अपने लोग 

अपने लोगों की अपनी अलग-अलग समस्याएं हैं। अक्सर हमें अपने लोगों की ज़रूरत पड़ती रहती है। हमें अपने लोगों की खास तलाश रहती है। ऐसे लोग बेहया की तरह बढ़ते रहते हैं। यही लोग फलते-फूलते हैं। बिल्कुल बेहया की तरह। बेहाया हैं तो फूलेंगें ही। बेहया की तरह। मैं सोचता हूँ, जाति पर गर्व करने जैसा कुछ नहीं हैं। जाति पर गर्व का मतलब है, अपनी कुंठा का वमन। ये उल्टी ही तो है। हम श्रेष्ठ आप खराब। संकुचित मानसिकता। गर्व करना है तो मानव होने पर करो, दया पर करोए करूणा पर करो। रहमदिल बनो। अब भला ये क्या बात हुई कि बात-बात पर तलवार निकाल लो। जाति-गौरव और शान में कि तुम्हारी तरह का कोई और नहीं है। तुम ही श्रेष्ठ हो। बात-बात में अपनी शान में कसीदे पढ़ते रहते हो। तो आईए आते हैं अपने लोग और अपनों की बात पर। जब भी हम कोई खास काम को लेकर इनके पास जाते हैं। इनकी शक्ल बेहया के डंड़े की तरह हो जाती है। ऐसे लोग अपना भेद लोगों पर नहीं खुलने देते। ये लोग जो होते हैं, वो दिखते नहीं। जो दिखते हैं वो होते नहीं। अपने लोगों को ढ़ूंढ़ना भूसे के ढेर में सुई को ढूंढ़ने के समान है। 
हम हमेशा सोचते हैं कि जब भी हमें हमारा कोई खास काम हो। हमें कोई अपना आदमी मिल जाए और काम आसानी से हो जाए। कोई तो ऐसा हो जिसको हम अपना मानते हों। अपना आदमी ऐसा हो जो हींग की तरह हो। और हमारे सादे जीवण में स्वाद लेकर आए। हमारा जीवण स्वाद से भर दे। अव्वल तो जहां तक हमारी नज़र जाती है। कोई भी लोग अपने लोग जैसे दिखाई ही नहीं देते। फिर भी आर्यभट्ट कि तरह हम अपने लोगों को खोजने में आजीवन लगे रहते हैं, लेकिन जिस तरह आर्यभट्ट को बहुत खोजने के बाद शून्य हाथ लगा था। कुछ उसी तरह तमाम तरह के प्रयास करने के बाद भी हमें अपने लोगों को खोजने में समय लगता है। जिस काम को हमें उनसे करवाना होता है और जिसके लिए हम गए होते हैं। उनके पास जाते हैं तो लेकिन परिणाम शून्य ही हासिल होता है। कारण कि जो हमारे अपने लोग होते हैं। उन्हें हम अपनी जाति-बिरादरी में खोजते हैं लेकिन जिस पर हम फक्र करते हैं वो हमारी फिक्र भी नहीं करते। जिसको हम तोप मान रहे होते हैं। दरअसल वो चाईनिज पटाखा होते हैं। जिसके होने से हमें फक्र होता था। या आम तौर पर अपनी जाति के लोग जिस पर हम गर्वान्वित महसूस करते हैं। वो अपने मतलब का नहीं है। जाति हित की बात कहने पर वो हमें सड़े टमाटर की तरह देखता है। 
हमें ऐसा लगता है कि उसके पास जाते ही हमारा काम यूं ही चुटकी बजाते हो जाएगा, लेकिन होता उल्टा ही है। वो हमारी समस्या सुनकर वैसे ही दुरूखी होता है।  जैसे वो और लोगों की समस्या सुनकर होता होगा, लेकिन पहले दिन से लेकर आखिरी दिन तक समस्या के निदान में उसकी कोई रूचि नहीं होती। अलबत्ता वो टालता रहता है। यही नहीं अगर वो हमारे रिश्तेदारी में हो। और हम उससे ज़रूरत से ज्यादा अपेक्षा पालकर उसके पास अपना काम लेकर गए हों। तब पता चलता है कि हमारा काम हुआ ही नहीं। अलबत्ता रिश्तेदारों में सबको पता चल जाता है कि हम फलाने काम से हम चिलाने साहब के पास गए थे। हालत ये हो जाती है कि जूठन भी खाया हमने और पेट भी ना भरा हमारा। फिर हम मुंह फूला लेते हैं कि हमारे जानने वाले खास लोग हमारे काम के नहीं। तो भाईयों ऐसा किसी एक आदमी के साथ नहीं। मानव जाति के संपूर्ण इतिहास को उठाकर देख लीजिए। आपको कोई भी ऐसा आदमी न मिलेगा जो आपका अपना हो। जातियों को लेकर दुराग्रह ना पालें। कोई भी जाति दूध की धुली हुई नहीं है। और ये दुराग्रह किसी भी जाति को पालने की ज़रूरत नहीं है कि उसकी जाति के लोग ठीक हैं। या उनके यहां हालत बहुत अच्छी है। 
हमाम में सब नंगें हैं। और यही खास आदमी बाहर में अपनी जाति का बखान करता मिलेगा कि जाति के लिए उसने ये किया वो किया था।  यही आदमी बाहर में रोता है कि हमारी जो हालत है वो हमारी जातियों के लोगों के सोए रहने के कारण बनी हुई है। नहीं तो हमारी जाति आज टॉप पर रहती लेकिन अगर उससे पूछ लिया जाए कि आपने अपनी जाति के लिए क्या किया है तो श्रीमान बगलें झांकने लगेंगें। कारण कि जो लोग जाति के लिए कुछ नहीं करते। जो लोग चंदे की रसीद थामें जाति सम्मेलन करते-करवाते नज़र आते हैं। वही सब खा जाते हैं। इनका काम खाना होता है। ये जाति के नाम पर खाते हैं। 
असल में वे लोग जाति सम्मेलन के बहाने अपना उल्लू सीधा करते हैं। इनको केवल जाति से मलाई खानी रहती है। इनसे पूछिए कि जाति के किस भाई-बहन के यहां शादी-ब्याह, पढ़ाई-लिखाई में मदद की है। किसकी-किसकी मरनी-जीनी में योगदान दिया है। ये टांय-टांय फिस्स दिखेंगें। तब क्या फायदा हमारी जाति के होने का। जब वो हमारे काम ही नहीं आ सकते।

-बोकारो झारखंड, पिन-829144 

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