पैट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों का चुनावी उपचार


पैट्रोलियम पदार्थों में पैट्रोल और डीज़ल की कीमतें आती हैं, एल.पी.जी. गैस सिलैंडर और सी.एन.जी. भी आती हैं। पिछले बरस से अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति कम होने के दबावाधीन इन सब की कीमत में वृद्धि होने लगी है। पैट्रोल कीमत तो बढ़ कर 90 रुपए प्रति लीटर, डीज़ल 75 और 80 रुपए के बीच। यहां तक कि साधारण जन के इस्तेमाल एल.पी.जी. गैस और सी.एन.जी. भी महंगी होने लगी। बसों में सी.एन.जी. को डीज़ल का स्थानापल माना जाता है। इससे पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण की भी नीयत रहती है। लेकिन इन सभी की कीमतें आयात आपूर्ति की कमी, और डॉलर के मुकाबले रुपए के पतन के कारण उछाल की ओर दौड़ीं। अब क्योंकि चुनाव आयोग ने नवम्बर-दिसम्बर में बकाया पांच विधानसभाओं के चुनाव घोषित कर दिये। अगले बरस के पूर्वार्द्ध में भाजपा सरकार को एक और पारी के लिए आम चुनावों का सामना करना है, इसलिए उसे जनता की नाराज़गी की बहुत परवाह है। जब तक चुनाव दूर थे इस सरकार ने परवाह नहीं की। वित्त मंत्री यही कहते रहे कि ‘अभी कर कटौती करके पैट्रोलियम पदार्थों की कीमतें कम नहीं की जा सकतीं, क्योंकि इससे सरकारी राजस्व में इतनी कमी आ जाएगी कि करंट खाता और बजट खाता घाटा दिखाने लगेगा, और इसके साथ ही खज़ाने के खाली होने से सभी विकास कार्य रुक जाएंगे।’ लेकिन अब जब चुनावी संघर्ष में विजय प्राप्त करने का दबाव बढ़ा और चुनाव आयोग ने भी विधानसभाओं की चुनाव तिथियों की घोषणा कर दी, तो सरकार को पैट्रोलियम उत्पादों की महंगाई संत्रस्त जनता की आहत भावनाओं की सुध लेने का विचार आया। पहले कदम के रूप में केन्द्र सरकार ने अपने एक्साइज कर में डेढ़ रुपए प्रति लीटर की कमी कर दी है और पैट्रोलियम कम्पनियों को भी आदेश दिया कि वह भी अपनी कीमत में एक रुपये प्रति लीटर की कमी करें। इस प्रकार कुल केन्द्रीय कटौती अढ़ाई रुपए प्रति लीटर हो गई। राज्य सरकारों को आदेश दिया गया कि वे भी अपनी वैट और स्थानीय करों में इतनी ही कटौती करें, जिससे पैट्रोल-डीज़ल की कीमतों से पांच रुपए की कमी आ जाए। भाजपा शासित 13 राज्यों ने तो अनुसरण करते हुए अपने वैट और कर घटा दिये। लेकिन जिन राज्यों ने इस आदेश को अपने खज़ाने पर असहन बोझ बताया, उनमें सबसे प्रमुख पंजाब है। असल में चुनावी जनप्रियता बटोरने के लिए केन्द्रीय अथवा राज्य सरकारों द्वारा की जाने वाली कटौती एक अधूरा उपहार है, चाहे इसे एक बार किया जाये या बार-बार। जब तक वाजिब कीमतों पर कच्चे तेल की पर्याप्त आपूर्ति अंतर्राष्ट्रीय स्रोतों से भारत को उपलब्ध नहीं होती, तब तक भारत की आम जनता के लिए पैट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर नियंत्रण नहीं हो सकेगा। अभी देखिये, सरकारों ने कर-कटौती की, लेकिन इसके बावजूद प्रतिदिन होने वाली पैट्रोल और डीज़ल की कीमतों में वृद्धि रुकी नहीं। इसने इसके बाद तत्काल जारी रह कर इसे निरस्त करना शुरू कर दिया। इसके साथ आम जनता की मांग यह भी है कि अगर कर-कटौती की राहत देनी ही थी, तो यह एल.पी.जी. गैस सिलैंडरों, और सी.एन.एन. कीमतों में क्यों नहीं दी गई। यह अधूरी राहत उनके सरकार के प्रति रोष को कैसे समाप्त कर सकती है? फिर यह कैसी राहत है, जिसमें एक तरफ कर-कटौती है, और दूसरी ओर इन पैट्रोलियम उत्पादों की कीमतें निरन्तर बढ़ती जा रही हैं। पैट्रोलियम उत्पादों पर लगाये जा रहे केन्द्रीय अथवा राज्य कर जनहित नहीं मुनाफाखोरी की भावना से चालित हैं। नहीं तो बताइए, जब मोदी शासन के पहले दो बरसों में कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गिर रही थीं, तो सरकारों ने नौ बार अपने एक्साइज और अतिरिक्त करों को क्यों बढ़ाया? तब यह धारणा दी जा रही थी कि घटती आयात लागत कीमतों को सरकार का बढ़ा एक राजस्व बफर पैदा कर रही है। फिर जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल कीमतें बढ़ने लगेंगी, तो सरकार अपने करों से राहत देकर लोगों का बोझ कम करेगी, लेकिन अब जब कीमतें बढ़ने लगीं तो केन्द्र और राज्य सरकारों को अपने चालू खाते के घाटे और विकास व्यय पर खर्च होने वाली रकम की चिंता हो गई। उन्होंने कर घटाने से इन्कार कर दिया। अब चुनावी अपेक्षा की वजह से कर-कटौती की भी तो आंशिक और आधी-अधूरी, जिसने किसी को संतुष्ट नहीं किया असल में प्रशासनिक ईमानदारी का तकाजा यह है कि भारत सरकार पैट्रोलियम कीमतों को जी.एस.टी. या ‘एक देश एक कर’ के नियम के अधीन ले आये। लेकिन इस फैसले से अपनी मुनाफाखोरी को कम होते देख कर न तो केन्द्रीय सरकार यह फैसला करने के लिए तैयार है और न ही राज्य सरकारें उसे इसकी इजाज़त दे रही हैं। अब एक ही रास्ता रह जाता है कि भारत पैट्रोलियम उत्पादों का स्वदेशी निष्कासन बढ़ा, आयात में निर्भरता घटाये, लेकिन यह लक्ष्य अभी दूर की कौड़ी लगता है।