पानी से बाहर भी जीवित रहने वालीपर्च मछली


पर्च मछली की कुछ जातियां नदियों और तालाबों में रहती हैं तथा कुछ सागरों और महासागरों में पर्च बहुतायत से पायी जाने वाली एक विख्यात मछली है। इसके अंतर्गत बहुत से परिवारों की मछलियां आती हैं। विश्व में पर्च के 150 परिवार हैं। इनमें से 35 परिवार भारत में पाए जाते हैं। वृक्ष पर चढ़ने वाली मछली पर्च की एक जाति है। इसे अंग्रेजी में क्लाइम्बिंग पर्च कहते हैं।  चढ़ने वाली पर्च ताजे पानी की मछली है। यह दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में भारत और श्री लंका से लेकर फिलीपींस तक पायी जाती है। यह दक्षिण भारत के पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट के सागर तटों पर बहुतायत से मिलती है तथा उत्तरी-पूर्वी भागों में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। भारत में इसे कोई मछली के नाम से जाना जाता है। चढ़ने वाली मछली सील की तरह अपना सिर इधर-उधर लुढ़काती हुई घास के मैदानों पर चलती हैं और एक लंबे समय तक पानी के बाहर जीवित रह सकती है। चढ़ने वाली पर्च की चाल बड़ी बेढंगी होती है। यह हमेशा तालाबों में रहती हैं तथा जब तालाब वाला निवास सूखने लगता है तो यह जमीन पर चलकर नये तालाब की खोज करती है। चढ़ने वाली पर्च अपने गलफड़ों के आवरण, छाती के मीनपंख तथा पूंछ की सहायता से जमीन पर चलती है। यह चलते समय अपने गलफड़ों के आवरण के सिरे के किनारे के कांटों को जमीन पर धंसा-धंसाकर आगे बढ़ती है। इस समय इसकी छाती के मीनपंख पैरों की तरह खंबे का कार्य करते हैं एवं पूंछ का सिरा आगे बढ़ने के लिए दबाव डालता है। यह जमीन पर ठीक ढंग से चल नहीं पाती अत: बड़ी बेढंगी चाल से आगे बढ़ती है। यही कारण है कि यह एक घंटे में 200 मीटर की भी दूरी नहीं तय कर पाती। इसके छोटे-छोटे झुंड बरसात के मौसम में जमीन पर चलते हुए देखे जा सकते हैं। चढ़ने वाली पर्च के शरीर में, मौसम में अचानक होने वाले परिवर्तनों को सहन करने की अद्भुत क्षमता होती है तथा यह पानी के बाहर लंबे समय तक जीवित रह सकती है। चढ़ने वाली पर्च की शारीरिक संरचना सामान्य पर्च की तरह होती है। इसकी लंबाई 15 सेंटीमीटर से लेकर 22 सेंटीमीटर तक एवं शरीर का रंग धूसर हरे से लेकर धूसर रूपहला तक होता है। इसके मीनपंख कत्थई होते हैं एवं गलफड़ों के आवरण के पीछे एक गहरा धब्बा होता है और इनके किनारों पर कांटे होते हैं। इसी प्रकार पूंछ के मीनपंख के आधार पर भी एक गहरा धब्बा होता है, किंतु इसके किनारों पर कांटे नहीं होते।  चढ़ने वाली पर्च पानी के बाहर वायुमण्डल से हवा लेती है तथा अपनी गर्दन के दोनों ओर बने छिद्रों द्वारा प्लेटों के गुच्छे तक पहुंचाती है। ये छिद्र एक वॉल्ब द्वारा नियंत्रित होते हैं। इसके बाद फेफड़ो का कार्य करने वाला गुच्छा हवा से ऑक्सीजन ले लेता है।