मार्को रूबियो की भारत यात्रा के कूटनीतिक मायने
अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के भारत दौरे को केवल एक औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन, हिन्द-प्रशांत रणनीति, ऊर्जा राजनीति और चीन-अमेरिका प्रतिद्वंद्विता के नज़रिए से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ बताते हैं कि अमरीकी विदेश मंत्री रूबियो की यात्रा इस मायने में बेहद महत्वपूर्ण है कि भारत के पड़ोसी देश चीन की यात्रा पर गए अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प जहां तमाम चीनी प्रशंसा के पुल बांधने के बावजूद अपेक्षाकृत खाली हाथ स्वदेश लौटे थे। वहीं उनके ठीक बाद चीन पहुंचे अमरीका के प्रबल प्रतिद्वंद्वी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आपसी रिश्तों को मज़बूत कर खुशी-खुशी स्वदेश लौट गए। ऐसे में अमरीकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा महत्वपूर्ण संकेत देने वाली है।
इसके स्पष्ट मायने यह है कि शायद रूबियो की भी कोशिश पिछले सवा साल में बेपटरी हुई भारत-अमरीका रणनीतिक साझेदारी को पुन: पटरी पर लाना है ताकि रूस-चीन समेत यूरोपीय व अरब देशों की नज़रों में अमरीका का महत्व बना रहे। यह चीन के लिए भी अप्रत्यक्ष रणनीतिक संदेश है, क्योंकि यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब दक्षिण चीन सागर में तनाव, ताइवान विवाद और एशिया में चीन का विस्तार बढ़ा है। ऐसे में अमरीकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा का कूटनीतिक संदेश साफ है कि अमरीका एशिया में भारत को दीर्घकालिक संतुलनकारी शक्ति के रूप में देख रहा है। इससे चीन को संकेत जाता है कि भारत-अमरीका सहयोग अस्थायी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी की दिशा में बढ़ रहा है।
वहीं, रुबियो के भारत दौरे से रूस को भी संतुलित संदेश जाता है। वह यह कि भारत भले ही रूस से रक्षा और ऊर्जा सहयोग बनाए हुए है, लेकिन अब अमरीका भी भारत पर पूर्ण दबाव बनाने के बजाय व्यावहारिक कूटनीति रास्ता अपना रहा है। इसका कूटनीतिक अर्थ यह है कि अमरीका भी अब भारत को रूस से पूरी तरह अलग करने की बजाय धीरे-धीरे पश्चिमी रणनीतिक ढांचे के करीब लाना चाहता है, क्योंकि भारत भी रूस से संबंध बनाए रखते हुए अमरीका से तकनीकी और सामरिक लाभ लेना चाहता है। यह ‘नई संतुलित कूटनीति’का उदाहरण है। दौरे के पीछे तीन बड़े कारण हैं—पहला, चीन की बढ़ती आक्रामकताय। दूसरा, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट। तीसरा, वैश्विक सप्लाई चेन का पुनर्गठन। चूंकि अमरीका समझता है कि भारत के बिना हिन्द-प्रशांत रणनीति अधूरी रहेगी। इसलिए वह पुन: भारत को पटाने के लिए पहुंचे। इसलिए कूटनीतिक दृष्टि से यह भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता का संकेत है।
अमरीकी विदेश रूबियो अपने दौरे के क्रम में यह भी संकेत दे चुके हैं कि वह क्वाड को चीन-विरोधी संतुलन के रूप में मज़बूत करना चाहेंगे। जबकि चीनी प्रेम में भारत और अमरीका दोनों अब तक इसे नज़रअंदाज़ करते आये हैं। इसलिए उनकी इस भारत यात्रा का सबसे बड़ा रणनीतिक पहलू क्वाड बैठक रहा, जिसमें अमरीका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इसका मुख्य उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की सैन्य और आर्थिक विस्तारवादी नीति का संतुलन, समुद्री सुरक्षा, टेक्नोलॉजी और साइबर सहयोग, सप्लाई चेन सुरक्षा, दक्षिण चीन सागर और ताइवान मुद्दे पर समन्वय स्थापित करना है।
चूंकि रूबियो ने भारत के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की बात कही है। लिहाजा इसके कूटनीतिक मायने ये हैं कि अमरीका भारत के ऊर्जा बाज़ार में प्रभाव बढ़ाना चाहता है। यह रूस और पश्चिम एशिया पर भारत की निर्भरता कम करने की कोशिश हो सकती है। भारत को ऊर्जा सुरक्षा के जरिए रणनीतिक साझेदार बनाना लक्ष्य हो सकता है। ट्रम्प-युग की परिवर्तित विदेश नीति में भारत की बढ़ती अहमियत का भी पता चलता है, क्योंकि रिपोर्टों के अनुसार ट्रम्प प्रशासन और अमरीकी रणनीतिक गलियारों में यह समझ बढ़ रही है कि भारत को नज़रअंदाज़ करना अब अमरीका के लिए नुकसानदेह सिद्ध हो सकता है, क्योंकि पाकिस्तान प्रेम से उसको पश्चिम व मध्य एशिया जैसी रणनीतिक क्षति उठानी पड़ सकती है। इसलिए रूबियो का दौरा भारत के साथ विश्वास बहाली, व्यापारिक तनाव कम करने, रक्षा समझौतों को आगे बढ़ाने और चीन के मुकाबले भारत को दीर्घकालिक साझेदार बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
रूबियो के दौरे से भारत के लिए कतिपय संभावित चुनौतियां भी सिर उठाएंगी, जिनमें प्रमुख हैं—अमरीका का रूस-विरोधी दबाव, चीन की प्रतिक्रिया, व्यापारिक टैरिफ विवाद, मानवाधिकार और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव आदि अहम है। हालांकिए भारत इन्हें स्थायी हित के लिहाज से देखेगा और रणनीतिक स्वायत्तता भरा कदम उठाएगा।
रूबियो का भारत दौरा इस बात का संकेत देता है कि भारत अब वैश्विक शक्ति-संतुलन का अनिवार्य केन्द्र बन चुका है और क्वाड भविष्य में एशियाई भू-राजनीति का बड़ा मंच बन सकता है। भारत भी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभाने की ओर बढ़ रहा है। (एजेंसी)



