कविता देवी का सपना   डब्ल्यू.डब्ल्यू.ई. चैम्पियन बनना


 टेलीविजन के स्पोर्ट्स चैनलों पर डब्ल्यू-डब्ल्यू-ईर्, डब्लूडब्लूएफ आदि के नाम से फ्री स्टाइल कुश्ती के अनेक मुकाबले प्रसारित किये जाते हैं । इन कुश्तियों में कितनी गंभीरता या नौटंकी है, कहना कठिन है । लेकिन इतना तय है कि इनके प्रशंसकों की दुनिया में कमी नहीं है । यही कारण है कि इनमें भाग लेने वाले पहलवानों को स्टार सेलिब्रिटीज जैसी इज्जत व रूतबा मिलता है । इसलिए टाइगर जीत सिंह से लेकर महान खली तक और अब जिंदर महल तक ऐसे तमाम भारतीय पहलवान हैं जो विश्व मंच पर फेमस हैं ।
 हालांकि इन प्रतियोगिताओं में ग्लैमर बढ़ाते हुए महिला पहलवान भी हिस्सा लेती हैं ।  लेकिन किसी भारतीय महिला पहलवान का इनमें शामिल न होने की कमी को काफी समय से महसूस किया जा रहा था, जिसे अब कविता देवी ने पूरा किया है । हरियाणा की कविता देवी ने पंजाब में खली की अकादमी से ट्रेनिंग प्राप्त करने के बाद इस साल अगस्त में अपना डब्ल्यू-डब्ल्यू-ईर् डेब्यू किया जब उन्होंने पहली एक यंग क्लासिक प्रतियोगिता में हिस्सा लिया । इस प्रतियोगिता में कविता देवी को अपनी उम्मीद के अनुसार तो सफलता नहीं मिली, लेकिन उनकी प्रतिभा व वेषभूषा ने सभी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित किया । वह अन्य महिला पहलवानों की तरह बिकनी या अन्य आधुनिक आउट फिट में कुश्ती नहीं लड़ती हैं बल्कि परम्परागत भारतीय वेषभूषा शलवार-कुर्ता में अखाड़े में उतरती हैं ।
ग्रामीण हरियाणा में ‘मर्दों के खेल’ कुश्ती को अपनाना और परम्परागत वेषभूषा में अंतर्राष्ट्रीय अखाड़े में उतरना कोई आसान काम नहीं है। लेकिन कविता देवी ने यह कर दिखाया और अब वह चैंपियन बनना चाहती हैं । कुश्ती के संसार में प्रवेश करने से पहले कविता देवी पॉवर लिफ्टिंग में थीं, जो कि एक ओलिंपिक स्पर्धा है । इसमें उन्होंने अनेक ग्लोबल पदक जीते, जिनमें दक्षिण एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक भी शामिल है । पॉवरलिफ्टिंग में उनका करियर एकदम सही दिशा में जा रहा था, इसलिए थोड़ा अजीब लगता है कि वह इसे छोड़कर अचानक प्रोफेशनल कुश्ती में प्रवेश कर गईं । इस बारे में वह बताती हैं, ‘मेरे लिए एक स्पर्धा से दूसरी में जाना कोई मुश्किल नहीं था । दरअसल, पॉवर लिफ्टिंग में मैं बोर हो रही थी, मुझे लग रहा था कि इसमें मुझे जो कुछ करना था मैं कर चुकी हूं । मैंने पॉवर लिफ्टिंग में अपना सब कुछ झोंक दिया था, लेकिन सफलता के बावजूद मुझे पहचान व शोहरत नहीं मिल रही थी । मुझे कुछ मिसिंग सा लगता था। कुश्ती में प्रवेश करते ही वह एहसास समाप्त हो गया। मैंने अभी शुरुआत की है, लेकिन देखो अभी से सेलिब्रिटी बन गई हूं।’ 
