शरारती विक्की
हमारे विद्यालय के विद्यार्थी दो दिनों के टूर पर सोलन आए थे। सोलन से कुछ दूरी पर एक विश्वविद्यालय था। वहां फूल पौधों के बारे में पढ़ाई होती थी। अध्यापक भी हमारे साथ आए थे। पहाड़ों में घूमने फिरने की सब के मन में चाहत थी। बस से उतरते ही हमारी हाज़िरी लगाई गई। फिर हमें एक हाल में इकट्ठा कर लिया गया। पहाड़ों में घूमते समय हमें कुछ सावधानियों के बारे में परिचित कराया गया। अध्यापक राजन ने बातचीत का प्रारंभ किया, ‘यहां जंगली जानवरों से बहुत सावधान रहना होगा। बंदर तो यहां आम हैं। विश्वविद्यालय में फलदार पेड़ों, फूलों, सब्ज़ियों की बहुतायत है। सब कापी पेन्सिल साथ लिजिये। पौधे का नाम, फल का नाम, विज्ञानक नाम, उनका मूल, सब लिखना होगा। जानकारियों की एक नयी खिड़की खुलेगी।’
‘हमें दिखलाएंगे सर?’ एक बच्चा बोला।
‘हम यहां आए किस लिये हैं?’ अध्यापक ने कहा।
‘दवाईयों वाले पौधे भी हैं यहां जैसे अदरक, हल्दी, अश्वगंधा, रसौंत, तुलसी, हरड़, बहेड़ा, आमला, जूफा, मुलठी इत्यादि।’ अध्यापक एक ही सांस में बोल गया।
‘मेरी दादी कब्ज़ होने पर मुझे हरड़ पीस कर देती है।’ गीतू बोला।
‘बिल्कुल ठीक कहा तूने, ये दवाएं रोगों के लिये राम बाण होती हैं। अध्यापक ने गीतू की बात का समर्थन किया।
‘पेट दर्द हो तो अजवायन, बदहजमी में पुदीना, जुकाम के लिये तुलसी के पत्तों की चाय, ज़ख्म को नीम के पत्ते, आंख दर्द करे तो रसौंत...।’ अध्यापक कई घरेलू नुस्खे बता गया।
‘अतिरिक्त जब पौधे देखेंगे, बता देना।’ गीतू ने कहा।
‘तुम ठीक कहते हो।’ अध्यापक बोला।
राजन सर ने कुछ सावधानियों का भी ज़िक्र किया,
‘बच्चो बंदर इतने पुर्तीले होते हैं कि पूरा दिन पेड़ों में छुप कर चैरी और कीवी के खेतों की तरफ देखते रहते हैं कि मालक कहां पर कांटेदार रुकावटें लगाते हैं? ताकि रात को खेतों को आसानी से उजाड़ सकें। बन्दर सब देख लेते हैं।’
‘सर कीवी कैसा होता है?’ एक बच्चे ने पूछा।
‘अंडे से थोड़ा बड़ा, हलके भूरे रंग का होता है। इसके ऊपर लुईं सी होती है।’ अध्यापक ने समझाया। अध्यापक ने अपनी बात को जारी रखा,
‘रात को बंदर टोलियां बना कर कीवी और चैरी के खेतों पर हल्ला बोलते हैं। रुकावटें उखाड़ फेंकते हैं। पेट भर के फल खाते हैं। खेत को बर्बाद करते हैं।’
‘सर बंदर शरारतों में क्यों लगाता है?’ बारहवीं के एक विद्यार्थी ने कहा।
‘शरारतें तो आप भी कम नहीं करते।’ अध्यापक ने उस तरफ देखा।
‘वो कैसे सर?’ गीतू ने पूछा।
‘छुट्टी के खातिर तंदुरुस्त मां-बाप को झूठ में रोगी बना देते हो।’ अध्यापक ने मिसाल दी। अध्यापक बोला, ‘एक और बात याद रखना, बंदर को कभी पत्थर मत मारना। तुम्हें उनकी आवाज़ें बहुत सुनाई देंगी। किसी ने उसकी नकल नहीं उतारनी। बंदरों की आवाज़ें नहीं निकालनी।’ राजन सर ने सख्त शब्दों में कहा।
‘आवाज़ें निकालने से क्या होता है?’ एक बच्चे ने पूछा।
‘खेतों के मालक पास की झाड़ियों में ईंट, पत्थर लेकर छुपे होते हैं। जब उन्हें लगता है कि बंदर उनके खेत में आ गये हैं, वो पत्थरों की बारिश कर देते हैं। बंदर ज़ख्मी होकर भाग जाते हैं।’ अध्यापक ने बच्चों को सतर्क किया।
‘कोई घास, पौधे को तोड़ कर मूंह में नहीं डालना।’ राजन सर ने एक और हिदायत की।
‘इससे क्या नुकसान होगा?’ एक बच्चे ने पूछ लिया।
