केरल तथा तमिलनाडु ने पेश की राजनीतिक सद्भावना की मिसाल

देश के कटुता भरे राजनीतिक माहौल में तमिलनाडु और केरल के नए मुख्यमंत्रियों ने एक अच्छी मिसाल कायम की है। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल और असम में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा द्वारा विपक्ष के प्रति अपमानजनक बयान दिए गए। सुवेंदु अधिकारी या हिमंत बिस्व सरमा के शपथ ग्रहण समारोह में कोई भी विपक्ष का नेता शामिल नहीं हुआ। चाहे तमिलनाडु में मुख्यमंत्री विजय के शपथ ग्रहण समारोह में भी विपक्ष का कोई नेता शामिल नहीं हुआ, लेकिन शपथ ग्रहण समारोह के बाद विजय ने पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन से उनके घर जाकर मुलाकात करने के बाद वाइको से भी मुलाकात की। इस दौरान केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन को जब कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया तो वह निवृतमान मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन से मिलने उनके घर गए। उन दोनों की मुस्कुराते हुए तस्वीरें और वीडियो जारी हुईं। यह लोकतंत्र की एक खूबसूरत तस्वीर थी, जो दर्शाती है कि राजनीति दल प्रतिद्वंद्वी होते हैं, दुश्मन नहीं। 
सुप्रीम आदेशों की अनदेखी
सरकारें तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को अक्सर ही अनदेखा करती ही रहती हैं, लेकिन अब तो निचली अदालतें भी ऐसा करने लगी हैं। गत सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइंया की पीठ ने ज़मानत के बारे में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि ज़मानत नियम है और जेल अपवाद है। उन्होंने बताया कि गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) के मामले में भी यह नियम लागू होता है। यह टिप्पणी करते हुए दोनों जजों ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद की ज़मानत खारिज होने का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि ज़मानत खारिज करते हुए दो जजों की पीठ ने ज़मानत को लेकर दिए गए सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ के फैसले की अनदेखी की। उनके कहने का अर्थ यह था कि उमर को भी ज़मानत मिलनी चाहिए, जो 5 वर्षों से अधिक समय से जेल में है। हालांकि हाईकोर्ट ने उमर को शुक्रवार को तीन दिन की सशर्त अंतरिम ज़मानत दे दी है, लेकिन इससे पहले मंगलवार को दिल्ली की एक निचली अदालत ने उमर खालिद की अंतरिम ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी। उमर ने अपने दिवंगत चाचा के चेहलुम (चालीसवें दिन) समागम में शामिल होने तथा अपनी मां की सर्जरी के समय मौजूद रहने के लिए 15 दिन की ज़मानत मांगी थी, लेकिन निचली अदालत ने ज़मानत देने से इन्कार कर दिया था। 
सेना प्रमुख ने नेताओं को पीछे छोड़ा
पाकिस्तान के इतिहास और भूगोल की बातें करते हुए भाजपा और आरएसएस नेता अक्सर कहते हैं कि क्या करें खराब पड़ोसी मिल गया है। वह आगे कहते हैं कि इतिहास बदला जा सकता है, लेकिन भूगोल नहीं। हालांकि यह गलत है। इतिहास नहीं बदला जा सकता है, परन्तु महान नेता भूगोल बदलते हैं। जैसे इंदिरा गांधी ने भूगोल बदला था। माओ से लेकर व्लादिमीर पुतिन तक सबने भूगोल बदला है। लेकिन भाजपा के नेता भूगोल की बजाय इतिहास बदलने की बात करते हैं। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी जुलाई में सेवा-निवृत्त होने वाले हैं। उन्होंने पाकिस्तान को धमकाते हुए कहा है कि पाकिस्तान सोच ले कि उसे इतिहास में दफन होना है या भूगोल में रहना है। अगर पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देता रहेगा तो भारत उसको भूगोल से मिटा देगा। आधुनिक युग में किसी देश के कुछ क्षेत्रों को अपने साथ मिला कर उसका भूगोल बदलने के उदाहरण तो हैं, लेकिन किसी देश को किसी अन्य देश द्वारा अपने साथ मिला लेने का कोई उदाहरण नहीं है। शायद भारत भी पाकिस्तान के साथ ऐसा कुछ नहीं कर सकता। फिर भी सेवा-निवृत्त हो रहे जनरल द्विवेदी के ऐसे बयान उन लोगों के समूह को ज़रूर अच्छे लगेंगे, जो दिन-रात पाकिस्तान को खत्म करने की बात करते रहते हैं।
