सुधार गृहों में सुधार की ज़रूरत


पंजाब में जेलों की सामूहिक रूप से दशा सुधारने हेतु सरकार द्वारा सक्रियता की घोषणा से नि:संदेह रूप से प्रदेश के कानून-प्रिय लोगों के लिए संतोष की भावना उपजती है। पंजाब की जेलों की भीतरी एवं बाहरी दशा विगत कई दशकों से निरन्तर बड़ी चिंताजनक बनती जा रही है। सुधार गृहों का नाम मिलने के बाद से तो जैसे ये जेलें अपराधी-केन्द्र बन कर रह गई हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि छोटे-मोटे अपराध के लिए जेल गये लोग भी कट्टर एवं बड़ा अपराधी बन कर बाहर निकलते हैं। जेल की जिन ऊंची दीवारों से अपराधी कभी ़खौफ खाते थे, आज उन्हीं दीवारों में छेद कर वे अपराधों का भीतर-बाहर आयात-निर्यात करते हैं। जेलों में बैठ कर भी अपराधी कैसे शानो-शौकत पूर्ण जीवन जीते हैं, इसका पता इस तथ्य से भी चल जाता है कि उनके पास अत्याधुनिक फोन सुविधा हर समय मौजूद रहती है हालांकि जेलों के भीतर आम आदमी के लिए जैमर प्रतिबंध लागू हैं। नशा-तस्करी अथवा नशा-सेवन को लेकर जेल भेजे गये अपराधियों को जेलों के भीतर भी तमाम तरह का नशा आसानी से मिल जाता है। यहां तक कि खान-पान की किसी भी तरह की महंगी वस्तु की सुविधा पैसा चुकाने पर बड़ी आसानी से भीतर उपलब्ध हो जाती है। जेलों में बंद आपराधिक किस्म के लोग जश्न-पार्टियों का आयोजन करते हैं जिनमें शराब-कबाब की सुविधा भी रहती है, और इनमें जेलों के अधिकारी, कर्मचारी भी शामिल होते हैं। यहां तक कि जेलों के भीतर बंद अपराधियों के बीच आपसी लड़ाई-झगड़े भी होते हैं। इन लोगों के दु:साहस की सीमा देखिये, कि जेलों में कई बार कर्मचारियों पर हमले भी हुए हैं। यहां तक कि जेल सम्पत्तियों की आगज़नी भी की गई।
जेलों में सबसे बड़ी समस्या बंदियों के मरीज़ बन कर अस्पतालों में भर्ती होने और फिर इसके बाद फरलो मार कर पारिवारिक/सामाजिक समारोहों में शामिल होने की है। यहां बस पैसा अधिक खर्च हो जाता है। जेलों के भीतर की इन तमाम अव्यवस्थाओं के लिए किसी न किसी कारण आपराधिक तत्वों, जेल प्रशासन से जुड़े अधिकारियों/कर्मचारियों एवं बाहरी धरातल से राजनीतिज्ञों की मिलीभुगत उत्तरदायी रहती है। इनके बिना जेलों के भीतर की ये खुराफातें कदापि जारी नहीं रह सकतीं। इस स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए प्राय: घोषणाएं तो बहुत होती रहती हैं। अपने-अपने स्तर पर प्रशासनिक प्रयास भी बहुत हुए हैं, परन्तु स्थितियां निरन्तर खराब हुई हैं। उनमें सुधार की रही-सही गुंजाइश भी धूमिल होती गई है।