अच्छे पड़ोसी बनना और बनाना किसी कला से कम नहीं


इसमें कोई संदेह नहीं कि जिस चीज से हमारा रोज़ाना वास्ता पड़ता रहता है, वह अन्य चीजों से अधिक महत्व रखती है। रिश्तेदार तथा अन्य निकटतम लोग भी हमारे अपने ही निकटतम होते हैं। परन्तु इनसे भी ज्यादा हमारा वास्ता अपने पड़ोसियों से लगातार पड़ता रहता है। रिश्तेदार हमें कभी-कभार मिलते हैं, और निकटतम मित्र भी हमें रोज़ाना नहीं मिलते परन्तु पड़ोसियों के साथ हमारा मेल-मिलाप रोज़-रोज़ का होता है। 
हमारे दायें-बाएं रहते पड़ोसी हमारा दायां-बांया होते हैं। यही हमारे दुख-सुख में शामिल होने वाले हमारे असली मित्र होते हैं। यदि हम कुछेक बातों को ध्यान से मानकर और समझकर चलें तो हमारे संबंध पड़ोसियों के साथ बढ़िया और स्नेहपूर्ण रह सकते हैं या रखे जा सकते हैं। ज़रूरत सिर्फ अपनेपन और आपसी विश्वास की होती है। कभी-कभार मौके के अनुसार अपने पड़ोसी के साथ पारिवारिक या कामकाज़ संबंधी बातचीत करें, हाल-चाल पूछें। परन्तु ध्यान रहे कि बहुत ज्यादा मिलने या उसके कामकाज़ में ज्यादा हस्तक्षेप करने या दिलचस्पी लेने पर या फिर बिन मांगे ही सलाह आदि देते रहने से भी संबंध सुखद नहीं रहते। कभी भी पड़ोसी के साथ जाति-पात, ऊंच-नीच, गरीबी-अमीरी आदि के पक्ष से अपने मन में गलत ख्याल नफरत या धारणा न बनायें। क्योंकि ऐसा करने से आपसी दूरी बढ़नी शुरू हो जाती है और निकटता कम होनी शुरू हो जाती है। यह आगे जाकर किसी भी समय, किसी भी रूप में आपको प्रभावित कर सकती है। क्योंकि यह संबंध तो उम्र भर के होते हैं, कोई चार-पांच दिनों या महीनों के नहीं। 
प्रत्येक का अपना-अपना व्यवसाय या कामकाज होता है, इसलिए आपसी व्यवसायों से संबंधित बातचीतों या मुश्किलों, मामलों के बारे में सलाह-मशिवरे देते-लेते रहना चाहिए। वह भी ज़रूरत के अनुसार ही। ऐसा करने से जहां एक-दूसरे की मुश्किलों को हल करने का अवसर मिलता है, वहीं आपसी निकटता भी बढ़ती है। कभी भी किए हुए कार्य का एहसास न जतायें, स्वयं ही आपका पड़ोसी इसको महसूस करेगा। कभी भी अपने अमीर पड़ोसी की मुकाबलेबाज़ी में पड़कर नकल न करें, क्योंकि असली सुख और आनंद तो चादर देखकर पांव फैलाने में ही मिलता है।
इन बातों को यदि हम अपने दैनिक जीवन में अपना लें, स्वयं बढ़िया बनने की कोशिश करते रहें, तो स्वभाविक है कि हमारा पड़ोसी भी हमारे साथ उसी तरह का व्यवहार करेगा, क्योंकि आज के युग में अपनी ही ‘अढ़ाई पाव खिचड़ी पकाते रहने से’ हमें ही नुक्सान हो सकता है। ज़रूरत है, आपसी विश्वास की, नेक भावना की और मिलन-सार स्वभाव की, क्योंकि पड़ोसी का अस्तित्व आत्मा को मजबूती प्रदान करने वाला होता है। अच्छे पड़ोसी होना बड़े सौभाग्य की बात होती है, क्योंकि सुख-दुख में सगे-संबंधियों से पहले अच्छे पड़ोसी ही सहायता करते हैं, क्योंकि सगे -संबंधियों को आप तक पहुंचने में समय लगता है परन्तु अच्छे पड़ोसी तुरन्त आपको सुख-दुख में सहायता करते हैं।
—सुखमिन्द्र सिंह शैहणा