दुनिया जीत कर अपनों से क्यों हार जाते हैं पंजाबी खिलाड़ी ?


देश-विदेश में अपने खेल का लोहा मनवाने वाले जब पंजाबी खिलाड़ी अपनी जन्म भूमि पर पांव रखता हैं तो उनकी जीत की खुशी धूल बनकर उड़ जाती है। मैडल जीत कर घर पहुंचने तक उनके मन में अपनी जीत की खुशी और जश्न को लेकर जो सपने संजोये होते हैं, उनका समाज, सरकार की ओर से कोई भी मूल्य न होने के कारण वह निराशा के आलम में डूब जाते हैं। पिछले अनुभव बताते हैं कि पंजाब सरकार, खेल एसोसिएशनों, सरकारी विभागों के खिलाड़ी अपनी ड्यूटी के साथ-साथ दिन-रात मेहनत करके अपना एक-एक रुपया जोड़कर खेलों पर खर्च करके देश-विदेशों से पदक ला कर जब अपनी उपलब्धियों का पिटारा विभाग के अधिकारियों के सामने रखते हैं तो अधिकारियों की ओर से बनता मान-सम्मान न मिलने के कारण वह अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते हैं। पंजाब को खेलों का मक्का कहे जाने वाले पी.ए.पी. स्पोर्ट्स काम्पलैक्स के 16 खिलाड़ी इस वर्ष अमरीका में विश्व पुलिस खेलों में हिस्सा लेने गए थे और जब जीत कर वापिस आए तो उस समय उनको निराशा का मुंह देखना पड़ा, जिसमें पंजाब पुलिस की खेल नीति में विश्व पुलिस खेलों की कोई मान्यता नहीं है।
पंजाब सरकार ने भारत सरकार के आदेशों के अनुसार लाखों रुपए खर्च करके इनको हिस्सा लेने के लिए भेजा और खिलाड़ियों को इसका क्या लाभ मिला? पंजाब पुलिस में सर्व-भारतीय पुलिस खेलों की खेल नीति में तो अंक हैं। इसी तरह राष्ट्रमंडल, एशियन खेलें, विश्व चैम्पियनशिप और ओलम्पिक में तो हिस्सा लेने के तो अंक हैं, लेकिन पदक जीतने के कोई भी अंक दर्ज नहीं है और इसी तरह खिलाड़ी जीत कर भी अपनों से हार जाते हैं। बेशक जीत और हार एक खिलाड़ी की ज़िंदगी का अहम हिस्सा है। बुजुर्ग कहते हैं कि कोई भी खिलाड़ी अपने गॉडफाडर के बिना तरक्की नहीं कर सकता और खिलाड़ियों की असली मां उसकी खेल एसोसिएशन होती हैं। लेकिन लम्बे अनुभव बताते हैं कि रोए बिना मां भी दूध नहीं देती, लेकिन खिलाड़ी को टूर्नामैंट में भाग लेने के लिए खेल किट्ट, ट्रेनिंग, खाद्य सामग्री और कई बार टूर्नामैंट में हिस्सा लेने के लिए पैसे भी अपनी ओर से खर्च करने पड़ते हैं।  इसके बाद बारी आती है समय की सरकारों की और इस समय पंजाब खेल विभाग खिलाड़ियों की खेल प्रतिभा के योग्य पारखी बनने की बजाय इधर-उधर हाथ मार रही है। दिन-रात मेहनत करके पदक  जीतने वाले उभरते खिलाड़ियों को मान-सम्मान और आर्थिक सहायता देने के लिए भी सरकार का खज़ाना खाली है। खिलाड़ियों की सुविधाओं के बारे में बड़े-बड़े दावे करने वाले विभाग के पास खिलाड़ियों को रिफ्रैशमैंट देने के लिए भी ठेकेदार ही नहीं मिल रहे और खिलाड़ी अपनी ओर से अच्छी खाद्य सामग्री लेकर राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऊंचाईयों की बुलंदियों को छू रहे हैं। 
पिछले दिनों गुरदासपुर जूडो खेल सैंटर के खिलाड़ी कर्मजोत सिंह और मनप्रीत सिंह की दास्तान कोई अलग नहीं है, इनको विश्व स्कूल खेलों में हिस्सा लेने के लिए अपनी स्पोर्ट्स किट्ट खरीदने के लिए 30-30 हज़ार की ज़रूरत थी, क्योंकि साधारण किसानी, मज़दूर वर्ग से संबंधित होने के कारण इन खिलाड़ियों को ज़िला प्रशासन, खेल विभाग और शिक्षा विभाग को सहायता की प्रार्थना करने पर भी उनको बदले में निराशा ही मिली और पदक जीत कर खुशी तो क्या साझी करनी थी इन सब खिलाड़ियों के माता-पिता को ऋण उतारने के लिए और ज़रूरी वस्तुओं को नज़र अंदाज़ करना पड़ रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि पंजाब की औद्योगिक इकाईयां, मल्टीनैशनल कम्पनियां, धार्मिक स्थल, प्रवासी भाईचारा, राजनीतिक पार्टियां और खेल क्लबों को खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने के लिए क्या आगे नहीं आना चाहिए।
खिलाड़ियों का खेल मैदानों में पसीना सूखने से पहले उनकी उपलब्धियों का मूल्य ज़रूर डाल देना चाहिए। समय की सरकारों को खिलाड़ियों द्वारा जीते गए पदकों की बनती नकद ईनामी राशि जल्दी देनी चाहिए। खिलाड़ी के खेल कोटे के पदों को तुरंत भरना चाहिए। पंजाब पुलिस की खेल नीति में संशोधन करना चाहिए। पंजाब खेल विभाग को राष्ट्रीय स्तर पर भाग लेने वाले खिलाड़ियों का विशेष खेल किट बैंक बनाना चाहिए। हरियाणा की तर्ज पर खिलाड़ियों का बस किराया 75 प्रतिशत माफ होना चाहिए। खेल एसोसिएशन को टूर्नामैंट करवाने के लिए बनती राशि हर साल जारी करनी चाहिए। खेल विंग अप्रैल में शुरू होने चाहिए। पंजाब के खिलाड़ियों का सेहत बीमा भी ज़रूर करवाना चाहिए। खेलों के विषय को ज़रूरी विषय बनाना चाहिए और वैटर्न खिलाड़ियों की पैंशन में बढ़ोतरी होनी चाहिए और उन्हें मान-सम्मान देना चाहिए। खिलाड़ियों के मनोबल में बढ़ोतरी करनी चाहिए। तभी खिलाड़ी पंजाब का नाम रौशन करेंगे। देश-विदेश में जाकर और वह वापस आकर मान-सम्मान मिलने की खुशी महसूस करेंगे।