बुजुर्ग स्थगन का नहीं, सम्मान का विषय हैं
आज भारत में प्रश्न उठाए जा रहे हैं, और जिन प्रश्नों पर मीडिया का ध्यान सबसे ज्यादा है, वे प्रश्न हैं नारी सशक्तिकरण के कि फिर समाज के हिस्सों में उन्हें ठीक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा। इसके बाद जो प्रश्न ध्यान खींच रहा है, वह है युवा मानसिकता, उनकी रुचियां, उनकी भविष्य की तैयारी, उनका करियर। यह सब होना चाहिए। स्त्री को उसकी मुनासिब जगह मिले। युवा वर्ग को तवज्जो और सांस्कृतिक आधार मिले, तभी तो देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में रह पाएगा, लेकिन इस सबके बीच भी कुछ छूट रहा है और जिसकी उपेक्षा हो रही है वह है हमारा बुजुर्ग समाज। जिन्होंने सभी सामाजिक नियमों का पालन किया। घर-समाज की रीढ़ की हड्डी बने रहे, आज के दम घोटने वाले मौसम में घोर उपेक्षा और अन्याय का शिकार हो रहा है। परिवार का बोझ उठाने वाले और परिवार की भलाई में जान खपाने वाले ये बुजुर्ग परिवार-समाज पर बोझ समझे जा रहे हैं।
टैक्नोलॉजी की अपनी गति है। अपना विकास रथ। टैक्नोलॉजी एक-दूसरे से सीधे सम्पर्क तथा बातचीत की जगह लोगों के बीच ऐसे वित्त-पोषित नये साधनों को ला देती है जो हमारी अस्मिता को न सिर्फ विकृत करते हैं। बल्कि बदल कर रख देते हैं। दरअसल हम जो ई-ज्ञान परम्पराओं के वाहक हैं। हम क्या है, हमारी ज्ञान परम्पराएं क्या हैं-जैसे सवालों पर ही नहीं, समूची समझ और अभिव्यक्ति पर उनका असर है। टैक्नोलॉजी के निरन्तर उपयोग करते हुए यथार्थ की जगह काल्पनिक छवियां छा गई हैं। संकीर्ण सोच अपनी जगह बनाने लगती है और भाषा का अपहरण हो जाता है। पुरानी मान्यताओं से जुड़े बुजुर्ग मानवीय गरिमा से ज्यादा जुड़े होते हैं, सो कहीं पीछे रह जाते हैं। तकनीक की तीव्रत में भी और प्रचलित व्यवहार में भी।
दरअसल हमारा देश संयुक्त परिवार की परम्परा का पालन करने वाला देश रहा है अभी तक कुछ परिवार यह परम्परा निभा रहे हैं। लेकिन समय का पहिया घूमा। आजीविका का संकट आया, परिवार में युवा वर्ग उडान भरने लगा। एकल परिवार का ताना-बाना चरमरा गया। छोटे परिवार सामने आये। अब फिर पलट रहे हैं लोग। अकेले रह गये परिवार सशक्त नहीं रहे और बाहर गए परिवार को अकेलापन सहना मुश्किल हो रहा है, लेकिन ऐसे बहुत से घर हैं, जहां से बच्चे देश में घर से हज़ार किलोमीटर दूर या फिर विदेश में है। उन परिवारों में रह गये हैं सिर्फ बूढ़े मां-बाप, अक्षम और बीमारियों से जूझते। पंजाब में या कुछ अन्य जगहों पर जहां नशे प्रचलन अधिक है। वह अकेले घर में रहते बुजुर्ग साफ्ट टारगेट समझे जा रहे हैं।
ऐसे में आस-पास रह रहे लोगों का नैतिक दायित्व बनता है कि वे अकेले रह गए दम्पतियों का ध्यान रखें। उन्हें अपनी खुशियों में शामिल करें। खाली वक्त उनके साथ गुज़ारें, उनके पास जाएं या उनको घर बुलाएं। संवाद भी बना रहेगा। अनुभव का लाभ भी मिलेगा। विदेश में तो युवकों के व्यस्क हो जाने तक अपना खर्च खुद जुटाना पड़ता है, परन्तु भारत में। माता-पिता कदम-कदम पर बच्चों की मदद करते हैं। विदेश में माता-पिता दायित्वहीन हैं, परन्तु भारत में माता-पिता हर कदम पर मदद के लिए तत्पर रहते हैं। इसलिए भी उनकी वृद्धावस्था में देखभाल का ज़िम्मा युवा पीढ़ी को नैतिक स्तर पर भी उठाना ज़रूरी है।
हमें सामाजिक स्तर पर और लोकतंत्र में सरकारी स्तर पर अपना ढांचा उनके अनुकूल बनाना चाहिए, जिसमें उनकी दिक्कतें कम से कम हों। उम्र के इस पड़ाव में उन्हें सम्मान और गरिमापूर्ण वातावरण मिलना चाहिए। दफ्तरों में अनके काम प्राथमिकता के आधार पर हल हों। सहारा ही नहीं आदर और प्रेम मिलना चाहिए तभी हमारा सांस्कृतिक वातावरण बना रह सकता है।



