मांद बनाकर रहने वाला मोलस्क गेपर
गेपर द्विआवरणधारी समुद्री मोलस्क है। सामान्यतया द्विआवरणधारी मोलस्क अपने दोनों आवरणों के भीतर इस प्रकार रहता है कि अपने आवरणों को जब चाहे कसकर बंद कर सकता है और जब चाहे भोजन आदि के समय खोल सकता है, किन्तु गेपर एक ऐसा द्विआवरणधारी मोलस्क है जो अपने आवरण बंद नहीं कर सकता। गेपर ग्रेट ब्रिटेन तथा उत्तर अमरीका के सागर तटों पर पाया जाता है। प्रशांत महासागर के तटों पर अलास्का से लेकर सेंड डियागो तक इसकी संख्या बहुत अधिक है। उत्तर अमरीका के सागर तटों पर पाया जाने वाला गेपर ग्रेट ब्रिटेन के सागर तटों पर पाए जाने वाला गेपर से कुछ छोटा होता है। गेपर की अनेक जातियां तथा उपजातियां हैं। इनमें रेत का गेपर, ब्लंट गेपर तथा छोटा गेपर प्रमुख हैं। सभी जातियां एवं उपजातियों के गेपरों की शारीरिक संरचना, आदतों एवं व्यवहारों आदि में थोड़ा-बहुत अंतर होता है।
गेपर सागर तटों पर अथवा उथले पानी में रहना अधिक पसंद करते हैं। कुछ गेपर 45 मीटर तक की गहराई में भी पाए जाते हैं। इससे अधिक गहरे सागरों में ये कभी नहीं जाते। गेपर मांद बनाने वाला मोलस्क हैं। इसके शरीर में नीचे सिरे पर एक छोटा सा पैर होता है। इसी की सहायता से यह धीरे-धीरे रेत निकालता है और लंबवत् मांद तैयार करता है। गेपर की मांद 20 सेंटीमीटर से लेकर 30 सेंटीमीटर तक गहरी होती है। गेपर अपनी मांद में हैं या नहीं? इस बात का पता बड़ी सरलता से चल जाता है। गेपर हमेशा अपनी मांद के भीतर साइफन की सहायता से, नियमित रूप से निश्चित अंतराल के बाद पानी की ऊंचीधार छोड़ता रहता है। उत्तर अमरीका का गेपर तो 50 सेंटीमीटर से लेकर 90 सेंटीमीटर तक ऊंची जलधारा छोड़ता हैं। इसके पास जाने पर अथवा इसे परेशान करने पर यह और अधिक तेज धार छोड़ने लगता है।
गेपर की शारीरिक संरचना बड़ी जटिल होती हैं। इसे दूर से देखने पर ऐसा लगता है, मानो बिना आंख, कान, मुंह का कछुआ अपने हाथ पैर भीतर किये हुए पड़ा हो, किन्तु सामान्य मोलस्कों की तरह गेपर के शरीर के भी तीन प्रमुख भाग होते हैं बाहर का आवरण, कोमल शरीर और मेन्टल। गेपर के आवरण की लंबाई 12 सेंटीमीटर से लेकर 20 सेंटीमीटर तक होती है। कभी-कभी इससे बड़े गेपर भी देखने को मिल जाते हैं। गेपर के आवरण का रंग मटमैला पीला, हल्का कत्थई अथवा ग्रे होता है। इसका आवरण अन्य मोलस्कों के समान मोटा और मजबूत नहीं होता। ब्लंड गेपर का आवरण तो सर्वाधिक पतला और कमजोर होता है।
गेपर का प्रमुख भोजन प्लैकटन में पाए जाने वाले मृत जीवों एवं पौधों के अति सूक्ष्म कण है। इसकी भोजन संबंधी जानकारी इसके साइफन से निकलने वाली जलधारा से मिलती हैं। गेपर अपने भीतर खींचता है। यहां से यह पानी इसके गलफड़ों में पहुंचता है। गलफड़े पानी में घुली ऑक्सीजन तथा खाने योग्य कण ले लेते हैं। कणों को बाहर जाने वाले पानी में छोड़ देते हैं। अंत में साइफन के द्वारा ही अखाद्य कणों से युक्त पानी शरीर के बाहर निकाल दिया जाता है। इस पानी में गेपर का मल भी रहता है। गेपर की मांद से बाहर निकलने वाली धाराएं इसी पानी की होती हैं।
गेपर का प्रजनन बड़ा सामान्य होता है। इसमें नर और मादा अलग-अलग होते हैं तथा दोनों के प्रजनन अंग साइफन से जुड़े रहते हैं। प्रजनन काल में नर गेपर साइफन में अपने शुक्राणु छोड़ देता है और मादा अपने अंडे छोड़ देती है। इसके अंडे और शुक्राणु साइफन द्वारा बाहर की तरफ छोड़ी जाने वाली पानी की धार के साथ शरीर के बाहर आ जाते हैं और स्वतंत्रा रूप से सागर में पहुंच जाते हैं। यहीं पर अंडों से शुक्राणु मिलते हैं, जिससे उनका निषेचन हो जाता है। कुछ समय बाद निषेचित अंडे से लारवा निकलता हैं। यह तेजी से अपना विकास करता है और शीघ्र ही एक बहुत छोटे से गेपर में बदल जाता है। नवजात गेपर की लंबाई 2 मिलीमीटर से 3 मिलीमीटर के मध्य होती है तथा यह रंगरूप में वयस्क गेपर से काफी भिन्न होता है।
गेपर के अनेक शत्रु हैं। इनमें मांसाहारी समुद्री घोंघे प्रमुख हैं। सामान्यतया अलग-अलग स्थानों पर पाए जाने वाली गेपर के अलग-अलग शत्रु होते हैं, किन्तु मांसाहरी घोंघे सभी स्थानों पर इसका शिकार करते हैं। व्हेल्क घोंघे का यह सर्वाधिक प्रिय भोजन हैं। व्हेल्क घोंघा अपनी रेतीदार जीभ (रेडूला) से इसके आवरण में छेद कर देता है और इसके भीतर का कोमल मांस खा जाता है। मजबूत जबड़ों वाली अनेक मछलियां भी गेपर का शिकार करती हैं। ये अपने मजबूत जबड़ों से इसका आवरण तोड़ डालती हैं और भीतर का शरीर चट कर जाती हैं। उत्तरी भागों में पाए जाने गेपर वालस्य का प्रमुख भोजन हैं। कुछ स्थानों पर भाटे के समय सागर तट पर लोमड़ियां पहुंच जाती हैं। वे इसे खोद कर निकाल लेती हैं और खा जाती है। इन सब से यदि यह बच जाता है तो लगभग 17 वर्ष की आयु तक जीवित रहता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



