तीन राज्यों में भारी मतदान के क्या हैं मायने ?
असम, केरल व पुड्डचेरी की 296 विधानसभा सीटों के लिए गत 9 अप्रैल को सम्पन्न हुए चुनावों में भारी मतदान हुआ है। इस भारी मतदान के रूझान को इस बात से जाना जा सकता है कि वैसे तो इन दोनों राज्यों और पुड्डचेरी जैसे केंद्र शासित राज्य में हमेशा से मतदान ज्यादा होता रहा है। लेकिन ज्यादा मतदान वाले इन प्रदेशों में इस बार उससे भी ज्यादा वोटिंग हुई है, तो आखिर इस भारी मतदान के मायने क्या हैं? असम में पिछली बार यानी 2021 में 82.42 फीसदी, 2016 में 84.72 फीसदी और उसके पहले 2011 में 75 फीसदी मतदान हुआ था। लेकिन इस बार मतदान का प्रतिशत 85.38 फीसदी रहा, जो कि 2021 के मुकाबले लगभग 3 फीसदी, 2016 के मुकाबले लगभग 1 फीसदी और 2011 के मुकाबले मतलब 10 फीसदी ज्यादा रहा। जब 2011 के मुकाबले 2016 में भाजपा को 10 फीसदी बड़ा जम्प मिला था, तब कांग्रेस हार गई थी और भाजपा पहली बार सत्ता में आयी थी। हालांकि 2021 में यह बम्पर वोटिंग का फीसदी भाजपा के खाते में सिर्फ 2.3 फीसदी ही रह गया या दूसरे शब्दों में कहें तो 2016 के मुकाबले भाजपा के पक्ष में गिरे मत 2.3 फीसदी कम हो गये। फिर भी भाजपा की सरकार बनी रही, तो क्या इस बार जबकि पिछले 20 सालों में सबसे ज्यादा मतदान हुआ है, तो इसके कुछ खास संकेत हैं।
भारी मतदान को देखकर सभी पार्टियां अपने-अपने ढंग से इनका विश्लेषण करने में लगी हैं। कुछ का मानना है कि 2021 के मुकाबले 3 फीसदी ज्यादा मतों का मतलब है मतदाता भाजपा की सरकार को हटाना चाहते हैं, इसलिए अब तक के चुनावों का यह ऐतिहासिक मत प्रतिशत सामने आया है। दूसरी तरफ भाजपा और उसके सहयोगियों का मानना है कि लगातार दो बार सत्ता में रहने के बाद भी अगर मत प्रतिशत बढ़ा है, तो उसका मतलब है मतदाता हिमंत विस्वा सरमा की सरकार वापस चाहते हैं, इसलिए जबरदस्त मतदान हुआ है। अब दोनों में से किसका आंकलन सही होगा, यह तो 4 मई को ही पता चलेगा।
मतदान के हिसाब से देखें तो कुछ ऐसा ही केरल में भी नज़र आता है। हालांकि केरल में महज 1 फीसदी मतदान में वृद्धि हुई है। 2021 में जहां 77.27 प्रतिशत मतदान हुआ था, वहीं इस बार 78.27 प्रतिशत मतदान रहा यानी दोनों बार के मतदान में सिर्फ एक फीसदी का अंतर है और केरल के मामले में एक फीसदी मतदान भी इधर से उधर होने पर बड़े बदलाव हो जाते हैं। हालांकि इसका अपवाद भी है। 2021 में 2 से 3 प्रतिशत वोटिंग कम होने के बावजूद एलडीएफ न केवल जीता था बल्कि मज़बूत भी हुआ था। लेकिन यह हर बार ऐसा नहीं होता। आमतौर पर केरल में 3 प्रतिशत तक बढ़ा मतदान निर्णायक होता है। अगर पिछले बार के रूझन को ध्यान में रखें तो लगता है केरल में मौजूदा सरकार ही सत्ता में लौट रही प्रतीत होती है। 70 सालों में यह पहली हैट्रिक होगी। जबकि पुड्डचेरी में जो रूझान देखने को मिल रहे हैं, उससे लगता है कांग्रेस से निकले एन. रंगास्वामी पांचवीं बार सत्ता में काबिज हो सकते हैं।
केरल में कुल 140 विधानसभा सीटें हैं और 2.7 करोड़ कुल मतदाता हैं, जिनके बीच विभिन्न पार्टियों के 833 प्रत्याशी मैदान में थे, अब 4 मई को पता चलेगा कि इनमें से किन-किन प्रत्याशियों की किस्मत चमकेगी। पुड्डचेरी में कुल 30 विधानसभा सीटें हैं और यहां कुल मतदाता 9.5 लाख हैं। इन मतदाताओं के बीच 294 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे। क्या यह भारी मतदान सत्ता विरोधी लहर (एंटी इंकम्बेंसी) की तरफ संकेत कर रहा है या फिर सत्ता में काबिज लोगों के पक्ष में जा रहा है। जब भी मतदान सामान्य से ज्यादा होता है, तो इसके दो ही संकेत माने जाते हैं या तो मतदाता सरकार से संतुष्ट नहीं है और वह उसे बदलने के लिए ज्यादा से ज्यादा वोटिंग कर रहे हैं या फिर ये सरकार से संतुष्ट हैं और ज्यादा मतदान करके उसे सत्ता में बनाये रखना चाहते हैं।
हालांकि अधिक मतदान के कुछ भी नतीजे हो सकते हैं, लेकिन आम तौर पर यह होता है कि नतीजे निर्णायक होते हैं, चाहे वह सत्ता के पक्ष में हो या विरोध में। इसलिए जब ज्यादा मतदान हो तो यह या तो मजबूत ध्रुवीकरण का संकेत होता है या मतदाताओं की जागरुकता का संकेत होता है कि वह हर हाल में परिवर्तन चाहते हैं। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि हाल के महीनों में जिस तरह चुनाव आयोग की गतिविधियां सुर्खियों में रही हैं, उससे मतदाताओं का चाहे सकारात्मक शिक्षण हुआ हो या नकारात्मक, लेकिन हाल के महीनों में मतदाता अपने मताधिकार को लेकर बड़ी सीमा तक शिक्षित हुए हैं। जिस तरह राजनीतिक पार्टियों ने मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटने या जोड़ने को लेकर राजनीतिक आंदोलन किया है, उससे चाहे जो भी हुआ हो, परन्तु मतदाता तो यह समझे ही हैं कि उनका मत कीमती है और शायद इसलिए 9 अप्रैल, 2026 को इन तीन राज्यों में सम्पन्न विधानसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है।
केरल में विशेषकर महिलाओं और शहरी वोटरों की बढ़ी भागीदारी में इसे चिन्हित किया जा सकता है। एक बात यह भी हो सकती है कि इस बार के इन तीनों विधानसभा चुनावों में पूरी तरह से स्थानीय मुद्दे हावी थे, जैसे असम में विकास के साथ एनआरसी और बाहरी और भीतरी राजनीति का मुद्दा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



