलोचना करने पर राष्ट्रविरोधी, देशद्रोही या व्यवस्था विरोधी घोषित किया जाने लगे तो लोकतंत्र धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगता है। लोकतंत्र में सरकार राष्ट्र नहीं होती, सरकार केवल एक अस्थायी राजनीतिक व्यवस्था होती है जिसे जनता सीमित अवधि के लिए चुनती है। राष्ट्र जनता, संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों से निर्मित होता है। इसलिए किसी सरकार की आलोचना करना राष्ट्र की आलोचना नहीं माना जा सकता। यह लोकतांत्रिक अधिकार ही नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की आवश्यक शर्त है। 
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(ए) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि प्रैस की स्वतंत्रता इसी संवैधानिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। लोकतंत्र में मीडिया का कार्य सरकारों का प्रचार करना नहीं, बल्कि जनहित में उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करना होता है। भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर बहसें सामने आई हैं। 
यह समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र में आलोचना और असहमति शत्रुता नहीं होती। लोकतंत्र का मूल आधार ही विविध विचारों और स्वतंत्र विमर्श पर टिका होता है। यदि कोई व्यक्ति सरकार की आर्थिक नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों, कानून व्यवस्था, बेरोज़गारी, महंगाई, भ्रष्टाचार या मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर प्रश्न उठाता है, तो वह लोकतांत्रिक दायित्व निभा रहा होता है। उसे राष्ट्रविरोधी कहना लोकतांत्रिक मूल्यों की आत्मा को आहत करना है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन लोकतंत्र स्थायी व्यवस्था है। विकसित लोकतंत्रों में सरकारों की तीखी आलोचना को भी लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का संकेत माना जाता है।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास भी इसी सत्य की पुष्टि करता है। औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय पत्रकारों और समाचार पत्रों ने ब्रिटिश सरकार की कठोर आलोचना की थी। यदि उस समय ब्रिटिश सरकार की आलोचना को देशद्रोह मान लिया जाता, तो भारत का स्वतंत्रता आंदोलन ही असंभव हो जाता। कई बार सत्ता से जुड़े कठिन प्रश्नों की जगह विपक्ष, सामाजिक समूहों या असहमति रखने वाले नागरिकों या पत्रकारों को निशाना बनाया जाता है। इससे लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होती है। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता को असहज प्रश्नों से बचाना नहीं, बल्कि उन्हीं प्रश्नों को जनता के सामने लाना होता है। विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रैस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का आधार माना जाता है। 
इसलिए प्रैस की स्वतंत्रता केवल पत्रकारों का अधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी तथा पत्रकारिता को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी के रूप में समझा जाए। सरकार की आलोचना करने वाला कोई भी नागरिक, नेता या पत्रकार देशद्रोही नहीं होता। वह लोकतंत्र के उस आवश्यक तंत्र का हिस्सा होता है जो सत्ता को जवाबदेह बनाए रखता है। लोकतंत्र में सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं। (एजेंसी)

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