बुल्लेशाह की नवियों नवीं बहार वाला 2018


मेरे लिए नया वर्ष नई बहार लेकर आया है। बाबा बुल्लेशाह के इश्क जैसी। न रब्ब की तीर्थों, न रब्ब मक्के वाली। शुद्ध सैकुलर। सजदे भुलावन वाली धारणा में भीगी और अकड़ कर चलने की आवाज़ें देती। मेरे मित्र बरजिन्दर सिंह हमदर्द की दर्द भरी आवाज़ में। नई संगीत एल्बम के रूप में। पहले की तरह ही पाक-पवित्र नाम ‘कुसुम्भड़ा’ जिसमें जज़बात भी हैं और आहट भी :
अमलां वालियां सब लंघ गईयां
रह गई ओगुण हारी
सारी उम्रां खेड गुआई
ओड़क बाज़ी हारी
‘दो नैणां दा तीर चला के, मैं आज़िज़ दे सीने ला के’ उसके बाद कभी भी सार न लेने वाली आवाज़ में बाबा बुल्लेशाह के शब्दों में :
वेखो नी की कर गया माही
लैंदा ही दिल, हो गया राही
मेरे मित्र की यह वाली सीडी लम्बे इंतज़ार से शुरू होती है, जिसमें गायक इन्तज़ार शब्द को बार-बार दोहरा कर इसका संदेश श्रोताओं तक पहुंचाता है। विशेषता यह कि इस मार्ग में आने वाली मुश्किलों को निपटाने के लिए बुल्लेशाह निम्नलिखित शब्द चुनते हैं :
आप इशारा अख दा कीता
ता मधुवा मनसूर ने पीता
सूली चढ़ के दर्शन कीता
इस निहुं दी उल्टी चाल।
यहीं बस नहीं, इसमें ‘न कर ऐडी दलेरी’ वाला विचार भी शामिल है और घूंघट उठा देने की दलील भी। साफ और स्पष्ट, ‘हुण शरमां काहनूं रखियां’
सीडी के अंतिम शब्द और भी भावपूर्ण हैं।
बौहड़ी वे तबीबा, मैंडी खबर गइया
तेरे इश्क नचाया कर थईया-थईया
लौटकर आने का वास्ता डालकर यह भी बताने की कसर नहीं छोड़ी कि माशूक/माशूका पूरी तरह घायल हो चुका/चुकी है। यह घाव इतना ताज़ा है कि मेरे शब्दों की पकड़ में नहीं आता। इसको बरजिन्दर सिंह की आवाज़ ही पकड़ सकती थी और पकड़ा भी है। सुनें और आनंद लें। 
जहां तक बाबा बुल्लेशाह को याद करने की बात है, मेरे ‘नवां ज़माना’ वाले मित्रों ने 2018 का पूरा वर्ष अपने कैलेंडर द्वारा बुल्लेशाह को समर्पित किया है, बुल्लेशाह ज़िंदाबाद! 
यह संयोग की बात है कि मेरे आंगन बुल्लेशाह के शब्दों वाली सीडी और नवां ज़माना वाला कैलेंडर उस समय पहुंचे जब मेरी रेखा चित्रों की पुस्तक सरगोशियां-2 छप कर पहुंची। यूनिस्टार बुक्स चंडीगढ़ द्वारा प्रकाशित (पृष्ठ 476, मूल्य 450 रुपए)। इसमें बलराज साहनी, इन्द्र कुमार गुजराल, दारा सिंह पहलवान, सादत हसन मंटो और एम.एस. रंधावा ही नहीं, बरजिन्दर सिंह हमदर्द सहित मेरे चालीस  समकालीनों के रेखाचित्र शामिल हैं। 2018 की नविंयों नवीं बहार ज़िंदाबाद! 
2017 के दूरगामी आविष्कार
विकास और विनाश के चौराहे पर खड़ा मनुष्य घातक से घातक बम बनाने में भी आगे-पीछे नहीं देखता और नये जीवन तथा नई धरतियों की खोज करने में भी पीछे नहीं हटता। 2017 का वर्ष इस धारणा पर मोहर लगाने वाला रहा। जाने-पहचाने सोलर सिस्टम से विज्ञानिकों ने सात ग्रह और ढूंढ लिये हैं, जिनमें से तीन धरती माता जैसे हैं। उनका विचार है कि इन पर हवा, पानी, धूप और जीव-जंतु की पूरी सम्भावना है। ऐसे ही पश्चिमी प्रशांत महासागर में आठवां महाद्वीप मिल गया है, जिसका 94 प्रतिशत हिस्सा पानी में है। 
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के विकास में लगे वैज्ञानिकों के रोबोट अब मानवीय भावनाओं को पढ़ने और दर्द की तीव्रता जानने के योग्य हो गए हैं। उन्होंने मानवीय क्लॉक की मूटेशन वाला क्रिप्टोक्रोम-1 नाम का ऐसा ज़ीन भी ढूंढ लिया है, जो जीव का साधारण घटनाक्रम इस सीमा तक विकृत कर देता है कि मनुष्य को आधी रात के बाद ही नींद आती है। मौसम के वैज्ञानिकों ने मौसम परिवर्तन से पैदा होने वाले तनाव के ज़ीन भी ढूंढ लिए हैं, जो कल को तनाव का ठीक इलाज करने में सहायक हो सकते हैं। हमारे अपने देश के वैज्ञानिकों ने खून की एक बूंद से कैंसर के रोग की जड़ ढूंढने में सफलता प्राप्त कर ली है। 
पंजाबी नावलकार नछत्तर का सम्मान
‘कैंसर ट्रेन’ नावल से प्रसिद्ध पंजाबी लेखक नछत्तर ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। भारतीय साहित्य अकादमी ने उनके नये नावल ‘स्लो डाउन’ को साहित्य के श्रेष्ठ पुरस्कार के लिए चुन लिया है। निश्चय ही इस चुनाव में पंजाबी के संयोजक रवेल सिंह का भी हाथ है। दोनों को लाख-लाख बधाई। 
अंतिका
(सैयद वारिस शाह)
अखीं वेखयां बाझ प्रीत नाहीं
जिवें बिना यकीन ऐतबार नाहीं
बाझों दु:ख दे सुख नसीब नाहीं
लगन बाझ खुआर संसार नाहीं
बाझों इश्क दे ज़ौक ते शौक नाहीं
बाझों वसल दे मौज बहार नाहीं
बारिस रण्ड, फकीर, तलवार, घोड़ा
चारे थोक एह किसे दे यार नाहीं।