पॉवर लिफ्टिंग से कुश्ती में जाने के कविता देवी के फैसले की उनके आसपास के लोगों ने कड़ी आलोचना की लेकिन उन्हें हमेशा अपने परिवार का समर्थन प्राप्त रहा । उनके शब्दों में ‘अगर ऐसा न होता तो इतना बड़ा निर्णय लेना मेरे लिए मुश्किल हो जाता । मेरे भाई व पति की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण रही कि बिना प्रॉब्लम के सब कुछ आसानी से हो गया । उन्होंने किसी आलोचना को मुझ पर हावी नहीं होने दिया ।’ क्लासिक प्रतियोगिता में कविता देवी को सफलता तो न मिली लेकिन अनुभव अच्छा रहा और दुनियाभर के पहलवानों से काफी कुछ सीखने को मिला । इससे वह भविष्य की एक मज़बूत परनॉर्मर बन सकेंगी । ‘परॉर्मर’ ही सही शब्द है क्योंकि डब्ल्यू-डब्ल्यू-ईर् में कुश्ती कम, प्रदर्शन अधिक होता है । कविता देवी के अनुसार, ‘मेरे पास तकनीक है, योग्यता व प्रतिभा है और ताकत है । इस खेल में लुक्स या वेशभूषा का इतना महत्व नहीं है जितना फैन फोलोइंग का हैए जो सफलता से हासिल हो जायेंगे। मैं भीड़ के लिए परफॉर्म करना सीख रही हूं, जिसे शोमैनशिप कहा जाता है। टैलेंट तो है ही, बाकी सब भी आ जायेगा धीरे धीरे।’
कविता देवी बचपन से ही कुश्ती की बड़ी फैन हैं और टीवी पर नियमित डब्ल्यू-डब्ल्यू-ईर् देखा करती थीं । उन्होंने अंडरटेकर व महिला पहलवान च्यना की सभी कुश्ती देखी हैं । जब महान खली ने कुश्ती में प्रवेश किया तो वह उन्ही के पद चिन्हों पर चलना चाहती थीं । खली पहले भारतीय बने विश्व खिताब जीतने वाले, कविता देवी यह सफलता अर्जित करने वाली पहली भारतीय महिला बनना चाहती हैं । अब यह सपना साकार होने के बहुत करीब नज़र आ रहा है । वह कहती हैं, ‘मुझे अपने पर पूरा विश्वास है और मुझे भारतीय कुश्ती फैन्स का भी समर्थन प्राप्त है । मैं भारत से पहली डब्ल्यू-डब्ल्यू-ईर् महिला चैंपियन बनना चाहती हूं । इसे हासिल करने के लिए मैं जी जान से कोशिश करूंगी। बाकी सब तो टाइम आने पर पता चलेगा।’
 एक पॉवर लिफ्टर के तौर पर कविता देवी पहले ही अनके देशों व संस्कृतियों के सम्पर्क में आ चुकी हैं,  इसलिए उन्हें वैसे तो कोई परेशानी नहीं हुई लेकिन प्रोफैशनल कुश्ती में लड़कियां जो ड्रेस पहनती हैं उसे एडजस्ट करना कठिन था । वह बताती हैंए श्मुझे वैसे कपड़े पहनने में झिझक थी । मैं अपनी संस्कृति से ही जुड़े रहना चाहती हूं और भारत का ही प्रतिनिधत्व करना चाहती हूंए इसलिए मैं रिंग में शलवार कुर्ता पहन कर उतरती हूं न कि बिकनी । इस सिलसिले में मैं पहला कदम उठाना चाहती थी कि दुनिया देख ले कि कोस्टियूम एक भारतीय महिला को विश्व मंच पर परफॉर्म करने से नहीं रोक सकती।’ भारत में आज भी लड़कियों के लिए खेल के अवसर कम हैं । हरियाणा में भी स्थिति दयनीय है । इसलिए कविता देवी के समक्ष बड़ी चुनौती थी। अनेक लोग उन पर व उनके परिवार पर फब्तियां कसते थे कि वह न सिर्फ  स्पोर्ट्स में बल्कि पॉवर लिफ्टिंग जैसे स्पोर्ट्स में हिस्सा ले रही हैं। अपने अनुभव के बारे में कविता देवी बताती हैं, ‘गांव वासी मेरे पिता से कहते कि लड़की को अकेले बाहर मत भेजो ऐसे, शादी करा दो इसकी। किस्मत से मेरा भाई मेरा सुरक्षाकवच बना और उसने इन सब बातों से मुझे बचाए रखा । वह मुझसे कहता कविता, तुम गेम पर ध्यान दो, इन लोगों को मुझपर छोड़ दो’। इस तरह मेरी एकाग्रता कभी भंग नहीं हुई।’