ज़रूरी तो नहीं....


‘नेहा! आज त्यौहार का नया दिन है, चलो मंदिर हो आते हैंए फिर जाना नहीं हो पायेगा।’ नेहा की सास ने कहा।
‘उफ़्फ, वही शब्द, वही हालात! नहीं... वह रिया को अकेली छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी।’ 
‘मेरी तबियत ठीक नहीं है मांजी’ चक्कर से आ रहे हैं। शायद कल थकान कुछ ज्यादा हो गई थी। आप ही हो आइये।’ नेहा ने आज पहली बार अपनी सास को किसी बात के लिए मना किया था।
‘अरे! तुम तो हर त्यौहार पर मंदिर जाती हो।’ सास को उसके मना करने पर आश्चर्य हुआ।
‘हां! मगर आज सचमुच जरा भी हिम्मत नहीं हो रही।’ ‘चलो, मैं गाड़ी निकालता हूं, आज हम सब साथ-साथ मंदिर जायेंगे।’ रवि ने सास-बहू की बातों में शामिल होते हुए कहा तो सहसा नेहा को यकीन नहीं हुआ।
मंदिर से लौटकर सबने हंसी-खुशी नाश्ता किया। जीजा-साली की चुहल भी लगातार चल रही थी। नेहा की नजरें बराबर रवि की बॉडी लैंग्वेज को समझने का प्रयास कर रही थीं मगर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जैसा नेहा कल्पना कर रही थी। थोड़ी देर में रवि के दोस्तों का आना शुरू हो गया। 
‘अरे यार! इस बार भांग-वांग का प्रबंध नहीं है क्या? रवि के एक दोस्त ने पूछा। 
अरे हां... इस बात की तरफ  तो नेहा का ध्यान गया ही नहीं। हर बार भांग की खास व्यवस्था करने वाले रवि ने इस होली उसका जिक्र तक नहीं किया। सब बहुत ही शालीन तरीके से एक-दूसरे को रंग लगा रहे थे। कोई छीना-झपटी, जोर जबरदस्ती नहीं। न रंग लगाने के लिए कोई हाथापाई हो रही थी। तभी रिया प्लेट में तरह-तरह के रंग की गुलाल सजा कर ले आई। रवि और उसके दोस्तों ने बहुत ही स्नेह के साथ उसे गुलाल लगाई। अचानक रवि ने पीछे से बाल्टी भर रंग नेहा पर उड़ेल दिया। हंसी का फव्वारा फूट पड़ा। नेहा ने बनावटी गुस्से से रवि की तरफ  आंखें तरेरी। उसी समय ढोल वाला आकर ढोल बजाने लगा और सब लोग उसकी थाप पर नाचने लगे। नेहा ने भी अपने दिमाग को झटका दिया और उनकी मस्ती में शामिल हो गई। इतिहास हर बार अपने आप को दोहराए...जरूरी तो नहीं....

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