देश की सुरक्षा को दरपेश हैं गम्भीर चुनौतियांआन्तरिक एकजुटता की ज़रूरत


15अगस्त, 1947 को भारत के आज़ाद होने से लेकर अब तक देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कई बार यह चुनौतियां बहुत बढ़ जाती हैं और कई बार थोड़ा कम हुई नज़र आती हैं। अब तक छोटे-बड़े पाकिस्तान के साथ हमारे चार युद्ध हो चुके हैं, इनमें 1947-48 का कश्मीर हमला, 1965 और 1971 का युद्ध तथा 1999 का कारगिल का युद्ध आदि शामिल हैं। इसके अलावा भारत के बड़े पड़ोसी देश चीन के साथ भी 1962 में सीमांत विवाद को लेकर हमारा युद्ध हो चुका है, जिसमें भारत को नमोशीजनक हार का सामना करना पड़ा था। इस समय भी इन दोनों देशों द्वारा हमें अलग-अलग तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसी समय देश की सुरक्षा के लिए बहुत सारे आन्तरिक खतरे भी उभर रहे हैं। इन सभी सुरक्षा चुनौतियों की चर्चा करना ही हमारे इस लेख का मुख्य विषय है।
कुछ खतरे अंतर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय घटनाक्रम की देन हैं और कुछ खतरे देश की आन्तरिक स्थितियों से देश के शासकों द्वारा सही ढंग से निपट न सकने के कारण पैदा हुए हैं। अब पाकिस्तान को जब यह एहसास हो गया है कि सीधा युद्ध लड़कर वह भारत से जम्मू-कश्मीर हासिल नहीं कर सकता तो उसने भारत के खिलाफ अप्रत्यक्ष जंग (प्रॉक्सी वार) को और तेज़ कर दिया है। वैसे इस अप्रत्यक्ष जंग की शुरुआत पाकिस्तान ने जनरल जिया के शासनकाल के समय ही शुरू कर दी थी। इस समय पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर तथा भारत के अन्य हिस्सों में हमले तथा तोड़-फोड़ करवाने के लिए लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिज़बुल मुजाहिद्दीन आदि संगठनों को इस्तेमाल कर रहा है। इन संगठनों को हथियार, सैन्य प्रशिक्षण तथा वित्तीय साधन पाकिस्तानी सेना द्वारा ही मुहैय्या किये जा रहे हैं। पाकिस्तान की थल सेना की कमान जनरल बाजवा द्वारा सम्भाले जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में सीमा पार से आतंकवादियों की घुसपैठ में और वृद्धि हुई है।
सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से गोलाबंदी का उल्लंघन भी कई गुणा बढ़ा है। इसके अलावा पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर में हुर्रियत कान्फ्रैंस के दोनों गुटों को भी लोगों को भारत के विरुद्ध भड़काने, पत्थरबाज़ों तथा आतंकवादियों को फंड पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इस संबंधी राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी (आई.एन.ए.) को बड़े सबूत मिले हैं, जिनके आधार पर अब हुर्रियत दोनों गुटों से संबंधित लोगों पर कानूनी शिकंजा कसा जा रहा है। यह सही है कि जम्मू-कश्मीर के भारत का हिस्सा बनने के बाद वहां की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं से निपटने के मामले में भारत के शासकों द्वारा बड़ी गलतियां की गई हैं। धारा 370 को कमज़ोर किये जाने से भी वहां के लोगों में बेगानगी बढ़ी है। भारतीय शासक वहां स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव करवाने में भी कई बार असफल रहे हैं, अपितु अपनी मनमज़र्ी की सरकारें वहां थोपने पर अधिक जोर रहा है। राज्य में समय-समय पर बनीं सरकारों के भ्रष्टाचार तथा खराब प्रबंध ने भी लोगों को मुख्य धारा से दूर किया है। परन्तु इस सब कुछ के बावजूद जम्मू-कश्मीर में बेचैनी का बड़ा कारण वहां पाकिस्तान का हस्तक्षेप भी है। इस समय राज्य में एक तरह से युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। 
