खतरे की घंटी


पिछले दिनों भिन्न-भिन्न स्तरों पर दो राज्यों में चुनाव सम्पन्न हुए। कर्नाटक में विधानसभा के लिए एवं पश्चिम बंगाल में पंचायतों के लिए मतदान हुआ। भिन्न-भिन्न दलों के बीच कर्नाटक के चुनावों में जहां कड़ा मुकाबला हुआ, वहीं एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए गए, परन्तु चुनाव आयोग की ओर से किए गए व्यापक प्रबंधों के दृष्टिगत ये चुनाव प्राय: शांतिपूर्ण ढंग से पूर्ण हो गए। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में पंचायतों, पंचायत समितियों एवं ज़िला परिषदों के लिए सम्पन्न हुए चुनावों में व्यापक स्तर पर हिंसा भड़क उठी। मत पेटियों पर कब्ज़े किए गए। वाहनों को आग लगाई गई एवं भिन्न-भिन्न दलों के कार्यकताओं के बीच आपसी हिंसक झड़पें भी हुईं जिनका शिकार 20 से अधिक व्यक्ति हो गए। इसके अतिरिक्त सैकड़ों व्यक्ति गम्भीर रूप से घायल भी हुए हैं। ये चुनाव पश्चिम बंगाल में राज्य के चुनाव आयोग की ओर से करवाए गए थे। ऐसी स्थितियां पैदा होने की सम्भावनाएं पहले से ही दिखाई दे रही थीं। नामांकन पत्र दाखिल करने के समय से ही बहुत-से उम्मीदवारों को ज़बरदस्ती रोका गया था। इसके लिए तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं एवं नेताओं पर आरोप लगाया जाता रहा है। अन्तत: कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसमें हस्तक्षेप किया परन्तु उसके आदेश भी बड़े स्तर पर निष्प्रभावी सिद्ध हुए। ऐसी स्थितियां बनते देख कर प्रदेश सरकार को बाहर से केन्द्रीय सुरक्षा बलों को मंगवाने के लिए भी बार-बार कहा जाता रहा परन्तु मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने ऐसा करने से इसलिए इन्कार कर दिया क्योंकि केन्द्र में भाजपा सरकार है तथा उनके अनुसार केन्द्रीय सुरक्षा बल केन्द्र सरकार के संकेत पर ही काम करते हैं जबकि ऐसी व्यवस्था चुनाव आयोग ने करनी होती है। ममता बैनर्जी ने उन राज्यों से पुलिस मंगवाई जिनमें भाजपा की सरकार नहीं थी तथा बाहर से मात्र 2 हज़ार पुलिस कर्मी ही आए। इससे पहले  तृणमूल कांग्रेस लगभग 34 प्रतिशत पंचायती सीटें निर्विरोध जीतने में सफल रही। पिछले 35 वर्षों में ऐसा कम ही हुआ था कि 58692 पंचायत सीटों में से केवल 38 हज़ार 500 सीटों पर ही चुनाव हुए। अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल में यही बड़े चुनाव होने थे। इस अवसर को सत्तारुढ़ पार्टी किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी। इस बार मार्क्सवादी एवं कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ भाजपा का भी प्रदेश में उभार दिखाई देता था। इसलिए इन तीनों दलों ने इस चुनाव प्रक्रिया पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। मार्क्सवादी पार्टी के नेता मोहम्मद सलीम ने कहा है कि सत्तारुढ़ पार्टी ने ऐसा ़खतरनाक माहौल पैदा कर दिया था कि ये पंचायत चुनाव विपक्षी पार्टियों के बिना ही सम्पन्न हो जाएं। कांग्रेस नेता ओम प्रकाश मिश्रा ने कहा कि प्रदेश में लोकतंत्र खतरे में है। भाजपा नेता चंद्र कुमार बोस ने कहा है कि प्रदेश में इस प्रकार की हिंसा का इससे पहले कहीं कोई उदाहरण नहीं मिलता। जहां तक चुनावों का संबंध है, मार्क्सवादी पार्टी के साढ़े तीन दशक के शासन में भी कभी इतने व्यापक स्तर पर पंचायतों के लिए खड़े उम्मीदवार निर्विरोध नहीं जीते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि मार्क्सवादी पार्टी के शासन के समय भी व्यापक स्तर पर हिंसा होती रही थी। ममता बैनर्जी ने भी उनके पद-चिन्हों पर चलते हुए शासन किया है परन्तु इस शासन का हिंसक रुझान सभी सीमाओं को पार गया है। लोकतंत्र में ऐसा होना लज्जाजनक है। लोकतंत्र के नाम पर कार्य करने वाली ऐसी राजनीतिक पार्टियां ही इसका हृनन करते दिखाई दे रही हैं। ऐसी अवस्था नि:संदेह रूप से लोकतंत्र के लिए ़खतरे की घंटी है।

-बरजिन्दर सिंह हमदर्द