राफेल विवाद का निपटारा होना ज़रूरी


लोकसभा के निकट आते चुनावों को देखते हुए सरकार और विपक्षी पार्टियां एक-दूसरे पर आरोपों की झड़ी लगाती जा रही हैं। भारत सरकार के फ्रांस के साथ हुए राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे को लेकर विपक्षी पार्टियों और खास तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा सरकार के खिलाफ एक तरह से युद्ध ही छेड़ दिया गया है। वह हर मंच पर इस सौदे संबंधी बात कर रहे हैं। फ्रांस की डसाल्ट कम्पनी के साथ राफेल विमानों के सौदे की लम्बी बातचीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार के समय से चलती रही है। उस समय इस सौदे की शर्तों के अनुसार भारत में तकनीक तबदील करने और यहां विमानों की तैयारी के लिए आवश्यक तौर पर किसी भारतीय कम्पनी को इसमें शामिल करना आवश्यक था।  इसलिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय हिन्दोस्तान एरोनॉटिकल लिमिटेड कम्पनी को इसमें डाला गया था। परन्तु लम्बे समय के विचार-विमर्श के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार के समय 126 विमान खरीदने का यह सौदा मुकम्मल नहीं हो सका था। मोदी सरकार ने फ्रांस सरकार के साथ 36 राफेल विमान खरीदने का सौदा किया था और भारत में इन विमानों की तैयारी के लिए कुछ कार्य करने हेतु डसाल्ट एवीनेशन के साथ अनिल अम्बानी की कम्पनी रिलायंस डिफैंस को मिलाया गया। राहुल गांधी लगातार यह आलोचना कर रहे हैं कि इस समझौते में हिन्दुस्तान ऐरोनॉटिकल लिमिटेड को डसाल्ट का भागीदार क्यों नहीं बनाया गया और यह भी इन 36 विमानों की खरीद कीमत में पहले की अपेक्षा भारी वृद्धि क्यों हुई? उनका आरोप है कि ऐसा अनिल अम्बानी की निजी कम्पनी को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है। इस संबंधी फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति ओलांदे के एक बयान को भी आधार बनाया गया है कि अम्बानी की कम्पनी का नाम शामिल करने के लिए भारत की ओर से सुझाव दिए गए थे। इस संबंधी फ्रांस के नए राष्ट्रपति इमैनुयल मैकरोनी ने कहा है कि राफेल सौदा दोनों सरकारों की आपसी सहमति से हुआ था। मैकरोनी ने बताया कि यह सौदा दोनों देशों की रणनीतिक भागीदारी की अहम कड़ी है। भारत और फ्रांस के लिए सैनिक तथा रक्षा के क्षेत्र में यह बहुत महत्त्वपूर्ण है और यह सिर्फ एक व्यापारिक रिश्ता नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पैरिस यात्रा के दौरान इस पर मोहर लगाई थी। विमानों को भेजने की प्रक्रिया सितम्बर 2019 से शुरू होगी। रक्षा मंत्री सीता रमण ने यह कहा है कि सेना के पास लड़ाकू विमानों की कमी को देखते हुए आपात्कालीन तौर पर चालू हालत में 36 राफेल विमान लेने का फैसला किया गया था। वायु सेना प्रमुख धनोआ ने भी इस विमान के महत्त्व संबंधी विशेष तौर पर उल्लेख करते हुए यह कहा है कि हिन्दुस्तान एरोनॉटिकल गत तीन-चार ऐसे सौदों में शामिल हुई थी परन्तु उन विमानों की तैयारी और सुपुर्दगी में बड़ी देर हो गई थी। अब डसाल्ट एवीऐशन ने यह कहा है कि उसका रिलायंस समूह के साथ भागीदारी का फैसला अपना था। अब तक स्थिति यह बन गई है कि जहां कांग्रेस ने इस सौदे के प्रति आलोचना का कड़ा रुख अपनाए रखा है, वहीं सरकार ने इस संबंधी देश की सुरक्षा के नाम पर रक्षात्मक नीति ही अपनाई हुई है। इसी समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा केन्द्र सरकार से यह सौदा करने के लिए अपनाई गई कार्य विधि संबंधी बंद लिफाफे में रिपोर्ट मांगने से इसको और भी बड़ा महत्त्व मिल गया है, परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि उसको विमानों की कीमत या सौदे के तकनीकी विस्तार की ज़रूरत नहीं है। अपितु वह विरोधियों की आलोचना को देखते हुए इस बात को पक्का करना चाहती है कि क्या इस फैसले और समझौते के लिए सही कार्य विधि अपनाई गई है। नि:संदेह सरकार को उच्च न्यायालय को इस सौदे के अमल संबंधी पूर्ण और पारदर्शी जानकारी देने की ज़रूरत होगी। यदि ऐसी जानकारी से उच्च न्यायालय की संतुष्टि नहीं होती, तो 58 हज़ार करोड़ रुपए के इस बड़े सौदे पर जहां प्रश्न चिन्ह लग जाएगा, वहीं सरकार की हालत भी पतली हो जाएगी। यदि सुप्रीम कोर्ट इस समझौते संबंधी सरकार के जवाब से संतुष्ट हो जाती है तो कांग्रेस द्वारा इस संबंधी किए जा रहे विरोध के नश्तर की धार कुंद पड़ सकती है। इसलिए चुनावों की शुरुआत से पहले इसका निपटारा आवश्यक प्रतीत होता है ताकि सरकार और विपक्षी पार्टियों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ किए जा रहे आरोप-प्रत्यारोप का अंत हो सके।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द