अब एक बार फिर पंजाब के नये बने जेल मंत्री सुखजिन्दर सिंह रंधावा द्वारा जेलों की दशा सुधारने हेतु दिये गये बयान के बाद जेलों के भीतर की स्थिति उभर कर सामने आई है। पिछले कुछ समय से जेलों में अपराधियों को नशीले पदार्थों एवं अत्याधुनिक मोबाइल फोन सुविधा आसानी से उपलब्ध होने की खबरों ने प्रशासनिक धरातल पर ज़बरदस्त आहट पैदा की थी। इसका सम्पूर्ण नज़ला पुलिस और जेलों के  स्टाफ पर गिरता है। ऐसे में नये जेल मंत्री द्वारा जेलों के भीतर-बाहर कानून-व्यवस्था एवं अनुशासन को बनाये रखने के लिए केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बलों को तैनात किये जाने की घोषणा से स्थितियों की गम्भीरता का अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है। मंत्री महोदय ने प्रदेश की लुधियाना, फिरोज़पुर, संगरूर, नाभा, पटियाला एवं अमृतसर की जेलों में 4-जी जैमर लगाये जाने और प्रशिक्षित डॉग स्क्वायड तैनात किए जाने की घोषणा भी कई मायने रखती है। इससे कहीं न कहीं से यह स्वर उभरता है कि जेलों की व्यवस्था पंजाब पुलिस प्रशासन और जेल प्रशासन के हाथों दिये जाने से सब कुछ ठीक-ठाक दिखाई नहीं देता है। कहीं कुछ ऐसा अवश्य है जो सोचने पर विवश करता है। मंत्री महोदय द्वारा पिछले वर्ष जेलों के भीतर से 1500 मोबाइल फोनों की बरामदगी की स्वीकारोक्ति भी स्वत: बहुत कुछ कह जाती है। अब खोजी कुत्तों के दल को जेलों के भीतर की सुरक्षा व्यवस्था से जोड़े जाने से कुछ सुधार होने, अथवा कुछ अच्छा होने की आशा की जा सकती है। जेल  मंत्री द्वारा जेलों के लिए नया स्टाफ भर्ती किए जाने की घोषणा भी आशावाद को जगाने के लिए काफी है। यह भर्ती निचले स्तर से लेकर ऊपर तक सभी जगह की जाएगी। हम समझते हैं कि नि:संदेह स्थिति काफी गम्भीर है, और तत्काल रूप से प्रभावी नश्तर चलाये जाने की महती आवश्यकता प्रतीत होती है। इसके बिना यह घाव नासूर भी बन सकता है। बेशक जेलों के भीतर प्रशासनिक स्तर भी सब कुछ अच्छा नहीं है। जेलों में अगर कैदियों में अनुशासनहीनता, दबंगता है तो प्रशासनिक धरातल पर भ्रष्टाचार, भेदभाव-पूर्ण व्यवहार की दलदल मौजूद है। इसका एक दुष्परिणाम यह भी निकला है कि ईमानदार किस्म के अथवा भ्रष्टाचार में लिप्त न होना चाहने वाले अधिकारी जेलों में अपनी नियुक्ति नहीं चाहते। नि:संदेह यह स्थिति एकाएक तो पैदा नहीं हुई। इसके लिए दशकों का समय लगा है, और इसी के अनुरूप इस में सुधार की आशा भी एकाएक नहीं की जा सकती। तो भी, कहीं न कहीं से, किसी न किसी को तो शुरुआत करनी ही पड़ेगी। वर्तमान में मंत्री महोदय की इच्छाओं एवं घोषणाओं को यदि बूर पड़ता है, तो यह एक अच्छा संकेत हो सकता है। तथापि, अतीत का अनुभव यह भी बताता है कि अब तक की ऐसी तमाम घोषणाएं, कागज़ी बन कर रही हैं। हम समझते हैं कि प्रदेश का प्रत्येक कानून प्रिय प्राणी यह चाहता है कि पंजाब में अपराध कम हों, लोग अपराधी न बनें। जेलों में यदि कोई बंद होता है, तो उसे सुधरने का पर्याप्त अवसर भी मिलना चाहिए। इस हेतु जो कुछ भी सम्भव हो सकता है, उसे समाज, सरकार एवं प्रशासन को करना चाहिए। यह सब कुछ जितनी शीघ्र होगा, उतना ही देश, कौम, समाज के लिए अच्छा है।