अभी दिल्ली दूर है
विगत दिवस दिल्ली में हुई ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक बड़ी उम्मीद जगाने वाली सिद्ध नहीं हुई। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया था। भाजपा को उसके दावे के अनुसार सीटें नहीं मिली थीं, जिस कारण उसे नितीश कुमार और कुछ अन्य पार्टियों का सहारा ढूंढना पड़ा, परन्तु पिछले दो वर्ष की अवधि में जिस तरह ‘इंडिया’ गठबंधन में लगातार मतभेद और अलगाव पैदा होते रहे, उसके कारण इसकी शक्ति सीमित होकर रह गई है। इसी अवधि में भाजपा ने देश के बड़े भाग में बड़ी जीत प्राप्त की हैं। डी.एम.के. इस बैठक में शामिल नहीं हुई, क्योंकि वह कांग्रेस से नाराज़ है। तमिलनाडू विधानसभा के लिए डी.एम.के. और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था, परन्तु प्रसिद्ध अभिनेता विजय थलापती की पार्टी टी.वी.के. को भारी समर्थन मिलने के बाद कांग्रेस ने पासा बदल लिया और उनकी सरकार में शामिल हो गई।
ऐसे माहौल के दृष्टिगत डी.एम.के. के प्रमुख स्टालिन द्वारा इस गठबंधन के प्रति धारण किए गए रवैये को उचित माना जा सकता है। आम आदमी पार्टी भी इस बैठक में शामिल नहीं हुई, क्योंकि दिल्ली और पंजाब में उसका कांग्रेस के साथ कड़ा राजनीतिक टकराव चल रहा है। बंगाल के चुनाव में चाहे ममता को अब निराशाजनक पराजय मिली है परन्तु चुनाव से पहले उसने कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया था। केरलम के विधानसभा चुनाव में भी मार्क्सवादी पार्टी का कांग्रेस की ओर से किये जाते रहे कड़े विरोध और बयानबाज़ी के कारण वामपंथी पार्टियों में पड़ी दूरी को अभी तक कम नहीं किया जा सका। अब यह गठबंधन भाजपा की बढ़ती ताकत के दृष्टिगत एकजुट होने का यत्न ज़रूर कर रहा है परन्तु इसमें ज्यादातर पार्टियों का भिन्न-भिन्न राज्यों में अपना-अपना प्रभाव है। इसलिए वे वहां गठबंधन की अन्य पार्टियों को ज्यादा स्थान देना नहीं चाहतीं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी कांग्रेस से सहायता तो चाहती है परन्तु वह उसे ज्यादा स्थान देने के लिए तैयार नहीं रही है। चुनाव के समय सीटों के वितरण संबंधी भी अक्सर इस मामले पर दोनों की कड़वाहट सामने आती रही है। इसी तरह बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनता दल भी वहां कांग्रेस के ज्यादा स्थान देने के लिए तैयार नहीं। विगत दिवस दिल्ली में एक ही समय दो बड़े घटनाक्रम घटित हुए हैं। एक तरफ ‘इंडिया’ गठबंधन के नेता भाजपा सरकार के विरुद्ध लामबंदी करने में जुटे हुए थे और दूसरी तरफ दिल्ली में उसी समय ममता के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस पार्टी के 20 लोकसभा सांसद स्पीकर ओम बिरला से मिलकर अपनी अलग पार्टी बनाने की मांग कर रहे थे।
लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद हैं, जिनमें से अब दो तिहाई से अधिक ने ममता से अलग होने की घोषणा कर दी है। राज्यसभा में भी इस पार्टी के सांसदों के अलग होने की चर्चाएं चल रही हैं। दो वर्ष पहले भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के लोकसभा सांसदों की संख्या अब 293 से बढ़ कर 313 हो जाएगी। चाहे हो रही इस तरह की तोड़-फोड़ के बावजूद एकजुट हुई पार्टियों ने एस.आई.आर. के मामले में व्यापक स्तर पर वोट काटे जाने, शिक्षा के क्षेत्र में नीट के पेपर लीक होने और बेरोज़गारी, महंगाई आदि के मामलों को मिलकर उठाने की बात की है और आने वाले समय में भी इस गठबंधन की लगातार बैठकें करने की योजना बनाई गई है परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि इस गठबंधन को भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियां का पूरा मुकाबला करने के लिए अभी प्रत्येक पक्ष से बड़ी तैयारी और अभ्यास की ज़रूरत होगी, विशेष रूप से अपने अहंकार को छोड़ने के साथ-साथ अपने गठबंधन के साथियों से बहुत कुछ हड़पने की नीति का भी त्याग करना होगा। मौजूदा समय में तो इस गठबंधन के लिए दिल्ली दूर ही प्रतीत होती है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

