रेवड़ियों का राज

शीत ऋतु के साथ ही संक्रांति पर्व आते ही तिल के लड्डू के साथ रेवड़ियों की बहार आ जाती है हर घर की बरनियों में यह शोभायमान हो अपने वजूद पर इठलाती, मुस्कुराती बड़े प्रेम से लोगों का मुंह मीठा करती हुई भारतीय संस्कृति को विराटता प्रदान कर अपने कर्तव्यों की इति श्री नहीं करती बल्कि उसमें चार चांद  लगाती नज़र आती है।
बच्चे ही नहीं बड़े भी इसका स्वाद लेने से वंचित नहीं रहना चाहते हैं यदि रेवड़ियों की बात की जाएं तो वे बारह मास अपनी उपलब्धता दर्ज करा मिठाई की विभिन्न श्रेणियों को भी मात करने मे सक्षम है। रेवड़ियां अपने वर्चस्व को अतीत से कायम रखे हुए हैं और भविष्य तो इनका अति उज्जवल नज़र आ रहा है करण कि यह अपने पांव शनैरू शनैरू पसार राजनीतिक जगत की दहलीज पर पूर्ण मज़बूती के साथ कदम रख चुकी है। अब किसी की मजाल नहीं जो इन रेवड़ियों को मात दे दें। पांच वर्ष तक अपने मद में मस्त रहने वाली हर राजनीतिक पार्टी चुनाव का डंका बजते ही गिलहरी की तरह सजग हो रेवड़ियों के पीछे पड़ जाती हैं अर्थात रेवड़ियां लूटने के बजाये लुटाने को आतुर रहते हैं क्योंकि इनका सीधा सा फार्मूला है। पांच वर्ष तक भले ही आम जनता की ज़रूरत एवं समस्याओं की अनदेखी करो किन्तु कुर्सी लपकने हेतु मुफ्त की रेवड़ियों का सहारा लो, क्योंकि इन्हें ज्ञात है कि प्रखर पंगु हुई जन कल्याण की भावना चाहे पुनर्जीवित न हो किन्तु जनता को वरगला कर वोट लेने का सबसे सरल माध्यम ये मुफ्त की रेवड़ियां ही है।
इसी आकांक्षा के चलते राजनैतिक दलों के मध्य रेवड़ियां बांटने का प्रचलन सिर आंखों पर चढ़कर बोल रहा है सभी अपने-अपने एजेंडा में मुफ्त की रेवड़ियों को प्रमुखता से स्थान देते हैं यही कारण है कि यह रेवड़ियां सुरसा के मुंह की भांति लंबी होती जा रही है हर दल अपनी रेवड़ियों को इक्कीसा ही रखना चाहता है। उन्नीस-बीस किसी को पसंद नहीं और हो भी क्यों? आखिर कुर्सी का सवाल है उन्नीसा-बीस के कारण कुर्सी हाथ से चली गई तो हाथ मलते रह जाने का खतरा हमेशा सिर पर मंडराता रहता है। खुशी-खुशी आम जनों का मुंह मीठा करने वाली रेवड़ियां परस्पर स्पर्धा देखकर वास्तव में खुश नहीं वरन् बेहद मायूस है उन्हें अपना विस्तार कतई रास नहीं आ रहा है क्योंकि यह देशहित में नहीं बल्कि उनके माध्यम से नेताओं के वोट खरीदने की चाह मात्र है।
इन रेवड़ियों को उस दिन का इंतजार है जिस दिन अपने पुन: अपने असली स्वरूप में आकर पूर्ण नि:स्वार्थ भाव से देशवासियों का मुंह मीठा कर उन्हें प्रसन्नता एवं उल्लास की आगोश में पहुंचने में सफल हो जाएंगी। वे सब को समझाती फिर रही है कि वे स्वयं राजनीति की दहलीज पर नहीं गई बल्कि उन्हें जबरदस्ती ले जाया गया है।

-मो. 9425918116

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