दूसरे के घर की ज़मीन चाहते हैं विपक्षी दल
गत 8 जून 2026 को राजधानी दिल्ली में ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक का घोषित उद्देश्य विपक्षी दलों के बीच तालमेल बिठाना और एकजुटता को मजबूत करना था, लेकिन जैसी आशंका थी, सारी योजना टायं-टायं फिस्स हो गई और ऐसा स्वाभाविक ही था। दरअसल जितनी भी विपक्षी पार्टियां हैं, उन सबको एकजुट होकर देशभर में चुनाव जीतने के लिए एकता तो चाहिए, लेकिन अपनी जमीन पर नहीं, दूसरे की जमीन पर। अपनी जमीन पर कोई विपक्षी पार्टी अपने ही साथी संगियों के साथ किसी भी किस्म का तालमेल नहीं चाहती। तृणमूल कांग्रेस चाहती है, कांग्रेस और वामपंथी दल भूल कर भी पश्चिम बंगाल के अंदर यह उम्मीद न करें कि टीएमसी उनके साथ सीट शेयर करेगी। यही बात डीएमके तमिलनाडु के अंदर चाहती है। डीएमके ने तो 8 जून, 2026 को राजधानी दिल्ली में हुई बैठक में हिस्सा भी नहीं लिया और साफ कहा कि वह ऐसे गठबंधन में कैसे शामिल हो सकती है, जिसमें कांग्रेस हो क्योंकि कांग्रेस ने उसके साथ तमिलनाडु में विश्वासघात किया है।
गौरतलब है कि कांग्रेस और डीएमके ने हाल ही में सम्पन्न तमिलनाडु विधानसभा चुनाव मिलकर लड़े थे, लेकिन चुनाव के बाद जब विजय थलापती की पार्टी टीवीके सबसे ज्यादा सीटों के साथ जीतकर उभरी, तो कांग्रेस ने मौका देखते ही विजय के साथ मिलकर प्रदेश में सरकार बना ली। डीएमके के मुखिया स्टालिन किसी भी किस्म की साझेदारी कांग्रेस के साथ नहीं चाहते और विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन का मतलब ही यह है कि कांग्रेस के नेतृत्व में भाजपा को चुनौती देने के लिए तैयार होने वाला गठबंधन।
इस बैठक का नतीजा बैठक शुरू होने के पहले ही तय था। दरअसल भाजपा को हराने के लिए ये विपक्षी पार्टियां एक गठबंधन तो बनाना चाहती हैं, लेकिन ये चाहती हैं कि उन्हें इस गठबंधन के लिए खुद से कोई कुर्बानी न देनी पड़े, पर हां, दूसरे की कुर्बानी पर यह ज़रूर सत्ता सुख भोग सकें। इसीलिए गठबंधन की बैठक में आम आदमी पार्टी ने हिस्सा नहीं लिया। सीपीएम हालांकि बैठक में शामिल हुई, लेकिन साफ शब्दों में कह दिया कि कांग्रेस ने हाल में जिस तरह केरलम् विधानसभा चुनाव में सीपीएम के साथ बर्ताव किया है, उस सबके बीच कांग्रेस के साथ गठबंधन की कोई स्वाभाविक स्थितियां नहीं हैं। किसी ने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान कांग्रेस ने कहा कि सीपीएम भाजपा के साथ मिली हुई है। हाल के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस भाजपा से बुरी तरह से हार गई है लेकिन हारने के बावजूद टीएमसी का यही मानना है कि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां पश्चिम बंगाल से दूर रहें, तो ही विपक्षी एकता के लिए सही है। लब्बोलुआब यह कि विपक्षी पार्टियां भाजपा के विरुद्ध उसे हराने के लिए एकजुट तो होना चाहती हैं, लेकिन हर पार्टी यह मानकर चलती है कि इस एकता की कीमत उसे अपनी ताकत का बंटवारा करके न चुकानी पड़े। जो स्थानीय पार्टी जहां मजबूत है, वहां वह किसी तरह का गठबंधन नहीं चाहती। वह चाहती है कि विपक्षी पार्टियां उन्हें एकमुश्त और एकतरफा समर्थन दें और जहां वह पार्टी कतई ताकतवर नहीं है, वहां वह मिलकर चुनाव लड़ना चाहती है ताकि उसे दूसरे से फायदा मिल सके। भला इतनी चालाकी से निर्देशित कोई गठबंधन आकार कैसे ले सकता है? आम आदमी पार्टी कांग्रेस से दिल्ली और पंजाब में किसी भी किस्म का समझौता नहीं करना चाहती क्योंकि उसे लगता है कि इन दोनों जगहों पर वह अकेले जीत सकती है, लेकिन वहीं आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस से गठबंधन करने के लिए दबी जुबान तैयार है। हालांकि फिलहाल उसकी कोई घोषणा नहीं की गई, लेकिन पहले इस तरह की मंशाएं जाहिर हो चुकी हैं।
