क्या युद्ध से निकलने की राह तलाश रहे हैं ट्रम्प ?
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब युद्ध से निकलना चाहते हैं। बुरी तरह से चोट खाए हुए ट्रम्प दावा कर रहे हैं कि उन्होंने ईरान में सत्ता परिवर्तन का अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है। वह यह भी दावा कर रहे हैं कि ईरान अब युद्ध खत्म करने की ज़िद कर रहा है।
हालात को पूरी तरह से बिगाड़ने के बाद ट्रम्प को अब सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलने का कोई साफ रास्ता नज़र नहीं आ रहा है। इसलिए वह सभी लक्ष्यों को हासिल करने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, भले ही वह लक्ष्य असल में कितने भी दूर क्यों न दिख रहे हों। ट्रम्प ने यह तर्क दिया है कि अमरीका को अपना तेल सुरक्षित करने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य वाले रास्ते की कभी ज़रूरत ही नहीं थी। अब यह दूसरों की ज़िम्मेदारी है कि वह हिम्मत जुटाएं और होर्मुज जलडमरूमध्य को ज़बरदस्ती खुलवाएं। हर कोई इस बात को समझता है, और मॉस्को ने ट्रम्प का मज़ाक उड़ाते हुए कहा है कि उनकी सेना होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते को खोलने में नाकाम रही है।
लेकिन अमरीका के अचानक पीछे हट जाने से पूरी दुनिया को इसके बुरे नतीजे भुगतने पड़ेंगे। इस मोड़ पर युद्ध छोड़ देने से ईरान को ही सारे फयदे मिलेंगे। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद ही रहेगा, या फिर हर हाल में ईरान के ही नियंत्रण में रहेगा। जबकि पहले यह एक खुला अंतर्राष्ट्रीय समुद्री रास्ता था।
हो सकता है कि ईरान वहां से गुज़रने वाले जहाज़ों से शुल्क वसूलना जारी रखे, जैसा कि उसने अब शुरू कर दिया है। यह एक स्थायी नुकसान होगा। किसी भी खुले अंतर्राष्ट्रीय समुद्री रास्ते को, उसके किनारे बसे देश द्वारा ‘टोल रोड’ की तरह नहीं चलाया जा सकता। तेल और गैस की आपूर्ति सीमित ही रहेगी, क्योंकि मिसाइल हमलों के कारण तेल और गैस से जुड़ी सुविधाएं बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई हैं। इन सुविधाओं की मरम्मत करने और उनकी उत्पादन क्षमता को फिर से बहाल करने में काफी लंबा समय लगेगा। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि इन सुविधाओं को फिर से ठीक करने के लिए ज़रूरी निवेश के कारण तेल और गैस की कीमतें हमेशा के लिए बढ़ जाएंगी।
ट्रम्प को अपने पड़ोसी देश पर किए गए एक हमले के बाद यह गलतफहमी हो गई थी कि वह अब सर्वशक्तिमान बन गया है। वहीं दूसरी ओर ईरान भी पूरी मज़बूती से यह कह रहा है कि वह युद्ध-विराम नहीं करेगा और अपनी लड़ाई जारी रखेगा। ईरान कह रहा है कि उसके नेता पूरी तरह सुरक्षित हैं और सत्ता पर उनका पूरा नियंत्रण है। अपनी चुनौती दिखाने के अंदाज़ में ईरान ने व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस की सुरक्षा में बैठकर ट्रम्प के बेतुके बयानों के खत्म होते ही पश्चिमी एशिया के कुछ देशों और साथ ही इज़राइल पर हमला शुरू कर दिया। अगर अमरीका पीछे हट जाता है तो पूरा पश्चिम एशिया (सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और अन्य देश) ईरान की दया पर निर्भर हो जाएंगे।
इज़रायल ने ईरान की राजधानी तेहरान पर लगातार हमले जारी रखे हुए हैं और लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ हमले कर रहा है। अगर अमरीका अचानक इस पूरे मामले से अपना हाथ खींच लेता है तो इज़रायल कमज़ोर पड़ जाएगा। उसे न तो ईरान के खिलाफ और न ही हिज़्बुल्लाह संगठन के खिलाफ कोई स्पष्ट जीत मिली है। अगर कुछ होगा तो हिज़्बुल्लाह और भी ज़्यादा आक्रामक हो जाएगा। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए पूरी तरह से एक गतिरोध और अव्यवस्था की स्थिति है। तेल की कीमतें अभी भी बढ़ रही हैं और दुनिया भर के देश तेल और गैस की आपूर्ति के साथ-साथ उनकी कीमतों को नियंत्रित करने के उपाय तलाश रहे हैं। आर्थिक रूप से इसका विपरीत प्रभाव कम विकसित और गरीब देशों पर और ज़्यादा पड़ेगा।
युद्ध का सबसे ज़्यादा नुकसान अमरीका को हुआ है। एक महाशक्ति के रूप में उसकी छवि को ठेस पहुंची है। अमरीकी राष्ट्रपति जिस तरह से मनमानी कर रहे हैं, उससे उनके अपने ही देश में उनका विरोध शुरू हो गया है। इस युद्ध में अमरीका के दो बेहद कीमती निगरानी विमान ई-3 सेंट्री विमान, जिन्हें अवैक्स कहा जाता है, नष्ट हो गए हैं और उनकी मरम्मत संभव नहीं है। ऐसा नहीं है कि ऐसे विमान अमरीका के पास बहुत ज़्यादा संख्या में हैं और उन्हें आसानी से बदला जा सकता है। पश्चिम एशिया में मौजूद अमरीकी ठिकाने बड़ी सीमा तक तबाह हो गए हैं। अब यह सवाल उठेगा कि क्या इन ठिकानों को फिर से तैयार किया जाएगा या फिर अमरीकियों से वहां से चले जाने के लिए कहा जाएगा। इन ठिकानों ने उन देशों को कोई सुरक्षा कवच नहीं दिया, जहां ये सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। (संवाद)



