चरित्र की परीक्षा

एक गांव में पुरद्र नाम का एक व्यक्ति रहता था। ब्राह्मण होने के साथ बहुत धर्म परायण था। परिवार सुखी सम्पन्न था। कृषि कार्य अच्छी थी। पुरद्र अपने धर्म, पुण्य, दान, चरित्र और सम्पन्नता के कारण अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध था।
एक दिन की बात है। शाम हो गई थी। रात्रि अपनी काली चादर ओढ़ाने लगी थी। दिनभर के थके-मांदे मज़दूर अपने-अपने घरों को लौटने लगे थे। चिड़िया अपने-अपने घाेंसलों की ओर जा रही थी।
पुरद्र के बढ़ते कीर्ति, प्रसिद्धि को देखकर ईर्ष्यावश पाप और वासना ने उसकी परीक्षा लेनी चाही। योजनानुसार पाप ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रुप धारण किया। वासना एक सुंदन युवती बन गयी। हलका अंधेरा होते ही वृद्ध ब्राह्मण ने सुंदर युवती (वासना) के साथ पुरद्र के घर पहुंच कर दरवाजा खटखटाया।
आवाज सुनकर पुरद्र ने दरवाजा खोला। वृद्ध ब्राह्मण को देखकर-‘आप कौन हैं? आपकी मैं क्या सहायता कर सकता हूं?’
वृद्ध ब्राह्मण ने कहा-‘आपका यशोगान सुनकर आपके पास आया हूं। हम एक मुसाफिर हैं। दूर से आ रहा हूं और आज रात ही आगे का गांव पहुंचना है। रास्ता सुनसान है, नदी-नाले हैं। चोर-गुंडों का भय है। ऐसी परिस्थिति में रात के समय मैं अपनी युवा पुत्री को साथ लेकर नहीं जा सकता हूं। आप कृपा कर रात भर अपने घर में अतिथि समझ कर मेरी पुत्री को रख लीजिए। उधर से लौटकर अपनी अमानत ले जाऊंगा।’
पुरद्र कुछ सोचने लगा। तभी वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, ‘आप क्या सोच रहे हैं। आप जैसे धर्मशील व्यक्ति के चरित्र पर तनिक भी संदेह करने की गुंजाइश ही नहीं है। मेरी दुर्बल अवस्था को देखिए! रात्रि में अपनी जवान पुत्री को लेकर कैसे जा सकता हूं।’
पुरद्र ने धर्म की मर्यादा का ख्याल करके युवती को अपने घर में रख लिया। सोचा धर्म की मर्यादा, अतिथि सेवा भी हो जाएगा।
पाप अपनी कुटिल योजना की पहली सफलता से बहुत प्रसन्न था। वासनारुपी सुंदरी का घर में पैर रखते ही अपना मायाजाल फैलाने लगी। नाना श्रृंगार बनाकर, हास्यमुख से, मीठी बोल से, रुप यौवन दिखा-दिखाकर पुरद्र पर मायाजाल फेंकने लगी। अपने प्रयास में सफल भी होने लगी। संगत का ऐसा ही प्रभाव होता है। पुरद्र का मन मायाजाल के आवरण से थोड़ा भटकने लगा तभी उसके मन में धर्म रक्षा का भाव आ गया।
वृद्ध ब्राह्मण नहीं लौटा। यह तो पाप की कुटिल योजना थी। युवती के रहते हुए कई दिन बीत गये। वासना की मायाजाल से पुरद्र को धीरे-धीरे आलस्य और प्रमोद उसे अपनी गिरफ्त में लेने लगा। सोयी वासना और कुसंस्कार जागने लगा। तभी एक रात पुरद्र को स्वप्न आया। एक ज्योर्तिमय देवी घर से बाहर निकल रही थी। 
पुरद्र ने पूछा-‘कौन हो देवी? घर से बाहर क्यों जा रही हो?’
देवी ने कहा-‘तुम धर्म से हटने लगे हो। मैं सौभाग्य लक्ष्मी हूं। इस घर में अब मैं नहीं रह सकती हूं। इसलिए जा रही हूं।’
उधर कुटिल कन्या वासना का प्रेमजाल बढ़ता जा रहा था। दूसरी रात पुरद्र को पुन: स्वप्न आया। एक दिव्य देवी घर से बाहर जा रही थी। पुरद्र के पूछने पर जवाब दिया-तुम वासना रुपी युवती के चक्कर में पड़ गया है। मैं यशलक्ष्मी हूं। इस कारण यहां से जा रही हूं।
तीसरी रात फिर स्वप्न देखा, एक देवी प्रकट होकर कहने लगी-‘पुरद्र तुम वासना के जाल में फंसता जा रहा है। नीचे गिरता जा रहा है। मैं कुलदेवी हूं। ऐसे में मैं इस घर में नहीं रह सकती हूं। इसलिए जा रही हूं’ और वह इतना कहकर चली गई।
कुछ दिन और बीत गया। वासना अपनी निकटता पुरद्र से बनाने लगी। तभी पुरद्र ने एक रात फिर स्वप्न देखा-‘एक दिव्य पुरुष घर से निकल रहा था। इन्हें निकलता देखकर पुरद्र ने उनका पैर कसकर पकड़ लिया। पूछा-‘आप कौन हैं? और क्यों घर से जा रहे हैं? मैं आपको कदापि जाने नहीं दूंगा। तीन देवियां चली गयीं। लेकिन आपको जाने नहीं दूंगा।’ दिव्य पुरुष ने कहा, ‘देखो, मैं धर्म हूं। तुम्हारे घर से सौभाग्य, यश और कुल तीनों देवियां चली गयीं। मैं अकेला इस घर में नहीं सकता हूं। इस कारण मैं भी जा रहा हूं।’
इतना सुनकर पुरद्र हृदय से रो पड़ा। आंखों से अश्रुधरा बह चली। धर्म का पैर कसकर पकड़े रहा और बोला, ‘भगवन्, मैंने जो कुछ किया है, धर्म की मर्यादा का ख्याल रखकर ही किया। आपके कारण ही उस कन्या को अपने घर में शरण दिया। मैंने अतिथि धर्म की रक्षा किया है। मुझे क्षमा कर दें और मेरे घर में ही रहें। वासना से मेरा कोई संबंध नहीं है। मैंने धर्म की रक्षा किया है। इसलिए आप मेरी रक्षा कीजिए।’
‘धर्मों रक्षति रक्षित:’
देवपुरुष धर्म राज को पुरद्र की सच्चाई, भक्तिभाव, सात्विकता, पवित्रता और श्रद्धा पर पूर्ण विश्वास था। धर्मराज ने अपने प्रिय शिष्य की सहायता करना ही उचित समझा। उसने पुरद्र के मन पर छाये माया के हलके आवरण को हटा दिया। धर्म बाहर नहीं गये। पुन: पुरद्र के शरीर में अन्तर्लीन हो गये। धर्म के शरीर में प्रवेश करते ही पुरद्र पुन: सूर्य की तरह प्रकाशमान हो गया। कायाकल्प हो गया।
धीरे-धीरे सौभाग्य, यश और कुल देवियां भी घर में आ गयी। कहा जाता है कि जहां धर्म होता है वहीं सौभाग्य, यश और कुल देवियां वास करती हैं। जहां धर्म है वहां जय है। (सुमन सागर)

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