यहां जून सुधरती नहीं, बदल जाती है

कॉकरोच का नाम सुनते ही झुरझुरी छिड़ जाती है। समझ नहीं आता जिनसे हम दूर भागते हैं, उनसे ही मार्ग-दर्शन की नौबत क्यों आ गई?
क्या सच बोलना इन्सान के लिए इतना कठिन और संकटपूर्ण हो गया कि अब कॉकरोच का मुखौटा पहन कर लोगों की भीड़ हमें सच बताएगी? जुलूस बलिदानी होते थे। वक्त बदला। चतुर सुजानों ने पहले आपके लिए चमत्कारिक सुधारों के वायदों के पहाड़ खड़े किये, फिर उन पहाड़ों पर अपनी-अपनी कुर्सी जमा कर बैठ गये। इस कुर्सी को जितना हिलाने की कोशिश करो, यह और सख्ती से पहाड़ पर जम जाती है।
चाहे जितना वक्त बीत जाये। समय का गुज़रना उसे जीर्णशीर्ण कर दे तो भी यह कुर्सी हटती नहीं। काया पलट कर अपने नाती-पोतों की ओर हो जाती है। एक सौ चालीस करोड़ जनता को उल्लू बनाने के लिए इनको नया खून बताती है, असाधारण और विलक्षण खून, जो उनके सिवा कोई और पैदा नहीं कर सकता। तब सब लोग क्रांति जुलूस बन कर इनकी शोभायात्राओं में तबदील हो जाते हैं, और इनके लिए ज़िन्दाबाद बटोरना एक कमाऊ धंधा। तभी तो आज सोशल मीडिया पर गट्ठरों में लाइक्स बेचने वालों की दुकानें सज गईं। वे इतने कारोबारी हो गए कि आपके नाम भाई, बेटी, बीवी के मरने पर भी आपके शत्रुओं को लाइकस बेचने में तनिक नहीं चूकते। कभी-कभी आपको भी।
कभी हमारे एक मित्र ने पहाड़ पर लालटेन जलाने का दुस्साहस किया था। उसका तो कोई पहाड़ खड़ा न हो सका, और उसकी लालटेन भी चक्रवात में टूट गई। महा-स्वार्थी लोग अपनी हर तरक्की पर दांत निपोर कर हंसते हैं, और लोग कहते हैं, आपकी दुनिया से हंसना क्यों गायब हो गया?
अरे लोग किस बात पर हंसे? क्या इस बात पर कि हर तरह की जुगत भिड़ाने पर भी गैस का सिलेंडर नहीं मिला, और गरीबों की उज्जवला योजना आखिरी हिचकियां लेते हुए भी सिर नहीं उठा पाती। आप हंसने की बात कहते हैं?
कभी दिल खोल कर हंसने को अनुभव कहते थे, आज दिल बचा हो तो लोग उसे खोल कर हंसें। दिल तो भौतिकतावाद की दुकान पर बन्धक हो गया। अब वह निन्यानवे के फेर में पड़ा है और साइकिल से तरक्की करके बड़ी वातानुकूलित गाड़ी हो जाना चाहता है।
यहां कामयाब लोग उत्सवधर्मी हो गए हैं। वे हर बात पर अपनी सफलता के जश्न मनाते हैं। इन उत्सवों के नीचे उनके द्वारा प्रस्तुत सफलता के झूठे आंकड़ों की नींव होती है। वे उत्सव मनाते हैं कि उनका घराना राजा से रंक हो गया। इन चन्द घरानों की तरक्की की तस्वीर देश की आर्थिक विकास दर कहलाती है। गैस और तेल की इस तंगी के ज़माने में भी वे सर्वश्रेष्ठ हैं। आपने कहा कि भ्रष्टाचार को हमने शून्य स्तर पर भी सहन नहीं किया लेकिन दुनिया के भ्रष्टाचार सूचकांक में आज भी हमारा दर्जा आज तक सुधरा क्यों नहीं दिखा पाते? हमारे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं, केवल इन्हें अपना सलीब बना ही कर ढो सकते हैं। आज सच बोलने का साहस किसी के पास नहीं। लोग पहाड़ों पर जमी कुर्सियों को पृथ्वी राज चौहान मान कर उनके चन्द बरदाई हो रहे हैं। उनके लिए नया पृथ्वी राज रासो लिख रहे हैं। तभी तो देखते हो, आजकल हर नेता अपनी जीवन कथा लिख रहा है, और बेकारी के इस मौसम में घोस्ट लेखकों का धंधा चमक उठा है।
क्या चमका साहब कि सच बोलने वालों को कॉकरोच बना दिया और उनके जुलूस को गैर-कानूनी। अभिव्यक्ति का सच कभी आपने देश के संविधान का मूल मन्त्र कहा था। तभी तो लोग आज धड़ल्ले से झूठ बोलते हैं, और उसे सच का लिबास पहनाने में हर पल व्यस्त रहते हैं।
फिर जो सच बोलता है उसे अस्पृष्य कह कर कॉकरोचों की जमात में धकेल देते हैं। इस जमात का राजनीतिकरण करने लगते हैं, और उसकी आसान मृत्यु की भविष्यवाणी कर देते हैं।
सच में बहुत बड़ा अपराध किया है कॉकरोचों ने। पहाड़ पर कुर्सी जमा कर बैठा जो आदमी शिक्षा की बागडोर संभालने के बावजूद परीक्षाओं के अपराधीकरण को मौत नहीं दे सका, भला उसे कुर्सी से उतारने की बात की तो कैसे? आपको खबर नहीं जो यहां कुर्सी पर बैठ गया, सो बैठ गया। अब उसके नाती-पोते ही उसे इस कुर्सी से उतारेंगे।
वैसे फिलहाल हमने अपने जग में शिक्षा क्रांति कर दी है। डिजिटल क्रांति कर दी है। ऐसी शिक्षा क्रांति कि जिसके रोबोट कृत्रिम मेधा के नए कायदे सीख रहे हैं, और आदमी अपनी मेधा खो कर ‘हम नहीं सुधरेंगे’ की धुन पर विलायती नृत्य पेश कर रहा है। अब तो अपने देश में रोबोट ही पढ़-लिख कर आम लोगों को रास्ता दिखाएंगे। जी हां वही रास्ता, जहां पहले आदमी मेहनत करके अपना जीवन यापन करता था। आजकल सस्ते राशन की दुकान पर अनन्त काल तक खड़े हो कर अपने आदमी से कॉकरोच हो जाने का मातम मना रहा है।

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