जिस तरह का बिखराव पिछले लोकसभा चुनाव और इसके बाद अलग-अलग सात विधानसभा चुनावों में देखने को मिला, वही स्थितियां अभी भी बनी हुई हैं। सिर्फ अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनता दल कांग्रेस के साथ उत्तर प्रदेश और बिहार में गठबंधन करना चाहते हैं, लेकिन इस शर्त पर कि कांग्रेस सिर्फ इस प्रदेशों में नामभर की पार्टी रहे और उनके पीछे-पीछे चले यानी इन दोनों प्रदेशों में ये पार्टियां कांग्रेस को साथ लेकर खुद सत्ता में आना चाहती हैं, लेकिन यह नहीं चाहतीं कि कांग्रेस भी ठीक ठाक स्थिति में समझौता करके प्रदेश में सत्ता के बंटवारे वाली हैसियत में रहे।
इससे विपक्षी एकता की जो स्थिति 8 जून को बैठक के पहले थी, ठीक वही स्थिति बैठक के बाद भी है। दरअसल क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच एक बुनियादी मतभेद है, जो दशकों से ज्यों का त्यों बना हुआ है। विपक्षी पार्टियां भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन तो करना चाहती हैं, लेकिन वे चाहती हैं कि गठबंधन के बावजूद कांग्रेस उनके इशारे पर चलने वाली दूसरे या तीसरे नंबर की पार्टी रहे, किसी तरह बराबरी या सत्ता में भागीदारी की मंशा न पाले। विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या वास्तव में विचारधारा नहीं बल्कि अपने-अपने राजनीतिक भूगोल को अपने पास बनाये रखने की है। हर विपक्षी दल चाहता है कि उसके क्षेत्र में गठबंधन की कोई साथी पार्टी अपने लिए जमीन तलाशने की कोशिश न करे और यही विपक्षी एकता के लिए सबसे बड़ी बाधा है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, की तृणमूल की रस्सी बेशक भाजपा की आंच में जल गई हो, लेकिन अभी भी जली हुई रस्सी का बल नहीं गया। वह किसी दूसरी विपक्षी पार्टी के लिए प्रदेश में किसी तरह का जेनुइन स्पेस नहीं देना चाहतीं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव भी यही चाहते हैं। बिहार में तेजस्वी यादव की भी यही सोच है, तो फिर विपक्षी गठबंधन बनेगा कैसे? विपक्षी पार्टियों को एक-दूसरे के साथ कहीं न कहीं समझौता तो करना ही पड़ेगा।
भाजपा का वास्तव में हाल के दशकों में इसीलिए तेजी से विस्तार हुआ है। क्योंकि उसने अपने गठबंधन में अपने सहयोगियों को चाहे उनकी कितनी भी कम ताकत हो, बंटवारे का ठीक ठाक हिस्सा दिया है। तभी उसका गठबंधन एकजुट होकर उसके साथ खड़ा है, लेकिन विपक्षी खेमे में कोई भी पार्टी एकता के लिए अपनी राजनीति की कुर्बानी नहीं देना चाहती। इतिहास बताता है कि हर सफल राजनीति गठबंधन नहीं, किसी न किसी को तो कुछ ज्यादा खोना ही पड़ता है, लेकिन यहां विपक्षी एकता के हिमायती राजनेता चाहते हैं कि नेतृत्व भी उसका रहे, सीटें भी उसकी शर्तों पर तय हो, एजेंटा भी वही तय करे और दूसरे दल केवल समर्थन करें। ऐसे में तो गठबंधन नहीं होने वाला और तकनीकी रूप से हो भी गया तो उसका विपक्ष को कोई फायदा होने वाला नहीं है। विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि इनका आपस में किसी के साथ भरोसा नहीं है। यहां तक कि ‘इंडियन’ गठबंधन में शामिल विपक्षी पार्टियों के शीर्ष नेता आमतौर पर अपनी पार्टी स्तर पर इन गठबंधनों के विरूद्ध हैं और सार्वजनिक मंच पर इसके समर्थक। ऐसे में भला विपक्षी एकता कैसे निर्णायक रूप से उभरकर आ सकती है और कैसे भाजपा को चुनौती दे सकती है? -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