पाकिस्तान के अलावा भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को दूसरा बड़ा खतरा चीन की ओर से है। यह सही है कि दोनों देशों के बीच उत्तर-पश्चिम में जम्मू-कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक सीमाओं की स्पष्ट रूप में निशानदेही नहीं हुई, चाहे भारत और चीन की सीमा ब्रिटिश शासन के समय तय की गई थी, जिसको मैकमोहन लाईन कहा जाता है, परन्तु चीन ने कभी इस लाईन के आधार पर सीमाबंदी को स्वीकार नहीं किया, जबकि अन्य पड़ोसी देशों के साथ सीमांत विवाद उसने इसी मैकमोहन लाईन को मानते हुए ही सुलझाये हैं। इसी सीमांत विवाद ने 1962 में भारत-चीन युद्ध का रूप धारण कर लिया था। उस युद्ध में चाहे भारतीय सैनिकों ने बहुत बहादुरी से चीन का सामना किया परन्तु पर्याप्त तैयारी पर्याप्त सैन्य साजो-सामान न होने के कारण भारत को नमोशीजनक हार का सामना करना पड़ा था। चीन ने उस समय कश्मीर के एक्साइचिन्न क्षेत्र सहित एक बड़े क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था, वह क्षेत्र आज तक उसने भारत को वापिस नहीं किया।
अब जबकि चीन दुनिया में एक राजनीतिक तथा सैन्य शक्ति के तौर पर बड़ी शक्ति बनकर उभरा है, तो उसने लगभग अपने सभी पड़ोसी देशों के प्रति आक्रामक रुख धारण कर लिया है। दक्षिण-चीन सागर के साथ लगते सभी देशों के साथ सागर की सीमा और अन्य सीमांत मामलों को लेकर उसके विवाद चल रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश सहित भारत के कई क्षेत्रों पर भी वह अपने दावे जता रहा है। ताज़ा विवाद डोकलाम पठार के मुद्दे पर बना हुआ है। डोकलाम पठार भूटान, भारत तथा तिब्बत के साथ लगता एक त्रिकोणीय क्षेत्र है, जिसके नीचे भारत का सिल्लीगुड़ी गलियारा पड़ता है। यह गलियारा लगभग 17 किलोमीटर चौड़ा है और इसके द्वारा ही भारत ज़मीनी तौर पर उत्तर-पूर्व के सात राज्यों से जुड़ा हुआ है। 
चीन यह दावा कर रहा है कि डोकलाम पठार उसके क्षेत्र में पड़ता है, जबकि भूटान का दावा यह है कि यह क्षेत्र उसका है। चीन इस संबंध में 1890 में ब्रिटिश भारत और चीन के बीच हुए समझौते का हवाला देते हुए इस क्षेत्र पर अपना दावा जता रहा है। परन्तु भारत का पक्ष यह है कि इस क्षेत्र के बारे में 2012 में दोनों देशों के बीच यह सहमति बनी थी कि चीनी और भारतीय प्रतिनिधि जो सीमांत विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत जारी रख रहे हैं, उनके द्वारा ही डोकलाम पठार के क्षेत्र में सीमाबंदी तय की जायेगी। परन्तु चीन के भारत में स्थित डिप्टी चीफ और मिशन लियू जिनसोंग ने भारत के इस दावे का खंडन करते हुए कहा है कि सहमति यह बनी थी कि डोकलाम पठार के आसपास के क्षेत्र की सीमाबंदी तय की जायेगी। इस सहमति में कभी भी यह बात शामिल नहीं है कि डोकलाम का क्षेत्र विवादास्पद है। इस चीनी प्रतिनिधि ने भारत को एक बार फिर धमकी दी है कि वह शीघ्र-अति-शीघ्र अपनी सेना इस क्षेत्र से बाहर निकाले, नहीं तो इसके गम्भीर परिणाम निकल सकते हैं। चीनी प्रतिनिधि ने यह भी कहा है कि उनके संयम का प्याला भर गया है और अब वह और ज्यादा इन्तज़ार नहीं कर सकते।