‘यहां जंगली बेल बिच्छू बूटी होती है। यहां लोग इसे गाचनी बोलते हैं। इस पर लगने वाली फलियों पर बाल जैसे कांटे होते है। शरीर से चिपक जायें बहुत दर्द करते हैं।’ अध्यापक से यह सुनकर सारे भयभीत हो गए।
दो टोलियों में हम अधयापकों के साथ विश्वविद्यालय के भीतर फलों, फूलों और सब्ज़ियों के खेत देखने चल पड़े। छोटे-छोटे पौधों पर बीस बीस शिमला मिर्चें लगी थी। टमाटर की बेल पांच फुट तक ऊपर चढ़ी हुई थी। खीरे इतने स्वाद, छोड़ने को मन न करे। छल्लियां मिठास भरी। वृक्षों की जड़ों में उन्हें रोपने वाले का नाम और तारीख भी लिखी हुई थी। पेडों पर लटकते बादाम, अखरोट, आलूबुख़ारे, बगूगोशे माली ने तोड़ कर हमें खाने को दिये। आम के छोटे वृक्ष पर सैंकड़ों आम लगे हुए थे। औषधीय पौधे देख कर हमें भरपूर ज्ञान मिला। पौधों के स्थानीय और विज्ञानक नाम हम ने कापी पर नोट कर लिये थे।
फूलों पर उतरी औंस की बूंदों में किरणों के दिये जल रहे थे। वृक्षों के पिछवाड़े में बनीं सतरंगी के रंग हवा में तैर रहे थे। घूमते घूमते हम थक गये थे। वृक्षों से जोंक जैसे कीट पृथ्वी पर गिर रहे थे।
अध्यापकों से आंख बचा कर लड़कों की एक टोली पहाड़ के समांतर सड़क पर निकल गई थी। हरियाली मन को शांती दे रही थी। बादल हमारे सिरों को हाथ लगा कर उड़ जाते। अध्यापकों की बतलाई बातें हमें याद थीं। सूर्य डूबने को था। टोली में शरारती विक्की भी था। उसको अध्यापकों, भिखारियों, सब्ज़ी बेचने वालों की नकल लगाने की आदत थी। हम थोड़ा आगे गये तो बंदरों की आवाज़ें आने लगी। विक्की ने पहले धीरे फिर ज़ोर-ज़ोर से बंदरों से मिलती आवाज़ें निकाली। फिर क्या था। पत्थर वरसने लगे। किसी के मूंह पर, किसी की टांग पर, किसी के सर पर चोटें आईं। एक नोकीला पत्थर विक्की के माथे को लहूलुहान कर गया था। विक्की को डाक्टर के पास ले जाया गया। पट्टी करने के बाद डाक्टर ने दवा दे दी थी। उसे विश्राम करने की हिदायत की गई। जब अध्यापकों को इसके पता चला तो वह क्लिनिक की तरफ भागे। विक्की के माथे पर हाथ रखते राजन सर बोले, ‘ये कैसे हो गया?’
‘मैंने बन्दरों की आवाज की नकल लगाई थी।’ विक्की ने बताया।
‘और सिर फटवा कर यहां पहुंच गया।’ अध्यापक ने बात पूरी की।
‘सौरी सर।’ विक्की ने कहा।
‘पर मैंने तुझे रोका था।’ राजन सर ने चीखते हुए कहा।
‘शरारती सजा भुगतने से सीखते हैं।’ दूसरा अध्यापक बोला।
‘तुम्हारे घर फोन कर दें?’ राजन सर ने पूछा।
‘मेरे पिता गुस्से वाले हैं सर! फोन सुनते ही टैक्सी पकड़ कर आ जायेंगे। मुझे डांटेंगे फिटकारेंगे और साथ ले जाएंगे।’ विक्की ने राजन सर को फोन न करने का निवेदन किया।
‘तू हमारी बात मानता नहीं तो घर बताना ज़रूरी हो जाता है।’ राजन सर ने कहा।
‘बस एक मौका दे दो सर।’ विक्की रोने लगा।
‘सुनो तुम कल सारा दिन हमारे साथ रहोगे। तुम्हारी कोई टोली नहीं। अब चलो और हल्दी डाल कर दूघ पीओ और आज आराम करो।’ राजन सर ने सख्त शब्दों में कहा।
‘जैसे आप कहोगे मैं वैसे करूंगा।’ विक्की ने कहा। डाक्टर को मिल कर दोनों अध्यापक दवा के बारे में बातचीत के बाद विक्की को रैसट हाऊस ले आये। जहां हम रुके हुये थे। बाकी लड़के उसके साथ आ गये थे। अपनी अपनी चोट का दर्द अन्दर ही अन्दर पी गये थे।
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