महंगे विदेशी कोच भी न बदल सके भारतीय हॉकी की किस्मत


पिछले लगभग एक दशक से भारतीय हॉकी टीम की ट्रेनिंग की बागडोर विदेशी कोचों के हाथों में है। बड़े वेतन वाले विदेशी कोच भी भारतीय हॉकी टीम की उपलब्धियों में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं ला सके। स्वदेशी कोचों को नज़र अंदाज़ करके बार-बार बदले गए विदेशी कोच किसी भी पक्ष से हॉकी की किस्मत नहीं बदल सके, बल्कि मोटे वेतन और बढ़िया सुविधाओं का आनंद लेते हैं और अपने-अपने देशों को चले जाते हैं। अभी हाल ही में हॉकी इंडिया ने हाई परफार्मेंस डायरैक्टर रोलांट ओलट्समैनज़ (हालैंड) को हटाने के बाद, गलत ढंग से अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश के तौर पर राष्ट्रीय टीम का कोच नियुक्त करने के लिए खुले रूप में दावेदारियां भी मांगी हैं, जिसका तात्पर्य पुन: स्वदेशी कोचों को नियुक्त करने की ओर लौटना है।
अगर विदेशी कोचों की नियुक्तियों के दौर की बात करें तो इसकी शुरुआत मई 2009 से स्पैनिश कोच जोस बरासा की नियुक्ति से हुई। बरासा को सात लाख प्रति महीने की दर पर 2012 के ओलम्पिक खेलों तक राष्ट्रीय टीम की बागडोर सौंपी गई थी, लेकिन उनको नवम्बर, 2011 में ही फारिग कर दिया गया। बरासा के कार्यकाल के दौरान भारतीय टीम गुआंगजु  एशियन खेलों में कांस्य पदक ही जीत सकी और वह प्रत्यक्ष तौर पर लंदन ओलम्पिक में हिस्सा लेने की हकदार न बन सकी। इस उपरांत जून 2011 में आस्ट्रेलिया के माइकल नोबस को 6.5 लाख रुपए प्रति महीना मेहनताना पर भारतीय हॉकी टीम की कमान सौंपी गई। नोबस की नियुक्ति 2016 के रियो ओलम्पिक खेलों तक ही की गई। नोबस के कार्यकाल के दौरान लंदन ओलम्पिक में भारतीय टीम 12वें स्थान पर रही और विश्व लीग के तीसरे दौर में 6वें स्थान पर रही। इसी प्रकार नोबस को जून, 2003 में चलता कर दिया गया। 
 फिर अक्तूबर, 2013 में आस्ट्रेलिया के टैरी वाल्श को 10 लाख रुपए प्रति महीना के मेहनताना के साथ राष्ट्रीय टीम की बागडोर सम्भाली। वाल्श को भी 2016 के ओलम्पिक खेलों तक ही राष्ट्रीय हॉकी की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। वाल्श के कार्यकाल के दौरान भारतीय टीम ने 2014 के इंचोन एशियन खेलों में स्वर्ण पदक जीता। वाल्श के कार्यकाल के दौरान भारतीय टीम को 2016 के ओलम्पिक खेलों में हिस्सा लेने का मौका मिला। सिर्फ एक वर्ष के अंतराल के बाद ही अक्तूबर 2015 में वाल्श ने भारतीय हॉकी प्रबंधकों की अनावश्यक दखलंदाजी  का बहाना बनाकर अपने पद से त्याग पत्र दे दिया, अगले वर्ष फरवरी 2015 में हालैंड के पालवान आस को 7.5 लाख प्रति महीना पर राष्ट्रीय मुख्य कोच की जिम्मेदारी सौंपी गई। उसके साथ 2018 तक का इकरारनामा किया गया। पाल के छोटे से कार्यकाल के दौरान जुलाई, 2015 में बैल्जियम में विश्वकप हॉकी लीग के सैमीफाइनल के दौरान इंडिया के प्रधान नरेन्द्र बत्तरा की पाल के साथ किसी मुद्दे पर अनबन हो गई। जिसके कारण पाल भी समय से पहले चले गए। फिर हालैंड के रोलांट ओल्टसमैन्ज़ को जुलाई, 2015 में भारतीय हॉकी का हाई परफार्मेंस डायरैक्टर नियुक्त किया, जिस दौरान उनको 9.5 लाख रुपए प्रति महीने के मेहनताना का भुगतान किया गया। 
टैरी वाल्श के इस्तीफे के बाद ओल्टसमेन्ज़ की अगुवाई में भारतीय टीम ने एशिया कप में सिल्वर पदक जीता। इसी दौरान भारतीय हॉकी टीम रियो ओलम्पिक में भी 8वें स्थान पर रही। पाल वान आस की रवानगी के बाद ओल्टसमैन्ज को फिर राष्ट्रीय टीम का स्वतंत्र चार्ज दिया गया। आखिरकार ओल्टसमैन्ज का भी वक्त से पहले जाने का समय आ गया। बीते दिन उनकी कारगुज़ारी को गैर तसल्लीबख्श करार दे कर हॉकी इंडिया ने चलता कर दिया। अगले कोच की नियुक्ति तक एक और हाई परफार्मेंस निदेशक डेविड जॉन को राष्ट्रीय टीम का प्रभारी बना दिया गया। इसी तरह भारतीय हॉकी टीम को पिछले लगभग 8 वर्षों से 5 विदेशी कोच मिले, जो भारत की ओर से जीते पहले किसी भी विश्व स्तरीय टूर्नामैंट के पदक का रंग नहीं बदल सके अर्थात् राष्ट्रीय टीम की कारगुज़ारी में सुधार नहीं ला सके, बल्कि बार-बार हमारे खिलाड़ियों को अलग-अलग रणनीतियों के अंदाज़ में खेलना पड़ा। कोई कोच अधिक रक्षात्मक हॉकी को खिलाता रहा, कोई अधिक हमलावर और कोई हरफनमौला अंदाज़ वाली हॉकी के साथ स्वयं को ठीक ठहराने के लिए प्रयासशील रहा। प्रत्येक बड़े टूर्नामैंट में असफलता के बाद हॉकी इंडिया कोच बदल कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त होती रही है। हॉकी विशेषज्ञों का कहना है कि इस के दौरान विदेशी कोचों पर खर्च किए गए धन की केन्द्र सरकार की ओर से उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए और समूची कारगुज़ारी का विश्लेषण करना चाहिए। इसी के साथ विदेशी कोचों पर विश्वास करके, उनको ही राष्ट्रीय टीम की बागडोर सौंपी जाए।