इस क्षेत्र के विवाद को लेकर जिस तरह की धमकियां चीन द्वारा दी जा रही हैं, उस कारण एक तरह से अप्रत्यक्ष रूप में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती उत्पन्न हो गई है। निरपेक्ष युद्ध विशेषज्ञों का विचार है कि भारत सैन्य तैयारियों और आधुनिक हथियारों के पक्ष से चीन से लगभग 20 वर्ष पीछे है। यदि दुर्भाग्य से इस क्षेत्र को लेकर युद्ध होता है तो भारत को चीन का मुकाबला करने में बहुत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। यह बात भी उल्लेखनीय है कि चीन ने भारत से दो वर्ष बाद आज़ादी प्राप्त करके लगातार अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति में वृद्धि की है और इस समय के दौरान वह दुनिया की एक महाशक्ति के तौर पर उभर आया है। परन्तु भारत गत 70 वर्षों में प्रतिबद्ध नेतृत्व की अनुपस्थिति और भ्रष्टाचार के कारण न तो देश आर्थिक तौर पर इतना शक्तिशाली बन सका है और न ही देश चीन के मुकाबले की सैन्य क्षमता हासिल कर सका है। चाहे हमारे अरुण जेतली जैसे नेता यह कह रहे हैं कि भारत अब 1962 वाला नहीं है परन्तु हमें यह भी समझने की ज़रूरत है कि चीन भी अब 1962 वाला नहीं है। 
सुरक्षा के पक्ष से भारत का घरेलू दृश्य भी कोई ज्यादा संतोषजनक नहीं है। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में कई किस्म की बगावतें चल रही हैं। इन संगठनों से संबंधित हथियारबंद दस्ते समय-समय पर उत्तर-पूर्व में आम लोगों तथा सुरक्षा बलों को निशाना बनाते हैं। यह भी दोष लगते हैं कि इनको चीन आदि देशों से भी शह और संरक्षण मिलता है। एक समय तक यह संगठन बंगलादेश से भी शरण और समर्थन हासिल करते रहे हैं। भारत के बिहार, उड़ीसा, बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा अन्य कई राज्यों में नक्सलवाद की गम्भीर समस्या है। नक्सली भी समय-समय पर सुरक्षाबलों पर बड़े हमले करके अपना अस्तित्व जताते रहते हैं। 
गत लम्बे समय से चल रही इन बगावतों के अलावा जब से केन्द्र में श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है, इसकी शह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे संबंधित अन्य बहुत सारे संगठनों ने अपना ‘हिन्दुत्व का एजेंडा’ देश पर तेज़ी से लागू करना शुरू किया हुआ है। अल्पसंख्यकों, दलितों तथा धर्मनिरपेक्ष विचार रखने वाले बुद्धिजीवियों तथा अन्य लोगों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है। अलग-अलग राज्यों में भाजपा के सत्ता में आने के बाद बने गौ-रक्षा के कानून एक तरह से पाकिस्तान के बदनाम कानून ‘ईशनिंदा’ का रूप ले चुके हैं। गौ-रक्षा के बहाने से अनेकों लट्ठमार संगठन उभर आए हैं, जोकि कानून अपने हाथों में लेकर अल्पसंख्यकों तथा दलितों के साथ संबंधित लोगों पर हमले करके उनको पीट-पीट कर मार रहे हैं। इन घटनाओं की संसद के