तेल बचाने के लिए नौटंकी
भारत के राजनीतिक नेता जिस तरह नौटंकी करके जनता को मूर्ख बनाते हैं, शायद ही दुनिया के किसी अन्य देश के नेता ऐसा करते होंगे। जब तेल संकट शुरू हुआ तो दुनिया भर के देशों ने इस संकट से निपटने के उपाय शुरू कर दिए, लेकिन भारत सरकार ने पहले तो 70 दिन तक संकट को स्वीकार ही नहीं किया, क्योंकि पांच राज्यों में चुनाव होने थे। चुनावों में बेहिसाब रैलियां हुईं, रोड शो हुए, नेताओं के विशेष विमान उड़ते रहे। शपथ ग्रहण समारोह तक यह तमाशा चला। फिर अचानक एक दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल, डीज़ल, गैस आदि किफायत से खर्च करने की अपील की। मिसाल कायम करने के लिए वह स्वयं दो गाड़ियों के काफिले से निकले। उसके बाद उनकी पार्टी के दूसरे नेताओं की ड्रामेबाज़ी शुरू हो गई। 
सबसे पहले दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और मंत्री कपिल मिश्रा मीडिया को दिखाने हेतु एक दिन के लिए मेट्रो में सवार हुए। राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के काफिले में वाहनों की संख्या कम की गई। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस एक दिन बाइक पर सचिवालय गए। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सबको पीछे छोड़ते हुए पैदल चल कर सचिवालय पहुंचे। 
कांग्रेस का मायावती पर दांव
सोशल मीडिया में इस बात का मज़ाक बनाया जा रहा है कि कांग्रेस के दो नेता राजेंद्रपाल गौतम और तनुज पुनिया अचानक मायावती से मिलने पहुंचे, लेकिन मायावती के कार्यालय के बाहर से गार्ड ने उन्हें लौटा दिया। पहली नज़र में यह एक मज़ाक लगता है। लेकिन पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कुछ अन्य नेताओं को लेकर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के घर के बाहर पहुंच गए थे और उनकी पार्टी को गठबंधन में शामिल करने को कहा थ, परन्तु राजद ने इन्कार कर दिया था। इसके बावजूद ओवैसी की पार्टी के पांच उम्मीदवार मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से चुनाव जीत गए थे। शायत कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के एससी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजेंद्रपाल गौतम ने भी बसपा प्रमुख पर उसी तज़र् पर दांव खेला हो। जब वह तनुज पुनिया को साथ लेकर मायावती से मिलने गए तो उन्हें पता था कि मायावती नहीं मिलेंगी। फिर भी गौतम की इस पहल का मकसद चुनाव से पहले राज्य के दलित मतदाताओं को यह संदेश देना था कि कांग्रेस उनके हितों का ध्यान रखने वाली पार्टी है और इसलिए वह बसपा से तालमेल करना चाहती है। कांग्रेसी एआई जैनरेटेड एक पोस्टर भी सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं, जिसमें बसपा को कांग्रेस का स्वाभाविक सहयोगी बताया जा रहा है। खड़गे के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद दलित समुदाय में कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ी है। शायद दोनों नेताओं का मायावती को मिलने जाना एक सुनियोजित कदम हो।

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