चुनावों को लेकर मतदाता अपनी पार्टी के प्रति भी उत्साहित नहीं


पटियाला, 15 फरवरी (अ.स.): लोकसभा चुनावों को लेकर चाहे चुनावी बिगुल बज चुका है परंतु वर्तमान समय में पंजाब में राजनीतिक दलों की कारगुजारी व हुई उथल-पुथल के बाद पैदा हुए राजनीतिक परिस्थितियों के बाद आम मतदाता तो दूर की बात, पार्टियों के पक्के मतदाता भी चुनावों को लेकर अपनी पार्टियों के प्रति भी उत्साहित नज़र नहीं आ रहे। पजाब में सत्ता में बैठी कांग्रेस पार्टी की कारगुजारी के कारण उसके अपने कार्यकर्त्ता भी अंदरखाते निराश हैं, वहीं शिरोमणि अकाली दल व ‘आप’ जैसी पार्टियों के आंतरिक गतिरोध ने कार्यकर्त्ताओं को परेशान कर दिया है। इसके अलावा  अभी तक बदलाव की राजनीति में भी कोई सक्रियता नज़र नहीं आ रही।  इस समय सत्ता में होने व दूसरी पार्टियाें में पैदा हुई तोड़फोड़ व अविश्सनीयता के कारण कांग्रेस का हाथ फिलहाल चाहे ऊपर लग रहा है परंतु सत्ता सम्भालने के बाद पार्टी द्वारा नौकरियां देने, नशे का खात्मा, नौजवानों को स्मार्ट फोन व किसानों के सभी कज़र् माफ करने जैसे किए वादों से बेमुख होने के कारण जहां इससे मतदाता नाराज़ हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी में पार्टी कार्यकर्त्ताओं की बुक्कत न पड़ने के कारण कांग्रेसी मतदाता अपनी पार्टी के प्रति भी उत्साहहीन नज़र आ रहा है। इसके अलावा शिरोमणि अकाली दल (ब) पार्टी में बेअदबी मामलों व धार्मिक घटनाओं व बहिबल कलां कांड के बाद पैदा हुआ लोगों का रोष, टकसाली नेताओं की नाराज़गी व उनके मुताबिक पार्टी अध्यक्ष के अड़ियल रवैये की बदौलत अकाली दल अपने ही कार्यकर्त्ताओं की नाराज़गी दूर नहीं कर सका। इन परिस्थितियों के कारण पार्टी के पक्के मतदाता भी उत्साहहीन हैं। इसके साथ ही भाजपा कार्यकर्त्ता भी पार्टी की लटकती स्थिति के कारण चुनावों में बेरुखी दिखाते हुए नज़र आ रहे हैं। दूसरी ओर साफ व सुहृदय राजनीति की तलाश के गर्भ में से पैदा हुई आम आदमी पार्टी के उलट निकले स्वभाव व विखंडन ने उसके कार्यकर्त्ताओं का विश्वास चूर-चूर कर दिया था, जिस कारण ‘आप’ का कार्यकर्त्ता निराशा के आलम में भीतर ही भीतर पछता रहा है। इसी पार्टी में से निकले सुखपाल सिंह खैहरा जिन्होंने पंजाब एकता मंच पार्टी बनाई है। इसके अलावा लोक इन्साफ पार्टी वाले बैंस बंधुओं, डा. धर्मवीर गांधी का पंजाब मंच, टकसाली अकाली दल ये सब अभी ग्रुपों से मजबूत पार्टियां बनने की जद्दोजहद में हैं। उपरोक्त पैदा हुए हालातों में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि नोटा का पलड़ा लोकसभा चुनावों में भारी हो सकता है।