शौक से मनाएं बेटियों की लोहड़ी


त्यौहारों की खूबसूरती यह होती है कि हम सारे मिलकर बिना किसी जाति, मज़हब और ऊंच-नीच से इनको मनाते हैं। यही सांस्कृतिक और सभ्याचार हमें आपस में जोड़ती है। ऐसा ही पंजाबियों का लोकप्रिय त्यौहार है ‘लोहड़ी’। लोहड़ी माघ की संक्रांति से पहले होती है।  पिछले दिन की और माघ की संक्रान्ति से पहली हरात होती है। यह मौसमी त्यौहार है। आमतौर पर हमारे समाज में लड़कों की ही लोहड़ी मनाई  जाती है, जिस घर में बेटे का जन्म हुआ हो या बेटे की शादी हुई हो। वहां ही पूरे धूमधाम के साथ लोहड़ी बांटी जाती है। बड़े-बड़े जश्न मनाए जाते हैं। लड़कियों की लोहड़ी मनाने का ज्यादा प्रचलन हमारे समाज में नहीं है। हालांकि लोगों की सोच में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। लोग लड़कियों के प्रति लगाव को दर्शा रहे हैं, जोकि अच्छी बात है। कई परिवारों में तो लड़कियों की भी लोहड़ी मनाई जा रही है, लेकिन ऐसे परिवार आज भी बहुत कम है।लड़कियां भी समाज का महत्वपूर्ण अंग है। लड़कियों से ही रिश्तों की नींव मजबूत बनती है और सामाजिक विकास में बहुमूल्य हिस्सा डालती है। आज  शिक्षा, सभ्याचार, कला, साहित्य ऐसा कौन सा क्षेत्र है, जहां लड़कियां बेहतरीन प्रदर्शन नहीं कर रहीं? लड़कियां तो घर की रौनक होती है, इनके चेहरे पर मुस्कान रहेगी तब ही मनुष्यता आगे बढ़ती रहेगी। इस दिन माता-पिता अपनी जवान हुई लड़की के लिए योग्य बर की कामना करते हैं, और अब तो सरकार भी लड़कियों की लोहड़ी को प्रोत्साहन देने लगी है।
आओ, सारे मिलकर लड़कों की तरह लड़कियों की भी खुशियां मनाएं, उनकी भी लोहड़ी बांटें। इन नन्हीं-मुन्नी लड़कियों के मन की खुशी का आदर सत्कार करें। समझदार बने और खुली सोच को अपनाकर लड़का-लड़की का अंतर खत्म करें। ऐसा सामाजिक और परिवारिक माहौल जीयें कि लड़कियां अपने पंखों से आसमान में उड़ सकें। लड़का-लड़की के भेदभाव को मिटाकर और इन सबसे ऊपर उठकर ही एक अच्छा इन्सान बनकर संसार में मिसाल बनकर जीवन 
व्यतीत करें।
‘धन्न बेगाना ना समझो मैनूं,
न समझो बोझ जहान,
पुत्तां वांग सत्कारो मैनूं
मैं तां कुल दी शान।