पंजाब में तीन-फसली चक्र का विकल्प ढूंढने की ज़रूरत
पंजाब सरकार फसली विभिन्ता के लिए लम्बे समय से यत्न कर रही है, लेकिन धान की काश्त का रकबा कम होने की बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि इसके मुकाबले खरीफ में कोई अन्य फसल किसानों के लिए फायदेमंद नहीं। इस साल 32.5 लाख हेक्टेयर पर धान की काश्त होने का अनुमान है। धान की पानी की ज़रूरत अधिक होने की वजह से राज्य का 80 प्रतिशत रकबा (154 में से 117 ब्लॉक) डार्क ज़ोन में चला गया।
पंजाब सरकार ने धान की काश्त का रकबा कम करके फसली विभिन्नता लाने के लिए मक्का की काश्त बढ़ाने पर ज़ोर दिया है। इस साल इसकी काश्त का रकबा 50 हज़ार एकड़ बढ़ाने की योजना है। खरीफ मौसम के मक्का के अधीन 1.30 लाख हेक्टेयर रकबा लाया जाएगा, परन्तु किसान बसंत ऋतु का मक्का ज्यादा बो रहे हैं, जो लगभग धान जितना पानी ही मांगता है। एक अनुमान के अनुसार इस साल बसंत ऋतु के मक्के की काश्त 3 से 3.25 लाख हेक्टेयर तक किए जाने की सम्भावना है। गत वर्ष बसंत ऋतु का मक्का लगभग 2 लाख हेक्टेयर रकबे पर बोया गया था, जबकि 2024 में 1.50 लाख हेक्टेयर रकबा था।
कृषि और किसान कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. गुरजीत सिंह बराड़ कहते हैं कि किसानों को बसंत ऋतु का मक्का न बोने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, परन्तु किसान अधिक लाभदायक होने के कारण बसंत ऋतु के मक्के की किस्मों की ही काश्त कर रहे हैं। हालांकि खरीफ के मौसम में मक्का बोने के लिए पंजाब सरकार द्वारा किसानों को भारी सब्सिडी की पेशकश की जा रही है। बसंत ऋतु के मक्का की काश्त के लिए निजी कंपनियां हाइब्रिड किस्मों का बीज तेज़ी से बेच रही हैं। पंजाब सरकार ने हाइब्रिड बीज पर पाबंदी लगाई थी (चाहे खारे पानी वाले मुक्तसर आदि जैसे ज़िलों में हाईब्रिड किस्में सफलतापूर्वक हो जाती हैं)। यह पाबंदी अदालत द्वारा रद्द कर दी गई और अब इन बीजों की बिक्री सरेआम हो रही है।
डॉ. बराड़ ने बताया कि सरकार तो पानी की बचत के लिए सीधी बुवाई पर भी 1500 रुपये प्रति एकड़ की सब्सिडी भी दे रही है, परन्तु इस साल बारिश और कुछ दूसरे कारणों से बहुत कम रकबे में सीधी बुवाई हुई है। किसान बसंत ऋतु का मक्का इसलिए बो रहे हैं क्योंकि इसकी काश्त में सब्सिडी से ज़्यादा मुनाफा होता है। चाहे मक्का की सरकारी खरीद न होने की वजह सही मायनों में एमएसपी नहीं है। किसानों को विगत वर्षों के मुकाबले अधिक मूल्य 1900 रुपये प्रति क्ंिवटल तक मिल रहा है, क्योंकि पोल्ट्री, इथेनॉल और चारे के लिए मक्का की मांग बढ़ रही है। चाहे मक्का की काश्त का रकबा 4.30 लाख हेक्टेयर (3.0 लाख हेक्टेयर हाइब्रिड +1.30 लाख हेक्टेयर खरीफ का मक्का) से ज़्यादा हो गया है, लेकिन धान की काश्त के रकबे में कोई कमी नहीं आई। रकबा दूसरी अन्य फसलों जैसे कपास, नरमा आदि में से निकल कर मक्का और धान की काश्त में
चला गया। कपास, नरमा की फसल अब तक सिर्फ 70 हज़ार हेक्टेयर रकबे पर ही बोई गई है। कृषि विभाग के निदेशक का कहना है कि पंजाब सरकार बीटी नरमा और देसी कपास के बीजों पर 33 प्रतिशत सब्सिडी दे रही है, लेकिन किसान इसे फिर भी नहीं अपना रहे, क्योंकि इसके मंडीकरण में समस्याएं आती हैं। विगत वर्ष काटन कार्पोरेशन ऑफ इंडिया ने नरमा की खरीद के लिए मंडी में प्रवेश ही नहीं किया। नरमा-कपास की काश्त के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था, उसमें से 55-56 प्रतिशत की ही प्राप्ति हुई है। बसंत ऋतु में मक्के की हाइब्रिड किस्मों की काश्त बढ़ने से पंजाब में तीन फसलों का चक्र—आलू, मक्का और धान उभर कर आगे आ रहा है। इससे भू-जल स्तर और कम होने की आशंका है, जिसका भविष्य में पंजाब की कृषि पर भारी असर पड़ेगा। निदेशक बराड़ का कहना है कि खारे पानी वाले ज़िलों के अतिरिक्त बसंत ऋतु में मक्का की हाइब्रिड किस्मों की काश्त नहीं होनी चाहिए। यह भी कि बासमती की काश्त का रकबा बढ़ाने से पानी का संकट निश्चित रूप से कम होगा, क्योंकि कई स्थितियों में बासमती मॉनसून की बारिश के पानी से ही हो जाती है, लेकिन इसके लिए लाभदायक मंडीकरण का प्रबंध होना चाहिए।
किसान बासमती के लिए एमएसपी की मांग कर रहे हैं जिस पर केंद्र सरकार को विचार करने की ज़रूरत है, लेकिन जब बासमती की काश्त का रकबा बढ़ता है तो मंडी में इसकी कीमत गिर जाती है। चाहे बासमती चावल की खपत घरेलू तथा विदेशों में बढ़ रही है, परन्तु किसानों को भय है कि पश्चिम एशिया युद्ध के कारण निर्यात कम होने पर कहीं कीमत न गिर जाए। आईसीएआर-आईएआरआई ने बासमती की ज़्यादा लाभदायक किस्में जैसे पी.बी.-1121, पी.बी.-1885 और पी.बी.-1509 आदि विकसित की गई हैं, उसके बावजूद बासमती के दाम में गिरावट से किसानों में ये बहुत अच्छी बासमती किस्में बोने के लिए उत्साह कम होगा। मक्का की कुछ हाईब्रिड किस्मों की बसंत ऋतु में काश्त पर रोक लगा कर तथा बासमती पर एमएसपी देकर पंजाब में तेज़ी से आ रहे तीन-फसली चक्र को रोकने की ज़रूरत है।

