नकली दूध का अवैध कारोबार
पंजाब में खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या एक बार फिर चरम शिखर पर है। खास तौर पर दूध और मिठाइयों तथा दूध से बनने वाले अन्य पदार्थों में मिलावट का कारोबार बेखौफ एवं निर्बाध रूप से जारी है। स्थिति यहां तक पहुंच गई प्रतीत होती है कि प्रदेश के कई इलाकों में दूध आम लोगों के लिए पीने के योग्य भी नहीं रहा। बच्चों और महिलाओं खासकर गर्भवती महिलाओं के लिए तो यह दूध विषाक्त होने की हद तक पहुंच गया है। अस्पतालों में मरीज़ों को दिये जाने वाले दूध की गुणवत्ता भी निर्धारित मान-दण्डों से बहुत नीचे के स्तर पर पाई गई है। दूध से बने पदार्थों दही, पनीर और खोया से बनी मिठाइयों में भी बाकायदा मिलावट होने की सूचना मिली है। पहले कभी त्योहारों एवं उत्सवों के समय दूध और दुग्ध पदार्थों में मिलावट होने की बात चलती थी, तो प्रशासनिक तंत्र के साथ जन-संगठनों के तेवर भी ऊंचे हुए दिखाई देने लगते थे। ऐसे में प्रदेश और ज़िला स्तर पर स्वास्थ्य तंत्र भी बाकायदा सक्रिय हो जाता था। छापे मारे जाते थे, और मिलावटी मिठाइयां आदि नष्ट भी की जाती थीं, किन्तु आज का सत्य यह है कि प्रशासनिक तंत्र कुम्भकर्णी निद्रा में ग्रस्त है, और असामाजिक तत्व मिलावट के मैदान में खुल खेल रहे हैं।
आज स्थिति यह हो गई है कि समाचार पत्र तंत्र के साथ सोशल मीडिया से भी दूध की मिलावट और नकली, हानिकर दूध की सरे-आम बिक्री और इसके निर्माण क्षेत्र के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द होने के बावजूद प्रशासनिक तंत्र के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। आये दिन दूध एवं दुग्ध पदार्थों के नमूने भरे जाते हैं। भारतीय खाद्यान्न सुरक्षा और मानक अथॉरिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार दूध में मिलावट का धंधा प्रदेश के प्राय: सभी ज़िलों में जारी है। इसी रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक पांच के बाद छठा नमूना फेल हो जाता है। नकली एवं मिलावटी दूध बनाने वाली छोटी-बड़ी फैक्टरियों पर छापामारी भी होती रहती है किन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात वाला ही सामने आया है। प्रशासनिक तंत्र और नकली दूध बनाने वालों के बीच गठजोड़ होने का प्रमाण यह है कि छापेमारी से पहले ही सूचना लीक हो जाती है, और प्राय: प्रमाण हटा दिये जाते हैं। यदि कोई सबूत रह भी जाता है, तो उसे प्रयोगशाला तक पहुंचने के मार्ग में ही खपा दिया जाता है। हाल ही में स्वास्थ्य विभाग की निगरानी के तहत प्रदेश भर में कई जगह से दूध के नमूने भरे गये थे, और हैरानीजनक तथ्य यह रहा कि 33 प्रतिशत नमूने तो पूर्णतया विफल पाये गये। शेष नमूने भी परीक्षण की कसौटी पर शत-प्रतिशत सही नहीं पाये गये। इस प्रकार कुल प्राप्त किये गये 204 नमूनों में से 68 मानकों पर किसी सूरत खरे नहीं उतरे। इनमें से एक नमूना ऐसे दूध का रहा जो मनुष्य के लिए पीने हेतु बेहद खराब श्रेणी में रहा। इसी प्रकार पनीर के लिए गये नमूनों में से भी अधिकतर पर विफलता का संकट पाया गया। प्रदेश में प्रशासन की सक्रियता का अनुमान इस एक तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि सरकार के अनेक कड़े निर्देशों और मिलावटखोरों के विरुद्ध समय-समय पर कार्रवाई किये जाने के बावजूद इस अवैध कारोबार पर अंकुश नहीं लगाया जा सका।
वास्तव में, मिलावटखोरी के धरातल पर आज स्थिति यह हो गई है कि अधिकतर खाद्यान्न पदार्थों पर मिलावट की चाशनी चढ़ी है। इनमें से सर्वाधिक गम्भीर और चिन्ताजनक पक्ष दूध और दुग्ध-पदार्थों में मिलावट का है। ग्रामीण परिवेश में अवैध फैक्टरियों में बनने वाला नकली दूध कास्टिक सोडा जैसे हानिकर पदार्थों से बनाया जाता है। यह दूध रात के अन्धेरे में शहरों में पहुंच कर दिन के उजाले में खुलेआम बिकता है। त्रासदी यह भी है कि ऐसे दूध की बिक्री का समाज, प्रशासन और पुलिस तंत्र को पता होने के बावजूद कोई पक्ष कार्रवाई करने को तैयार नहीं होता। समाज की एक पूरी पीढ़ी इस दूध के सहारे पल रही है। इसके भविष्य का अनुमान स्वत: लगाया जा सकता है। हम समझते हैं कि नकली और मिलावटी दूध के इस अवैध कारोबार पर तत्काल रूप से अंकुश लगाने के यत्न करने होंगे। ये समाज-विरोधी तत्व सीमा-पार से कंटीली तार लांघ कर नहीं आते। ये हमारे और आपसे बने समाज के बीच विचरण करते लोग ही हैं। सरकार और प्रशासन को इनकी शिनाख्त करके इन्हें समुचित सबक सिखाना होगा। तभी इस समस्या पर पार पाया जा सकेगा।

