विनाश के मंज़र

इस समय विश्व के ज्यादातर क्षेत्रों में भीषण युद्ध और संघर्ष चल रहे हैं। अमरीका एक शक्तिशाली देश है। वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी ताकत विश्व भर में दिखाते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने वेनेजुएला पर हमला करके और वहां के राष्ट्रपति को गिरफ्तार करके ज्यादातर देशों में बेचैनी और चिंता पैदा कर दी है। इसकी अनेक तरह की तीव्र प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, जिनके कारण जहां डोनाल्ड ट्रम्प और भी विवादग्रस्त राष्ट्रपति बने हैं, वहीं इससे अमरीकी की छवि भी धूमिल हुई है। अब ईरान में भी बेहद गड़बड़ और बेचैनी पैदा हो गई है। वहां के अधिकतर लोग 45 वर्ष से भी अधिक समय से स्थापित किए गए इस्लामिक शासन से बुरी तरह ऊब चुके हैं और उन्होंने गलियों-बाज़ारों में उतर कर ईरानी शासकों के विरुद्ध एक तरह से ब़गावत ही कर दी है, जिसमें हज़ारों ही लोगों की मौत हो चुकी है और भारी संख्या में आन्दोलनकारियों को जेलों में भी नज़रबंद कर दिया गया है।
ईरान के शासकों ने यह स्पष्ट कर दिया है, कि वे लोगों के विद्रोह को सख्ती से दबा देंगे। इसके लिए उन्हें चाहे कितनी भी क्रूरता दिखानी पड़े। ईरान की आर्थिकता बुरी तरह प्रभावित हुई है। महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी है। इस्लामिक शरीअत के कड़े कानून होने के कारण, विशेष रूप से महिलाओं में बड़ी बेचैनी पाई जाती रही है। उन्होंने चिरकाल से वहां की व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह का ध्वज उठा रखा है। प्रशासन की सख्ती के कारण उन्हें बेहद मुश्किलों, परेशानियों और प्रतिबंधों से गुज़रना पड़ रहा है। ऐसे हालात में एक बार फिर ट्रम्प ने ईरानी प्रशासन को धमकियां देना शुरू कर दी हैं कि यदि उसने अपने लोगों पर अत्याचार जारी रखे तो अमरीका इस संबंध में कड़े कदम उठाएगा। इस कारण वहां और भी भय का माहौल पैदा हो गया है। ऐसे हालात भी पैदा हो रहे हैं कि इस क्षेत्र में एक और बड़ा युद्ध छिड़ सकता है। भारत ईरान का सहयोगी देश रहा है। इसके द्वारा भारत ने अ़फगानिस्तान के साथ अपने व्यापारिक संबंध और बढ़ाने की योजनाबंदी भी की है। इस समय भारत अपनी विदेश नीति संबंधी एक तरह से तलवार की धार पर दिखाई दे रहा है। इसी तरह रूस की ओर से लगभग 4 वर्षों से यूक्रेन पर किए जा रहे हमलों से हुए विनाश ने भी दुनिया भर में एक ऐसा संदेश दिया है, जिससे सभी देशों को अपनी नीतियां नये क्रम से बनाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस युद्ध को खत्म करवाने के लिए पहले अनेक दावे किए थे। इस संबंध में उन्होंने अब तक बहुत यत्न भी किए हैं परन्तु अभी तक इस मामले में उन्हें कोई सफलता मिलती दिखाई नहीं दी, न ही डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा इस युद्ध को खत्म करने के सुझावों पर दोनों देश सहमत हुए हैं। इसलिए अभी तक इस क्षेत्र में विनाश के मंज़र ही दिखाई देते हैं। ऐसी ही स्थिति इज़रायल-गाज़ा पट्टी में बनी हुई दिखाई दे रही है।
गाज़ा में शासन कर रहे आतंकवादी संगठन हमास द्वारा 7 अक्तूबर, 2023 को इज़रायल पर हमला करके उसके लगभग 1200 नागरिकों की हत्या करने और बहुत-से वहां ठहरे विदेशियों को बंधक बनाने के बाद इज़रायल की ओर से गाज़ा पट्टी पर किए गए भीषण हमलों में 50 हज़ार से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं और लाखों ही लोग वहां मचे हड़कम्प के कारण घर से बेघर होकर बहुत दयनीय हालत में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्य-काल के दौरान भी इज़रायल की बड़ी सहायता की थी। दूसरी ओर पिछले कई दशकों से इज़रायल के विरुद्ध ईरान की सहायता से हमास और अन्य गुरिल्ला संगठनन भिन्न-भिन्न देशों से हथियार इकट्ठे करके इज़रायल पर हमले करते आ रहे हैं, जिससे यह क्षेत्र भारी विनाश के कगार पर खड़ा दिखाई दे रहा है। इस क्षेत्र संबंधी डोनाल्ड ट्रम्प ने अब तक ऐसे कई सुझाव दिए हैं, जिनसे शांति के स्थान पर इस क्षेत्र में अधिक बेचैनी बढ़ने की सम्भावना है। बहुत-से देश फिलिस्तीनियों के लिए एक स्वतंत्र देश बनाने को ही दशकों से होते आ रहे इस युद्ध को खत्म करने का एकमात्र हल बता रहे हैं परन्तु इज़रायल और ट्रम्प गाज़ा पट्टी से लगभग 25 लाख फिलिस्तीनियों को अन्य देशों में धकेल कर इस पट्टी में नई खूबसूरत इमारतें बना कर विश्व का बड़ा पर्यटन स्थल बनाने की योजनाओं पर विचार कर रहे हैं।
दूसरी तरफ चीन अपने दर्जनों पड़ोसी देशों के विरुद्ध आक्रामक रवैया धारण कर रहा है। उसके ऐसे रवैये का भारत भी शिकार बन रहा है, परन्तु हिन्द-महासागर में चीन की अपनी विस्तारवादी योजनाओं को क्रियात्मक रूप में लागू करने के यत्नों ने भारत ही नहीं, अपितु अमरीका, आस्ट्रेलिया और बहुत-से यूरोपीयन देशों को भी उसके विरुद्ध खड़ा कर दिया है। यदि चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति पर हठ न छोड़ा तो वह विश्व को एक बड़े युद्ध की ओर धकेल सकता है। आज संयुक्त राष्ट्र और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं बेहद कमज़ोर दिखाई दे रही हैं, जो चल रहे युद्धों को रोकने के समर्थ नहीं प्रतीत होतीं। इसलिए बड़ी चिंता यह पैदा हो गई है कि जिस तरह विनाशकारी हथियारों का विश्व भर में भण्डारण हो चुका है, उससे धरती का बड़े स्तर पर विनाश हो सकता है। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर कोई व्यवहारिक और प्रभावशाली योजनाबंदी बनाया जानी ज़रूरी है, जो सामने दिखाई दे रहे विश्व के विनाश के इस मंज़र को रोकने में समर्थ हो सके।


—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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