परिपक्व दृष्टिकोण की ज़रूरत


कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी काफी सक्रिय हो गए हैं। कांग्रेस ने दिल्ली में जन-आक्रोश रैली के नाम पर एक बड़ा समूह एकत्रित किया, जिसमें उन्होंने भाजपा सरकार एवं खास तौर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाया। दूसरी ओर कर्नाटक के चुनाव सिर पर हैं। वहां कांग्रेस पार्टी की सरकार है। अत: राहुल गांधी के लिए वहां पुन: अपनी सरकार लाना एक बड़ी चुनौतीपूर्ण बात होगी। इसके अतिरिक्त पिछले दिनों उन्होंने दिल्ली में ‘संविधान बचाओ’ अभियान भी शुरू किया था तथा यह कहा था कि नरेन्द्र मोदी पुन: प्रधानमंत्री बनने के लिए उत्सुक हैं। देश में महिलाओं के साथ हो रहे दुष्कर्म अथवा दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर उन्होंने मौन धारण किया हुआ है। 
उन्होंने भाजपा एवं बहुत से केन्द्रीय संस्थानों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों को बिठाने की बात भी की तथा सर्वोच्च अदालत को कुचलने की बात भी की और पिछले समय में संसद के कामकाज को ठप्प करवाने की ज़िम्मेदारी भी उन्होंने प्रधानमंत्री पर ही डाली है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 70 वर्षों के सम्पूर्ण समय में विश्व भारत को एक लोकतांत्रिक देश के रूप में देखता रहा है परन्तु नरेन्द्र मोदी ने यहां तानाशाही फैला दी है। वह सिर्फ अपने ‘मन की बात’ ही करते हैं, जबकि अन्य मंत्रियों को बोलने तक कि इजाज़त नहीं है। इसके कुछ ही दिन बाद नई दिल्ली में कांग्रेस की ओर से की गई जन-आक्रोश रैली के लिए देश भर से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को बुलाया गया। यहां भी राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध मोर्चा खोलते हुए कहा कि वह यह बताएं कि चीन दौरे के दौरान उन्होंने डोकलाम मुद्दे को लेकर एक भी शब्द क्यों नहीं बोला। उन्होंने दस साल के कांग्रेस नेतृत्व वाले शासन की मोदी के चार साल के शासन से तुलना करते हुए कहा कि लोगों को बेरोज़गारी एवं ‘गब्बर सिंह टैक्स’ के सिवाय भाजपा ने कुछ नहीं दिया। महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार की उन्नाव जैसी घटनाएं घटित हुई हैं। भाजपा सरकार के समय अल्पसंख्यकों एवं दलितों पर हमले हुए हैं, जबकि कांग्रेस ने पिछले 70 वर्षों में समाज के सभी वर्गों में एकता बनाए रखी एवं प्यार फैलाया। मोदी शासन में किसान तनाव में है तथा उनके ऋण भी माफ नहीं किए गए। इस रैली में सोनिया गांधी ने कहा कि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार में भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हुई हैं। यहां तक कि मीडिया को भी अपनी बात कहने से रोका जाता है। 
जहां तक अल्पसंख्यकों पर हमलों एवं साम्प्रदायिक संगठनों का प्रश्न है, इससे केन्द्र सरकार को बरी नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार राम मंदिर बनाने के नाम पर माहौल बनाया जा रहा है, जिस प्रकार कुछ साम्प्रदायिक संगठनों को प्रोत्साहन मिल रहा है, उसने केन्द्र की मोदी सरकार की छवि को अवश्य खराब किया है। ऐसा सब कुछ विगत लम्बी अवधि से होता आ रहा है, परन्तु नि:संदेह मोदी सरकार की ओर से साम्प्रदायिक संगठनों को बड़ी शह मिल रही है। यह प्रभाव उस समय भी परिपक्व होता रहा है, जब प्रधानमंत्री ने ऐसी घटनाओं के घटित होने के तुरन्त बाद कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सर्वोच्च अदालत के कुछ जजों की ओर से खुले रूप में मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध भड़ास निकालने से भी मोदी सरकार पर संदेह की उंगली उठती है, परन्तु जहां तक सत्ता का संबंध है, राहुल गांधी के अनुसार मोदी के भीतर आगामी समय में सत्ता प्राप्ति की होड़ लगी दिखाई देती है। तथापि, हम इसके विपरीत यह महसूस करते हैं कि चार वर्ष सत्ता से हटकर सोनिया गांधी, राहुल गांधी एवं कांग्रेस के अन्य नेता भी बौखला गए प्रतीत होते हैं। इस बड़े देश में केवल कांग्रेस अथवा एक परिवार ने ही शासन नहीं करना अपितु इसके लिए अन्यों को भी अवसर अवश्य मिलना चाहिए। परन्तु इन कांग्रेसी नेताओं की छटपटाहट से यह प्रभाव मिलता है कि जैसे इस देश पर शासन करने का उनका जन्म-सिद्ध अधिकार हो। ऐसी बौखलाहट में राहुल गांधी कुछ ज्यादा ही बोलने लगे हैं। कई बार उनकी टिप्पणियां वज़नदार नहीं होतीं तथा न ही उनके भविष्य में एक गम्भीर नेता के तौर पर उभरने के संकेत मिलते हैं। गरीबी एवं बेरोज़गारी केवल मोदी सरकार की देन नहीं है। इसके लिए कांग्रेस की पिछले लम्बे समय की सरकारें भी ज़िम्मेदार हैं। पिछले चार वर्ष में ही उच्च राजनीतिक स्तर के भ्रष्टाचार का बोलबाला नहीं हुआ अपितु डा. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री होते हुए भी ऐसे घोटाले एवं घपले सामने आए थे, जिन्होंने सरकार की छवि को पूर्णतया बिगाड़ कर रख दिया था। मोदी सरकार की चार साल की अनेक उपलब्धियां ठोस एवं महसूस करने के योग्य हैं। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी इस काल के दौरान भारत अधिक प्रभावशाली बनकर उभरा है। जहां इसके अन्य अनेक बड़े देशों के साथ संबंध बहुत सुधरे हैं, वहीं इस काल के दौरान इसके प्रयत्नों से पाकिस्तान की आन्तरिक वास्तविकता भी लोगों के समक्ष आई है। नि:संदेह कांग्रेस ने विरोधी पार्टी के रूप में विचरण करते हुए सरकार की आलोचना करनी है, परन्तु यदि राहुल गांधी के अधिकतर बयानों एवं भाषणों में सतही बातों एवं आरोप-प्रत्यारोप की झलक ही दिखाई देगी तो कांग्रेस पार्टी के भविष्य में आगे बढ़ने की आशा नहीं की जा सकती। इसलिए राहुल गांधी को अधिक गहन एवं गम्भीर तथा परिपक्व दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द