2-जी घोटाले का फैसला - कांग्रेस एवं द्रमुक को मिली राहत


कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने वर्ष 2004 से 2014 तक देश का शासन चलाया। यह सारा समय डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के पद पर बने रहे। उन्हें एक अच्छा प्रभावशाली एवं ईमानदार व्यक्ति माना जाता रहा है। वह अपनी सरकारी सेवा के लम्बे कार्यकाल के दौरान तथा नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री के रूप में भी घोटालों में नहीं घिरे परन्तु संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान कुछ ऐसे घटनाक्रम घटित हुए, जिन्होंने सरकार से संबद्ध विभागों एवं राजनीतिज्ञों को बड़े घोटालों में फंसा दिया। इस कारण संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की बड़ी बदनामी हुई। प्रधानमंत्री होने के कारण डा. मनमोहन सिंह पर भी इन घोटालों की ज़िम्मेदारी आयद होती थी।  इनमें से एक घोटाला 2-जी स्पैक्ट्रम का था, जिसमें टैलीकॉम कम्पनियों को मोबाइल के क्षेत्र में लाइसैंस दिए गए थे। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले दौर में वर्ष 2007-08 में लाइसैंस बोली के माध्यम से नहीं, अपितु वर्ष 2001 में इसके लिए निर्धारित की गई कीमतों के दृष्टिगत पहले आने वालों के आधार पर दिए जाते थे। इससे यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता था कि ये लाइसैंस सत्तारूढ़ लोगों ने अपनी पंसदीदा कम्पनियों को दिए थे। ये लाइसैंस वर्ष 2008 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की पहली पारी में दिए गए थे, परन्तु वर्ष 2010 में कम्पट्रोलर एवं आडिट जनरल ऑफ इंडिया (कैग) की ओर से यह रिपोर्ट दी गई थी कि ये लाइसैंस इस ढंग से बांटने के कारण सरकारी कोष को 1.76 लाख करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ा है। ये राशि इतनी बड़ी एवं चौंकाने वाली थी, जिसकी देश भर में एकबारगी चर्चा होने लगी थी। उस समय भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की खूब खिंचाई की थी तथा डा. मनमोहन सिंह को ‘चोरों का राजा’ का खिताब भी दिया गया था। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की दूसरी पारी में इस घोटाले की अत्यधिक चर्चा हुई थी, तथा इसने सरकार की छवि बुरी तरह से खराब कर दी थी एवं प्रधानमंत्री को एक प्रकार से कटघरे में ला खड़ा किया था। इस घोटाले का इतना अधिक प्रचार हुआ कि 2014 के लोकसभा चुनावों में इस घोटाले के प्रभाव के दृष्टिगत ही कांग्रेस एवं उसकी भागीदार पार्टियों को निराशाजनक पराजय का सामना करना पड़ा था। इस घोटाले के संबंध में वर्ष 2012 में देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भी इन कम्पनियों को दिए गए लाइसैंस रद्द कर दिए थे, जिसके दृष्टिगत सरकार की छवि और भी खराब हो गई थी। परन्तु अब सात वर्षों के बाद सी.बी.आई. की विशेष अदालत ने इस घोटाले के संबंध में ठोस प्रमाणों की कमी के कारण तीन मामलों के सारे दोषियों को बरी कर दिया है। इससे कांग्रेस, द्रमुक एवं अन्य संबंधित पार्टियों में खुशी पैदा होना स्वभाविक ही है। डा. मनमोहन सिंह एक प्रकार से ऐसे बड़े आरोपों की ज़िम्मेदारी से बरी हो गए हैं। इससे जहां कांग्रेस की स्थिति अधिक मजबूत हुई है, वहीं भारतीय जनता पार्टी एक प्रकार से बचाव की मुद्रा में आ गई प्रतीत होती है, क्योंकि उसकी ओर से ही इस घोटाले के विरुद्ध पिछले कई वर्षों से मोर्चा खोला हुआ था। वर्ष 2014 के चुनावों में भी विरोधी दलों की ओर से इस मामले को बहुत उछाला गया था, जिसका प्रभावशाली ढंग से स्पष्टीकरण दे पाने में कांग्रेस एवं उसकी भागीदार पार्टियां असमर्थ रही थीं। आगामी समय में राजनीतिक क्षेत्र में कांग्रेस को इस फैसले का लाभ प्राप्त करने का बड़ा अवसर मिल जायेगा, तथा वह अधिक दृढ़ता के साथ राजनीतिक मैदान में विचरण करने लगेगी। नि:संदेह द्रमुक की नेता कणिमोझी जो करुणानिधि की बेटी हैं, को भी जहां इस फैसले ने बड़ी राहत दी है, वहीं दक्षिण भारत की राजनीति में द्रमुक की गिरती हुई प्रतिष्ठा को भी इस फैसले ने बड़ा सहारा दिया है। 

बरजिन्दर सिंह हमदर्द