2 माह बाद पुन: आबाद होगा शेर-ए-पंजाब का समर पैलेस


अमृतसर, 11 सितम्बर (सुरिन्दर कोछड़) : शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह द्वारा अमृतसर के रामबाग के मध्य भाग में अपनी रिहायश के लिए स्थापित किए समर पैलेस सहित दरवाज़ा रामबाग की बाहरी ड्योढ़ी के नव-निर्माण का कार्य नवम्बर माह में मुकम्मल होने के बाद यह स्मारक पंजाब सरकार के सुपुर्द कर दिए जाएंगे। रामबाग सहित बाग वाले स्मारकों व अमृतसर के इकलौते बचे रह गये दरवाज़ा रामबाग की बाहरी ड्योढ़ी का नवनिर्माण करवाने वाली दिल्ली स्थित कल्चरल कंज़रवेशन इनेशिएटिव कम्पनी की डायरैक्टर गुरमीत संघा राय ने यह दावा करते हुए बताया कि उपरोक्त स्मारकों का नवनिर्माण अंतिम चरण में पहुंच चुका है और रहता कार्य आगामी दो दिनों में मुकम्मल हो जाएगा। हालांकि करोड़ों रुपये की लागत से उपरोक्त स्मारकों के करवाए गए नवनिर्माण के मुकम्मल होने पर इन स्मारकों का उपयोग किस कार्य हेतु किया जाएगा, इस बारे न तो उपरोक्त कम्पनी के पास कोई जानकारी है और न ही रखरखाव से संबंधित विभागों द्वारा इस संबंधी कोई योजना बनाई गई है। उल्लेखनीय है कि 84 एकड़ भूमि में फैले उपरोक्त बाग के मध्य में महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी गर्मियों की रिहायश के लिए सन् 1819 में उपरोक्त आलीशान महल का निर्माण करवाया। उस समय बाग व बाग के मध्य भाग में बने उपरोक्त समर पैलेस पर 1,25,000 रुपये, महल के सदरखाने, तहखाने, महल की तीन ड्योढियों व मुख्य दरवाज़े व दरवाज़े की बाहरी ड्योढ़ी पर 68,000 रुपये, चार सुरक्षा बुर्जियों सहित 8 बारादरियों पर 20,000 नानकशाही रुपये खर्च आए। मौजूदा समय में सिख शासन समय बाग में स्थापित की गई चार बड़ी व चार छोटी बारांदरियों में से केवल एक छोटी बारांदरी ही साबुत बची है।  वहीं दूसरी ओर महाराजा रणजीत सिंह द्वारा अमृतसर की सुरक्षा के लिए बनाए गए दरवाज़ों में से एकमात्र बचे दरवाज़ा रामबाग की बाहरी ड्योढ़ी की मुरम्मत का काम बहुत ही साधारण रफ्तार से पांच वर्ष पहले शुरू किया गया था। बीबी गुरमीत राय द्वारा दावा किया जा रहा है कि शेष रहता कार्य अक्तूबर-नवम्बर में मुकम्मल हो जाएगा। महाराजा रणजीत सिंह द्वारा सन् 1823 के आसपास बनवाए उपरोक्त दरवाज़े को सन् 1860 में अंग्रेज़ सरकार ने गिरा दिया। दरवाज़ा रामबाग के साथ लगती उपरोक्त ड्योढ़ी सिख शासन समय एक छोटे से किले के रूप में इस्तेमाल होती रही है।
 शेर-ए-पंजाब अकसर इस ड्योढ़ी में ठहरकर शहरवासियों की समस्याएं सुनते और अदालत लगाते थे। मौजूदा समय इस विरासती स्मारक के बड़े हिस्से में लोगों के कब्ज़े कायम हैं और स्मारक की दीवार में बनाई गई कुछ दुकानें कार्पोरेशन द्वारा पक्के तौर पर दुकानदारों को बेची गई हैं।