आईना और सच

लगता है दुनिया में सबसे अधिक गड़बड़ इस आईने ने दी है। ये कैसे आईने आपने ईजाद कर लिये जो आपके आबनूसी चेहरे को भी महासुन्दर बनाते हैं। ज़मानत पर रिहा लोगों को क्रांतिवीर बनाते हैं, और तीस बरसों से गम्भीर अपराधों से आरोपित व्यक्तियों को आपका नेता बना देश की संसद और विधानसभाओं का पेट भर देते हैं।
अन्धों के शहर में आईने बांट देने की बात हमने बहुत सुनी थी, यहां तो अच्छे भले आदमियों में बड़े पैमाने पर बांट कर उन्हें दृष्टिहीन बना देते हैं।
भई, बड़ी खूबी है इन आईनों में। सोशल मीडिया से लेकर छपे हुए शब्दों तक में इन आईनों को भर देने की होड़ लगी है। बड़े कारगर होते हैं ये आईने साहब! उम्र भर आपमें इतना झूठ बांट देते हैं कि आप इन्हें सच मान कर चन्द सच बोलने का साहस करने वाले लोगों को टपोरी कहने से भी परहेज़ नहीं करते।
हमने उम्र भर अपने छपे पन्नों को काला करके महान लेखक होने का भ्रम पाले लोगों को इन आईनों की अर्चना करते देखा है। ये लोग इन आईनों की शक्ति की पूजा करते हैं। जो सच नहीं है, उसे सच बना कर लोगों को मजबूर करते हैं, कि वे यही आईना देखें। अपनी आंखों का अपनी समझ पर भरोसा न करें। आईना कहता है, यह देश बहुत महान है। दुनिया की चौथी बड़ी आर्थिक शक्ति बन गया है, और इसकी विकास दर दुनिया के सब देशों से अधिक हो गई है।
हम इस विकास दर की तलाश दुनिया के खुश रहने वाले देशों के सूचकांक में करते हैं। पता चलता है उसमें आज भी फिनलैंड सबसे ऊपर है, और आप आज की दुनिया के एक सौ पन्द्रह देशों से पीछे हैं। हमारे अड़ोसी-पड़ोसी भी खुश रहने में हमसे आगे हैं, जबकि उनके आर्थिक रूप से जर्जर हो जाने या टूट जाने की कल्पना यह आईना हमें दिन-रात बताता है।
हम कहते हैं, हमारा देश इतनी तरक्की कर गया है कि आज किसी भी पस्त से पस्त नागरिक को आत्महत्या करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। हमने सस्ते अनाज बांटने का रिकार्ड बना कर अस्सी करोड़ लोगों के पेट भर दिये हैं। फिर भी अपनी ज़िन्दगी खुद खत्म कर देने के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं, तो आईना बताता है, ये मानसिक विकृतियों से संत्रस्त लोग हैं जो अपनी ज़िंदगियां खुद ही खत्म कर रहे हैं। इनके लिए बड़े पैमाने पर मनोवैज्ञानिक उपचार का इंतजाम करवाओ।
अरे, इस उपचार का इंतजाम करने से पहले इनके काम करने की गारंटी देने का ही इंतजाम कर देते। यह कैसा आईना है, जिसने दुनिया में जन-सेवा और जन-कल्याण की परिभाषा ही बदल दी। काम को निकम्मा बना दिया।
आज जन-सेवा का अर्थ हो गया है, मुफ्तखोरी की रेवड़ियां बांटना। यह कैसा आईने से भरा देश है जो हर बरस मुफ्तखोरी के उपहार अपने देश की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी में बांटता है। एशिया के सर्वेक्षण का एक सत्य बाहर आता है, जो कहता है दुनिया में सबसे अधिक निठल्ललों का देश भारत है। यहां इस देश की आधी आबादी कोई काम नहीं करती। कोई आईना उन्हें नहीं बताता कि अरे, वह काम इसलिए नहीं करती, क्योंकि उन्हें काम मिलता नहीं। यहां चुनावी एजेंडे प्रसारित होते हैं, लेकिन उनमें रोज़गार नीतियों का ब्यौरा नहीं, दान को धर्म मान कर मुफ्तखोरी की घोषणाओं का ब्यौरा होता है। कहीं अनाज सदियों तक लोगों में मुफ्त बांटने के मन्सूबे हैं, तो कहीं बिजली।
नेताओं के भाषणों का आईना बताता है, कि देखो रोज़गार मांगने वालों की भीड़ घट गई। अब लोग इतना रोज़गार नहीं मांगते, जितना चौराहों पर भीख मांगते हैं।
नये व्यवसाय पनप रहे हैं, जिनमें चौराहों पर भीख मांगना और साइबर और डिजिटल ठगी करना एक बड़ा व्यवसाय बन गया है। ईमानदारी से जीने का फैशन नहीं रहा आज। ये आईने कभी किसी को सच नहीं बताते। बस यही कहते हैं कि जो हथेली पर सरसों जमा दे, वही कामयाब है। इन आईनों ने देश के लोगों को तेज़ी से सांस्कृतिक बना दिया है। शार्टकट संस्कृति ही अब इस नये युग की संस्कृति है, और सम्पर्क संस्कृति उर्फ दलाली के माध्यम से इस संस्कृति को आत्मसात करने का असली तरीका।
आज साहित्य वह जो बिकाऊ हो जाये। कला वह जो आर्ट गैलरियों की नहीं, नये उभरते माल प्लाज़ाओं की शोभा बने। मुक्त होकर जीने का अर्थ-अश्लील होकर जीना हो गया है, क्योंकि पुस्तक संस्कृति से टूट कर हम गलत संस्कृति की ओर चले गये हैं। गूगल और मैटा आज अधूरा और असम्बद्ध ज्ञान परोसने के नये साधन बन गये हैं, और हमने अध्यापकों की इयत्ता महत्ता को निजी कोचिंग के व्यवसाय से नकार दिया है। विश्वविद्यालयों के परिसर खाली पड़े हैं, और वीज़ा अकादमियों द्वारा अपेक्षित बैंड बांटने वाले केन्द्रों के बाहर नौजवानों की भीड़ लगी है। परन्तु क्या करें? ये आईने हमें कभी बताते ही नहीं कि हमने इस युवा देश को असमय ही बूढ़ा कर दिया है और वरिष्ठ लोगों को वृद्धाश्रम पहुंचा दिया है, जो अब भिखारी गृहों के सच को गले लगाएंगे जो कहता है, तुम महान हो, तुम्हारा देश महान ही नहीं, दुनिया का गुरुदेव है, अपने छात्रों को तलाशता हुआ गुरुदेव।

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