दक्षिण अफ्रीका की रहस्यमयी पांडुजी झील


प्रोफेसर बर्न साइड वृद्ध आदिवासी की बात सुनकर कुछ वक्त के लिए परेशान तो जरूर हुए, मगर वो भी धुन के पक्के थे। हिम्मत नहीं हारे, साहस जुटाकर वह फिर झील की तरफ चल पड़े। एक लंबा सफर तय कर जब वे झील के किनारे पहुंचे तब तक स्याह रात हो चुकी थी। अंधेरा इतना घना था कि पास की चीज भी दिखाई नहीं दे रही थी। इस भयानक जंगल में प्रोफेसर बर्न साइड ने अपने सहयोगियों के साथ सुबह का इंतजार करना ही बेहतर समझा। सुबह होते ही बर्न साइड ने झील के पानी को देखा ।यह काले रंग का था। उन्होंने अपनी अंगुली को पानी में डुबोया और फिर जबान से लगाकर चखा। उनका मुंह कड़वाहट से भर गया। इसके बाद बर्न साइड ने अपने साथ लाई गईं शीशियों में झील का पानी भर लिया। प्रोफेसर ने झील के आसपास उगे पौधों और झाड़ियों के कुछ नमूने भी एकत्रित किए। अब तक दिन का दूसरा पहर चढ़ चुका था। प्रोफेसर और उनके साथियों ने शाम का अंधेरा होने के पहले ही वहां से दूर चले जाने का फैसला किया। मगर रहस्यमयी ढंग से उनके तमाम अनुमान फेल हो गए। वह अभी चले ही थे और कुछ ही दूर पहुंचे थे कि अचानक अंधेरा घिर आया। प्रोफेसर बर्न साइड और उनके सहयोगियों को यह कुछ अजीब भी लगा और डरावना भी। फिर भी उन लोगों ने चलते रहना ही तय किया ताकि झील के पास से जल्द से जल्द दूर निकल जाएं। मगर चलना अब पल प्रति पल दूभर होता जा रहा था। नतीजतन वो लोग एक खुली जगह पर रात गुजारने के मकसद से रुक गए। हालांकि कोई कुछ कह तो नहीं रहा था लेकिन अब तक झील के बारे में जो कुछ सुना था उससे सभी आशंकित थे। इसलिए उन्होंने तय किया कि बारी-बारी से सोया जाए। जब प्रोफेसर बर्न साइड सो रहे थे तब उनके सहयोगी ने कुछ अजीबो-गरीब आवाजें सुनीं। उन्होंने घबराकर प्रोफेसर को जगाया। सारी बात सुनने पर बर्न साइड ने आवाज का रहस्य जानने के लिए टार्च जलाकर आसपास देखा, लेकिन उन्हें कुछ भी पता नहीं चला। आवाजों के रहस्य को लेकर वे काफी देर तक सोचते रहे। सवेरे चलने के समय जैसे ही उन्होंने पानी की शीशियों को संभाला तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि शीशियां खाली थीं। हैरानी की एक बात यह भी थी कि शीशियों के ढक्कन ज्यों के त्यों ही लगे हुए थे। वे एक बार फिर पांडुजी झील की तरफ  चल पड़े। लेकिन इस समय बर्न साइड खुद को अस्वस्थ महसूस कर रहे थे, उनके पेट में दर्द भी हो रहा था। फिर भी वे झील के किनारे पहुंचे। बोतलों में पानी भरा और फिर वापस लौट पड़े। फिर अगली रात गुजारने के लिए उन लोगों को एक स्थान पर रुकना पड़ा। लेकिन इस बार उनमें से किसी की आंखों में नींद नहीं थी। सुबह वो लोग फिर यह देखकर हैरान थे कि सब की सब शीशिया खाली थीं।  बर्न साइड के जो सहयोगी उनके साथ पांडुजी झील का रहस्य जानने गये थे, उनकी भी एक-एक करके 3 हफ्तों के अंदर अबूझ कारणों के चलते मौत हो गयी।