किसान आत्महत्याएं रोकने के लिए ठोस योजनाबंदी की ज़रूरत


लगातार किसान आत्महत्याओं का मामला बेहद गम्भीर और दुखद बनता जा रहा है। इस दुखांत पर सरसरी दृष्टि डालते हुए यह पता चलता है कि प्रभावित किसानों के पास भूमि बहुत कम थी अर्थात् 5 से 3 एकड़ के लगभग। इन पर ऋण लाखों रुपए का चढ़ गया, जिसको उतार पाना इनके बस में नहीं था और उन्होंने कोई ज़हरीली दवाई पीकर या किसी अन्य ढंग से अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। सींगो मंडी के गांव मिरजेआणा में जिस किसान ने आत्महत्या की, उसकी भूमि भी पांच एकड़ थी। घर में दो नौजवान लड़कियां और दो लड़के हैं। 
ज़िला मानसा में जिस किसान द्वारा आत्महत्या की गई, उसकी आयु महज़ 36 वर्ष थी। वह चार एकड़ भूमि का मालिक था, जो ऋण के कारण पहले ही बिक चुकी थी। इसके अलावा उस पर चार लाख रुपए का ऋण चढ़ा हुआ था, उसकी पत्नी और तीन बच्चे थे। इसके कुछ दिन पहले मालवा में ही तीन किसानों द्वारा की गई आत्महत्या के भी लगभग ऐसे ही कारण थे। अबोहर के निकट एक गांव में किसान द्वारा की गई आत्महत्या का कारण उसका बड़ा परिवार और छ: एकड़ भूमि का सेम से खराब होना बताया जा रहा है। इसके अलावा परिवार ऋण में भी फंसा हुआ था। अधिकतर आत्महत्याएं मालवा के क्षेत्र में हो रही हैं। इस घटनाक्रम से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आज निचले स्तर पर जीवन व्यतीत कर रहे गांवों के किसान और खेत मज़दूरों की हालत क्या होगी? यदि ऐसा पंजाब जैसे राज्य में हो रहा है, जिसको कभी हरित क्रान्ति का संस्थापक कहा जाता था, तो देश के अन्य राज्यों की हालत किस कद्र दयनीय होगी? लगभग चार महीने पूर्व पंजाब में कांग्रेस की सरकार आई है। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने अपनी चुनाव मुहिम के दौरान किसानों के ऋण को मुख्य मुद्दा बनाया था। उन्होंने किसानों पर चढ़ा सारा ऋण माफ करने का ऐलान किया था। इस संबंधी उन्होंने पिछले महीनों में काफी भागदौड़ भी की थी। वह केन्द्रीय नेताओं को भी मिले परन्तु लगता है कि इस मामले का हल निकाल पाना उनके लिए बेहद मुश्किल है। पंजाब सरकार पर ऋण की भारी गठरी है, जिसके भार को कम कर सकना अब मुश्किल हुआ पड़ा है। राज्य की आर्थिकता डांवाडोल है। किसानों द्वारा लगातार आत्महत्याएं करते जाने के समाचारों ने पैदा हुए इस दुखांत में और भी वृद्धि कर दी है, परन्तु इसके साथ सोचने वाली बात यह होगी कि व्यवहारिक रूप में सरकार प्रभावित किसानों तक किस ढंग से पहुंच कर सकती है। आत्महत्याओं के कारणों को गम्भीरता से लेते हुए इसके हल निकालने के क्या प्रयास कर सकती है? इस संबंधी सरकार को यह भी सोचने की ज़रूरत है कि अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के साथ विचार-चर्चा करके और किसान हितैषी संस्थाओं को साथ लेकर वह किस तरह के प्रयास करे, ताकि पंजाब को इस संताप से निकाला जा सके। इस संबंधी बेहद गम्भीरता से योजनाबंदी करने की ज़रूरत होगी और निचले स्तर पर तत्काल कुछ कदम उठाये जाने ज़रूरी होंगे। केन्द्र सरकार को कृषि भूमि योजना को प्रभावशाली ढंग से पुन: लागू करने के लिए प्रयास करने चाहिए। इस बीमा योजना में रह गई त्रुटियों को दूर करने के लिए केन्द्र के संबंधित मंत्रालय के साथ लगातार विचार-विमर्श करके इसको व्यवहारिक रूप में लागू करवाने के लिए प्रयासरत होना पड़ेगा।
गत दिनों मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने स्वयं यह माना है कि उनके चार महीनों के कार्यकाल में 90 के लगभग किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, जबकि पूर्व सरकार के समय आत्महत्याओं की संख्या हज़ारों में थी। परन्तु इसके साथ-साथ सरकार की यह जवाबदेही भी होनी चाहिए कि चार महीनों में इस दुखांत को दूर करने के लिए उसने कितने बड़े और गम्भीर प्रयास किए हैं? हम मानते हैं कि छोटे किसानों द्वारा लिया गया यह ऋण कृषि उत्पादकता से ही संबंधित नहीं है, इसको कृषि उत्पादन के लिए इस्तेमाल करने की बजाय उन्होंने अपने निजी कार्य व्यवहार के लिए भी इस्तेमाल किया है। परन्तु उनके द्वारा तब ही ऐसा किया गया है, क्योंकि वह आर्थिक तंगी और मुश्किलों से जूझ रहे हैं। उनके पास अपने सामाजिक तथा अन्य कार्य व्यवहारों को पूरा करने के लिए ऋण लेने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं रहता। 
इस दिशा में सोचते हुए आज सरकार को हर हाल में इस समस्या को सुलझाने के लिए अलग-अलग तरह के कदम उठाने पड़ेंगे। सिर्फ ऋण माफी के बयान ही इस संताप को कम करने के लिए काफी नहीं हैं। लगातार हर पक्ष से यह प्रयास किये जाने चाहिए कि कृषि को एक लाभदायक धंधा बनाया जाए। इसके साथ-साथ मनरेगा जैसी योजनाओं को भी प्रभावशाली ढंग से लागू किया जाना चाहिए। यदि तत्काल ध्यान देकर सरकार गम्भीरता से होते इस दुखांत पर काबू पाने के लिए संगठित हो तो स्थिति में सुधार आने की उम्मीद की जा सकती है और आत्महत्याओं के लिए मजबूर होते किसानों और खेत मजदूरों का हाथ पकड़ा जा सकता है। 
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द