दोनों सदनों में भी अनेक बार चर्चा हो चुकी है। पानी सिर से निकलता देखकर कई बार प्रधानमंत्री ने भी इस संबंधी अपनी चुप्पी तोड़ी है, परन्तु इन घटनाओं में आज तक कोई ज्यादा कमी नहीं आ सकी, क्योंकि केन्द्र सरकार ऐसे घटनाक्रमों को रोकने के लिए गम्भीर नज़र नहीं आ रही। अपितु कई बार लगता यह है कि किसी न किसी रूप में इन संगठनों को भारतीय जनता पार्टी से संबंधित लोगों का संरक्षण प्राप्त है। यह रुझान भी सामने आया है कि हर वैध-अवैध ढंग से केन्द्र से लेकर राज्यों तक प्रत्येक स्तर पर भाजपा अपनी सत्ता स्थापित करना चाहती है। संविधान की धर्म-निरपेक्ष और लोकतांत्रिक भावना को नुक्सान पहुंचाकर भारत को पाकिस्तान की तरह ही एक धर्म आधारित राज्य में बदलना चाहती है। इस सब कुछ के कारण अल्पसंख्यकों, दलितों और धर्म-निरपेक्ष विचारों वाले लोगों में काफी चिन्ता पाई जा रही है। यदि भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठनों का यही रुख बरकरार रहा तो देश के भीतर पहले ही चल रही बगावतें भी और बढ़ेंगी तथा अन्य शांति व्यवस्था के बड़े मामले उभर आयेंगे। कुछ विद्वानों का तो यह विचार है कि यदि संघ और भाजपा ने तथाकथित हिन्दुत्व का फूट डालो एजेंडा न छोड़ा तो देश का एक और बड़ा बंटवारा भी हो सकता है। 
गत दिनों देश को दरपेश आन्तरिक और बाहरी इन सुरक्षा चुनौतियों को मुख्य रखकर भारत की थल-सेना के प्रमुख विपिन रावत ने यह बयान दिया था कि भारतीय सेना एक ही समय पाकिस्तान और चीन के दोनों मोर्चों तथा आधे देश की आन्तरिक सुरक्षा के मोर्चे से निपटने में सक्षम है, परन्तु बहुत सारे सुरक्षा विशेषज्ञों ने थल सेना प्रमुख के इस बयान पर प्रश्न उठाये थे कि भारतीय सेना के लिए इन सभी मोर्चों पर एक ही समय सफलता हासिल करना इतना ज्यादा आसान कार्य नहीं होगा।
इस समूचे संदर्भ में हमारा यह विचार है कि यदि पाकिस्तान और चीन द्वारा पैदा की जा रही सुरक्षा चुनौतियों से भारत की सरकार ने बेहतर ढंग से निपटना है तो उसको अपना हिन्दुत्व का एजेंडा छोड़कर भारतीयता का एजेंडा अपनाना पड़ेगा, जिस तरह कि 2014 के चुनावों में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ का दावा किया था। उसी वायदे पर अमल करते हुए देश में अल्पसंख्यकों तथा दलितों पर हो रहे हमलों को रोकना पड़ेगा और देश की राजनीतिक और विचारधारक भिन्नता को मानते हुए अपने नागरिकों को विचार प्रकट करने की आज़ादी देनी पड़ेगी और जन-पक्षीय तथा प्रकृति पक्षीय विकास नीतियां अपनाकर देश के सभी लोगों और खासतौर पर गरीब लोगों को विकास के उपयुक्त अवसर मुहैय्या करवाने पड़ेंगे। इस ढंग से ही आन्तरिक और बाहरी चुनौतियों के संदर्भ में देश की सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है और देश को एक आर्थिक शक्ति बनाने की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है। 
पड़ोसी देशों द्वारा पैदा की जा रही सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए चाहे हमें हर किस्म की तैयारी रखनी चाहिए परन्तु इसके साथ-साथ हमारा यही दृष्टिकोण होना चाहिए कि गम्भीर से गम्भीर विवाद युद्ध से नहीं अपितु बातचीत द्वारा ही सुलझ जायें तो बेहतर होगा।